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शनिवार, 17 मई 2014

Doddabetta peak, डोडाबेट्टा चोटी व चाय फैक्टरी

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दिनॉक 23 जून, झील व डियरपार्क देखकर हम ऊटी की चरफ चल दिए थोडी दूर ही चले थे की एक आटो वाला हमारे पास आकर रूक गया.हमने उससे पुछा की डोडाबेट्टा पीक चलेगा उसने हामी भर दि,मेने पुछा चलने के कितने रू० लोगे उसने तपाक से 900रू० आने जाने के कह दिए.मेने व प्रवीन जी ने 400रू कह दिए पर उसने मना कर दिया कहने लगा की वह जगह काफी ऊचांई पर है फिर मेरा पूरा दिन लग जाएगा,मै आपको चाय फैक्टरी भी ले जाऊगा.इसलिए 800रू दे देना.हम भी ठहरे दिल्ली के मना कर दिया ओर वहा से पैदल ऊटी के मेन चौराहे की तरफ चल दिए.थोडी दूर ही चले थे की वही आटो हमारे पास आकर रूक गया,बोला साहब चलो आजकल पर्यटक भी नही आ रहे है काफी परेशानी हो रही है घर चलाने मे,हमने उसे 550रू के लिए कह दिया ओर वह राजी हो गया.हम आटो मे बैठ गए ओर चल पडे डोडाबेट्टा चोटी की तरफ.
डोडाबेट्टा चोटी-
डोडाबेट्टा चोटी ऊटी से लगभग 9 या 10 किलोमीटर की दूरी पर है,यह नीलगिरी पर्वत की सबसे ऊंची चोटी है ओर इसकी ऊंचाई समुंद्र तल से 2600 मीटर से भी थोडी ज्यादा है. मतलब यह उत्तराखण्ड की मंसूरी से भी ऊंची जगह है. यहा से आप दूरबीन के द्वारा घाटी के सुंदर नजारे देख सकते हो.काफी सारी फिल्मो की सुटिंग भी यहा पर हुई है.यह तमिलनाडु की ही नही बल्की समस्त दक्षिण भारत की सुन्दर जगहो मे से एक है.जिसको देखने के लिए दूर दूर से पर्यटक आते है.
तकरीबन हम आटो से 1घंटे मे ऊपर पहुंचे. बारिश रूकने का नाम ही नही ले रही थी.चारो ओर धुंध(fog)फैली थी कुछ दिखाई ही नही दे रहा था ऊपर से इतनी ऊंचाई पर हवा भी जोरो शोर से चल रही थी.दूरबीन से भी कुछ नही दिखाई देरहा था क्योकी मौसम ही साफ नही था.हम बारिश के मौसम मे जो आए थे यहां पर मुझे लगता है हमने सही मौसम का चुनाव नही किया, यहा पर सर्दी के मौसम मे आना चाहिए था.पर यहा पर गर्मीयो मे भी सर्दी रहती है,हमे भी यहा पर दिल्ली की सर्दी याद आ गई.यहा पर एक कैंटीन भी हैओर हमने वहा जाकर गर्मा गरम चाय पी.यहा कुछ देर ठहर कर हम वापिस आटो मे बैठ कर चल दिए.
आटो वाले ने हमे एक चाय फैक्टरी दिखाई,जहा पर चाय कैसे बनती है ओर कैसे कैसे व किस प्रक्रिया से गुजर कर हम तक पहुंच ती है यह सब हमे बताया गया.फिर फ्री मे वहा की बनी चाय पिलाई गई.ओर आखिर मे उनकी दुकान से 2 किलो चाय खरीद ली 260रू० प्रति किलो के दाम पर.
आगे वहा पर हेंडमेड चॉकलेट भी बन रही थी जो ऊटी की हर दुकान पर उपलब्ध भी थी हमने कुछ चॉकलेट खरीदी खाने के लिए वाकई उसका स्वाद बजार मे बिकने वाली चॉकलेट से बहुत अच्छा था.
यह सब देखकर हम शाम 7बजे अपने होटल पहुंचे.
यात्रा अभी जारी है........

गुरुवार, 8 मई 2014

ऊटी झील,ooty lake & deer park

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आज दिंनाक 23 जून को हमने ऊटी की झील देखने का फैसला किया.यह झील मानव निम्रित है जिसे अंग्रेजो ने बनवाया था, ओर यह ऊटी का मूख्य पर्यटक स्थल भी है जैसे नैनीताल की नैनी झील,इसलिए हम सुबह10 बजे नहा धौकर व नाश्ता करके ऊटी झील की तरफ चल दिए.हल्की हल्की बारिश हो रही थी,हम जब से ऊटी आए थे तब से बारिश कभी रूक जाती,कभी पडने लगती,लेकिन मौसम मे ठंडक मौजूद थी.
होटल के पास ही बोट क्लब था जहा से हमने दो बोट किराये पर ले ली.यहा पर 45 मिनट के लिए किराया 120रू० था,इसलिए काऊंटर पर बैठे व्यक्ति ने दो बोट के हिसाब से 240 व 160 रू ओर जमा करा लिए वो इसलिए की कभी हम  तय समय के बाद आए तो वह उन पैसो को हर्जाने के रूप मे जब्त कर ले.उस समय 10:30 का समय हो रहा था उसने हमे 11:15तक आने के लिए बोल दिया.
हम वहा से कुछ नीचे सीढियो से उतर कर नाव(बोट) तक पहुंचे. वहा पर सबने सुरक्षा के लिए लाईफ जैकेट पहन ली ओर चल पडे झील मे बोट को लेकर.झील मे बोट चलाना एक अलग तरह का ही सकुन देने वाला लम्हा था.वैसे तो दिल्ली मे भी कई जगह बोटिग की जा सकती है पर यहा पर चारो ओर पहाड से घीरी व चीड,देवदार के पेडो के बीच बोटिग करने का अलग ही मजा है.यहा पर बत्तख व अन्य जलपक्षी आपको झील मे घुमते मिल जाएगे.
ऊटी मे बोटिग करने के लिए अलग अलग तीन बोट क्लब बने है जहा से आप ऊटी मे कही भी हो आप बोटिग कर सकते है.यहा पर पैडल बोट व इंजन वाली बोट से भी आप झील भ्रमण कर सकते है.
मै लगातार पैडल वाली बोट को चला रहा था इसलिए पैर भी जवाब देने लगे तो इसलिए बीच बीच मे बिना पैडल चलाए ऐसे ही बोट मे बैठे रहते लेकिन जब इंजन वाली बोट नजदीक से निकलती तब हमारी बोट ऐसे ही जाती जैसे समुंद्र मे नाव की स्थति होती है.
हमने दोनो बोटो को साथ साथ ही रखा ओर झील के मध्य तक पहुंच गए जहा से झील को चारो ओर से देखा जा सकता है.वहा हमने झील के किनारे एक हिरण को देखा बाद मे पता चला की यहा एक डियर पार्क भी है जिसे हम बोटिग करने के बाद देखने गए.
काफी देर तक हम बोटिग करते रहे समय देखा तो 11:10 के करीब हो रहा था.तो हम किनारे के ओर चल दिए.किनारे पर आकर बोट साईड मे लगा कर हम ऊपर काऊंटर पर पहुचे ओर बाकी पैसे मांगे पर उसने देने से मना कर दिया ओर घडी दिखाई जो हमारी घडी से 15 मीनट आगे चल रही थी,हमने कहा की तुम्हारी घडी तेज चल रही है पर वह नही माना ओर कहने लगा की मेरी शिकायत कर दो पर मै पैसे नही दूंगा.हम हिन्दी व इग्लिश मे बात कर रहे थे ओर वह तमिल मे ओर टुटी फूटी हिन्दी मे,हमारे साथ फैमली थी इसलिए हम वहा से चले आए, लेकिन हमने देखा की वहा पर कोई भी पुलिस कर्मी मौजूद नही था,नही तो शिकायत जरूर करते.
हम वहा से बाहर आकर व मुड्ड सही करने के लिए सडक किनारे गरमागरम भूट्टे ले लिए, ओर बात करते करते व भूट्टा खाते खाते डियर पार्क की तरफ चल दिए.क्लब हाऊस से डियर पार्क केवल 10 से 15 मिनट के पैदल रास्ते पर ही है या कहे की लगभग 2 km की दूरी पर ही है. डियर पार्क तक रास्ता थोडा ऊंचाई वाला था,पर था बहुत खुबसूरत,यहा सडक किनारे जंगली फूल खिले थे ओर यहा पर बडी शान्ति थी केवल हम ही थे उस सड़क पर कही- कही झील का नजारा भी दिखने को मिल जाता था.
थोडी ही देर मे हम डियर पार्क पहुंच गए यहा पर कोई भी आदमी मौजूद नही था एक बाडा बना था जिसमे तकरीबन आठ,नौ हिरण थे कुछ घास खाने मे मस्त थे तो कुछ आपस मे लड रहे थे.यहा पर कुछ समय गुजार कर हम वहा से चल पडे ऊटी शहर की तरफ
यात्रा अभी जारी है.......

शनिवार, 3 मई 2014

बाटनिकल गार्डन,ऊटी

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22 जून 2013 की दोपहर 1बजे हम ट्रेन से वापिस ऊटी आ गए.अब हमने ऊटी मे बाटनिकल गार्डन की तरफ रूख किया.यह रेलवे स्टेशन से तकरीबन 3 किलोमिटर दूर है,हमने पैदल ही चलने का निर्णय किया क्योकी यहा मौसम बडा सुहाना था ओर थकान हो नही रही थी.हम बाजार की तरफ से चल रहे थे,बाजार मे बडी बडी दुकाने व शोरूम खुले हुए थे.बाजार वाली मुख्य सड़क के पिछे भी एक सडक थी जो मुख्य सडक के साथ साथ चल रही थी पर इस सड़क पर पुराने घर व छोटी दुकाने थी ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे किसी कस्बे की सड़क पर चल रहे हो.मै कह सकता हुं की मुझे ऊटी के दो रूप देखने को मिले थे अलग अलग सडको पर.
आगे एक चौराहा आया जहा से हम दाएं तरफ हो गए ओर बाटनिकल गार्डन पहुच गए.मै टिकेट लेने के लिए टिकट खिडकी पर पहुंचा ओर 5 टिकेट ले लिए,10 रू० प्रति टिकेट के हिसाब से 50रू दे दिए. लेकिन  आप कैमरा ले रहे है तो कैमरे का टिकेट अलग से लगता है.टिकेट लेकर हम सब गार्डन मे अन्दर जा पहुंचे.
यह गार्डन काफी बडे भूभाग मे फैला हुआ है. ओर यहा पर पेडो की कई प्रजाती आपको मिल जाएगी, सभी पेडो पर उनके नाम की प्लेट लगी हुई थी जिससे दर्शक उन्हे पहचान सके. यहा का मौसम इतना अच्छा या यह कहे की पेड पौधो के अनुकूल है की यहा पर सभी प्रकार के पेड,पौधे फलफूल जाते है शायद इसलिए अंग्रेजो ने यहा पर विदेशो से लाए पेड भी लगाए.
यहा हमने फूलो की भी कई किस्मे देखी.तरह तरह के फूल हर जगह,हर कोने पर आपको यहा मिल जाएगे.कुछ पौधो के लिए यहा पर एक ग्रीन हाऊस भी बना है.
यहा पर हमने एक बहुत पुराने पेड का जीवाश्म भी देखा(नीचे फोटो भी है).जिसे 2 करोड साल पुराना बताया गया है.यह गार्डन कही ऊंची व कही नीची भूमी पर बना है.जो प्रकृती के पास होने का अनुभव कराता है.हरियाली यहा चारो ओर फैली हुई थी.रंगबिरंगी तितलिया यहा पर आपको बहुत मिलेगी क्योकी यहा पर हर जगह फूल ही फूल खिलते मिलेगे.
यहा पर कुछ पुराने घर शायद अंग्रेजो के समय के थे जो अब कार्यालय के रूप मे उपयोग मे लाए जा रहे है,यहा पर हमे तीन चार जगह पुरानी तोपे भी देखने को मिली,शायद ये तोपे भी अंग्रेजो के समय की हो.
हम एक जगह पहुंचे तो देखा लोगो की भीड लगी है ओर ज्यादातर सभी फोटो खीच रहे है,हम भी पहुंच गए,देखा तो फूल के पौधो व घास से भारत का नक्शा बना हुआ था.यह नक्शा बहुत सुन्दर लग रहा था लगता भी क्यो नही हमारे भारत का था,तो हमने भी फोटो खिच लिए.
यहा पर झाडियो को एक अच्छे ढंग मे काटकर दिवार सी बनाई हुई थी जो देखने मे बहुत सुन्दर लग रही थी.यहा पर हमने नागफनी(कैक्टस) के कई पौधे देखे. कुल मिलाकर यह गार्डन को काफी संजोकर व सफाई कर के रखा है
हमे घुमते घुमते काफी समय हो गया था,पास मे ही कैन्टीन देखकर वहा चले गए,चाय पी गई ओर बच्चो ने चिप्स ले लिए.शाम हो गई थी इसलिए हम गार्डन से बाहर आ गए ओर घुमते हुए होटल की तरफ चलते चले गए...
यात्रा अभी जारी है......