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Tuesday, July 26, 2016

बद्रीनाथ यात्रा (दिल्ली से बद्रीनाथ) badrinath yatra

10june2016

बद्रीनाथ मंदिर के सामने मैं सचिन त्यागी


10 जून की शाम को हम कुछ दोस्त दिल्ली कश्मीरी गेट ISBT पहुँच गए। हम लोगो को टर्मिनल नम्बर 12 से हरिद्वार की बस पकडनी थी, फिर हरिद्वार से बद्रीनाथ जाने वाली बस। यह यात्रा कैसे बनी इस के बारे में कुछ बताता हुं। पहले मुझ जैसे घुमने फिरने व नई नई जगहो पर जाने वाले लोगो को कही भी घुमने जाना होता था, तब बहुत तैयारी करनी होती थी, कोई अगर संग जा रहा है तो वह भी हमारे जैसा विचार वाला ही हो यह भी ध्यान मे रखा जाता था। लेकिन जब से इंटरनैट का चलन बहुत हद तक सभी के मोबाईल में होने लगा, फेसबुक, वटसऐप जैसी सुविधाएं हमे मिलने लगी। तब हम जैसे चाह रखने वाले कुछ लोगो ने ग्रुप बना लिए। जहां पर जाने से पहले सभी अपनी जानकारी ग्रुप पर दे देते है। ऐसा ही एक ग्रुप है "मुसाफिरनामा दोस्तो का" यहां पर कुछ दिन पहले ट्रैकिंग पर बात हो रही थी, कुछ दोस्तो ने सतोपंथ झील व स्वर्गारोहिणी जाने का प्रोग्राम बनाया। यह ट्रैकिंग तकरीबन पांच दिन की थी बद्रीनाथ से बद्रीनाथ तक। बाकी सभी जानते थे की यह एक मुश्किल ट्रैक है। फिर भी हम दस लोग यहां पर जाने को तैयार हो गए, मैने इसके लिए, रोजाना सुबह दौड लगानी भी आरंभ कर दी थी। इसलिए ही हम जो लोग दिल्ली, गुडगाँव व गाजियाबाद से थे वो 10 जून को दिल्ली ISBT  पहुचं गए। हरिद्वार जाने के लिए।

मै, बीनू कुकरेती, संजीव त्यागी, अमित तिवारी, जाट देवता (संदिप पंवार), कमल सिंह व अन्य दो मित्र, दिल्ली से हरिद्वार वाली बस से चल पडे।  गाजियाबाद से योगी सारस्वत जी भी दूसरी बस से चल रहे थे। बाकी दो मित्र सुशील कुमार व रमेश जी पहले ही हरिद्वार पहुंच चुके थे और हम सब की बद्रीनाथ तक की बस की टिकट GMOU से पहले ही बुक करा चुके थे। हम सभी लोग रात 8:20 पर दिल्ली से चलकर सुबह 3:30 पर हरिद्वार बस स्टैंड पहुचे। सुशील जी ने बस बुक कराने के बाद टिकेट की एक फोटो सबको दे दी, जिससे हमे बस ढुंढने मे परेशानी ना हो। बस देखकर हमने बस मे अपना सामान रख दिया फिर तकरीबन एक घंटा वही पर घुमते रहे, जिसे चाय पीनी थी उसने चाय पी जिसे फ्रैश होना था वह फ्रैश हो आया।

तकरीबन सुबह के 4:20 पर बस हरिद्वार से चल पडी,  हम बस मे दस लोग बैठे थे ओर बाकी दो (सुशील व रमेश) रास्ते में एक धर्मशाला से लेने थे, लेकिन ड्राइवर बोला की आपकी 10 सीट ही बुक है 12 नही, इसलिए कोई दो व्यक्ति पांच वाली बस से आ जाओ। जाट देवता व बीनू कुकरेती बस से उतर कर दूसरी बस में चले गए। बाकी हम बस में बैठे रहे, कुछ ही समय बाद बस हरिद्वार से चल पडी, रास्ते में सुशील व रमेश जी को भी ले लिया गया। अभी अंधेरा ही था, कुछ ही देर बाद हम ऋषिकेश  पहुचं गए। ऋषिकेश से पहाड चालू हो जाते है, ऋषिकेश से तकरीबन 14 किमी0 बाद शिवपुरी आता है, इससे पहले मैं यहां पर एक बार आ चुका हुं, क्योकी यहां पर लष्मण झूला तक राफ्टिंग होती है, मैने भी पहले यही से राफ्टिंग की थी और शिवपुरी के पास ही नीर जल प्रपात भी है। शिवपुरी से ब्यासी ओर कुंडियाला होते हुए हम पहले प्रयाग देवप्रयाग पहुंचे। यह प्रयाग भागीरथी  व अलकनंदा के संगम पर स्थित है और यही से यह दोनों नदी मिलकर  गंगा नदी कहलाती है। यहां पर रघुनाथ मंदिर व शिवमन्दिर दर्शनीय है। लेकिन मै बस में था। इसलिए यहां पर रूकना नही हो सका, एक फोटो संगम का बस से ही खींच पाया। जहां भागीरथी का जल हरा व साफ़ नज़र आता है वही अलकनंदा का जल मिटटी जैसा रूप (मटमैला ) लिए होता है।

देवप्रयाग रीशिकेश से तकरीबन 78 किमी की दूरी पर स्थित है। यहां से एक रास्ता नई टिहरी की तरफ चला जाता है ओर एक रास्ता अलकनंदा के साथ साथ चला जाता है, जिस पर हम चल रहे थे। आगे चलकर हम श्रीनगर पहुंचे। देवप्रयाग से श्रीनगर की दूरी तक़रीबन 38 किलोमीटर है। यह एक बडा शहर है, यहां पर बैंक, मार्किट, कॉलेज, स्कूल सब कुछ है। अलकनंदा नदी यहाँ पर कुछ रुकी रुकी सी नज़र आती है। 
श्रीनगर से बीनू के एक दोस्त ने मुझे 5 लीटर मिटटी का तेल दे दिया जो सतोपंथ यात्रा के लिए था। क्योकि बद्रीनाथ में तेल मिले या ना मिले इसलिए पहले ही इंतजाम कर लिया गया।

श्रीनगर से हम दूसरे प्रयाग रुद्रप्रयाग पहुंचे। रुद्रप्रयाग भी काफी बड़ा शहर है। श्रीनगर से रुद्रप्रयाग तक की दूरी मात्र 33 किलोमीटर है। रुद्रप्रयाग पर नारद मुनि जी ने भगवान शिव की उपासना की थी। नारद जी को आशीर्वाद देने के लिए शिव ने रौद्र रूप में अवतार लिया था। यहाँ का शिव मंदिर दर्शनीय है, रुद्रप्रयाग अलकनंदा व मंदाकनी नदी के संगम पर स्तिथ है। मंदाकनी नदी केदारनाथ के पास से आती है ,अभी बीते समय में इस नदी ने बहुत प्रलय मचाया था। रुद्रप्रयाग से केदारनाथ तक की दूरी लगभग 72 किलोमीटर है। रुद्रपयाग से एक रास्ता चोपता के लिए भी जाता है, जिसे भारत का स्विट्ज़रलैंड भी कहते है, यही से तुंगनाथ मंदिर भी जाया जाता है। और एक रास्ता केदारनाथ के लिए, लकिन हमारी बस को अलकनंदा के किनारे किनारे ही जाना था बद्रीनाथ के लिए। रुद्रप्रयाग से चलकर हम गौचर होते हुए , तीसरे प्रयाग कर्णप्रयाग पहुंचे।

रुद्रप्रयाग से कर्णप्रयाग लगभग 33 किलोमीटर की दूरी पर है। यह अलकनंदा और पिंडर नदी के संगम पर स्तिथ है। यहाँ से एक रोड अल्मोड़ा ,कौसानी और नैनीताल की तरफ चला जाता है। यहां से हम चलते हुए  नंदप्रयाग पहुंचे , यह अलकनंदा और नन्दाकिनी नदी के संगम पर बसा है। यह चमोली जिले में आता है। यहां का चण्डिका मंदिर दर्शनीय है। कभी अपनी सवारी से आऊगा तब यह सारी जगह देखूंगा क्योकि अभी बस में होने के कारण यह जगह में देख नहीं पाया।

नंदप्रयाग से होते हुए हम चमोली पहुंचे फिर वहां से निकलने के बाद हमारी बस पीपलकोटी नाम की जगह रुकी। दोपहर के लगभग 2 बज रहे थे। यहाँ पर ज्यादातर सभी बस रूकती है। यहां पर  कुछ होटल ,ढाबे ,फल की दुकान व अन्य बहुत से दुकाने थी। कुछ लोगो ने खाना खाया। मेरा मन नहीं था की खाना खाऊ इसलिए माज़ा की एक बोतल ले ली गई और एक चिप्स का पैकिट। अपना काम उसी से चल गया क्योकि सुबहे तीन धारा जगह पर एक परांठा खा लिया था, उसे खाने के बाद अब तक भूख नहीं लगी।

पीपलकोटी में कुछ देर रूककर बस चल पड़ी, यहां से बदरीनाथ जी अब भी 80 किलोमीटर था। कुछ ही समय बाद हम जोशीमठ  पहुंच गए। जोशीमठ भी एक अच्छी सिटी है। जोशीमठ से ही औली को रास्ता जाता है। औली के लिए केबल कार (ट्राली ) भी चलती है। जो आपको औली घुमा कर लाती है वैसे जोशीमठ में और भी मंदिर है जो दर्शनीय है इनमे नरसिंह मंदिर जहां सर्दियों में भगवान बद्रीनाथ ( विष्णु) की पूजा होती है जब तक बद्रीनाथ मंदिर के कपाट नहीं खुल जाते है।  यर यह एक पुराना शहर है जिसकी स्थापना आदि शंकराचार्य जी ने ही की थी। उनकी पूजा स्थली भी जोशीमठ में स्थित है। जोशीमठ से कुछ दूर विष्णुप्रयाग  है, यहां धौलीगंगा अलकनंदा नदी का संगम है।

जोशीमठ से कुछ दूर गोविन्द घाट है , जहां से फूलों की घाटी व श्री हेमकुंड साहिब गुरुद्वारा के लिए रास्ता अलग हो जाता है। गोविंदघाट से कुछ ही दूरी पर पण्डुकेश्वेर नामक जगह आई , यहां पर पांडवकालीन मंदिर है जो सड़क से नीचे उतर कर अलकनंदा नदी के पास है। पांडुकेश्वर के बाद बद्रीनाथ तक का रास्ता लैंड्सस्लाइड जोन में आता है। लामबगड़ जगह तोह बहुत ही डरावनी जगह लगी ,हल्की बारिश में भी मलवा सड़क पर आ जाता है। खैर हमे कोई दिक़्कत नहीं हुई, रास्ते में कई जगह पानी बह रहा था, जिसे नाला कहते है, जब बारिश होती है तब यह बडा विकराल रूप ले लेते होंगे। अब चढाई चालू हो गई थी, दोनो तरफ विशाल उच्च पर्वत नजर आ रहे थे ओर हम इन पर्वतो के बीच में नदी के किनारे किनारे चल रहे थे और हम शाम के 5:30 पर बद्रीनाथ पहुंच गए।

बद्रीनाथ जाकर हमने एक धर्मशाला(बरेली वालो की ) में दो बड़े कमरे ले लिए। धर्मशाला बस स्टैण्ड के बिलकुल नजदीक थी। कुछ देर बाद हम सभी बद्रीनाथ मंदिर परिसर में घूम आये। मन्दिर के पास गर्म कुंड थे, जहां पर लोग नहा रहे थे, मन्दिर रात मे भी बडा सुंदर लग रहा था, कुछ देर आस पास घूमते हुए हम वापिस धर्मशाला लौट आए। जाट देवता भी आ चुके थे। बीनू का फ़ोन आ चूका था की व आज जोशीमठ ही रुक रहा है। रात को खाने में धर्मशाला में ही 70 रुपए की प्लेट मिल गई, खाना बहुत ही शुद्ध मिला, जिसको खाने के बाद हम सभी सोने के लिए चले गये।

कुछ बद्रीनाथ के बारे में :- बद्रीनाथ मन्दिर जिसे बदरीनारायण मन्दिर भी कहते है, यह मन्दिर नर व नारायण पर्वत के मध्य व अलकनंदा नदी के किनारे उत्तराखंड राज्य के चमोली में स्थित है। यह मन्दिर भगवान विष्णु के एक रूप बदरीनाथ जी को समर्पित है। रीशिकेश से बद्रीनाथ तक की सड़क से दूरी 295 किलोमीटर है। यह उत्तराखंड के चार धाम मे से एक धाम है। और पंच-बद्री में से एक बद्री है। यह मंदिर साल के छ महीने ही खुलाता है, बाकी शीतकाल में बद्रीनाथ के कपाट बंद कर दिए जाते है।

बद्रीनाथ के दर्शन करना हर हिन्दू की कामना होती है।यहां पर यात्री आकर गर्म पानी के कुण्ड में स्नान करने के पश्चात बद्रीनाथ जी के दर्शन करने के लिए जाते है, प्रसाद में कच्चे चने की दाल,  कच्ची मूंगफली की गिरी व मिश्री का प्रसाद चढ़ाया जाता है। बद्रीनाथ जी के लिए वनतुलसी की माला भी चढाई जाती है। बद्रीनाथ जी की मूर्ति शालग्रामशिला से बनी है, यह चतुर्भुज ध्यानमुद्रा में दिखती है। कहते है की इस मूर्ति को देवताओं ने नारदकुंड से निकालकर यहां पर स्थापित किया था। लेकिन बौद्ध धर्म अनुयायी ने इस मूर्ति को भगवान बुद्ध की मूर्ति समझ कर पूजा आरम्भ की। लेकिन आदी शंकराचार्य जी के सनातम धर्म प्रचार के समय बौद्ध अनुयायी इस मूर्ति को अलकनन्दा नदी मे फेंक कर तिब्बत चले गए। तब शंकराचार्य जी ने इस मूर्ति को अलकनंदा से निकाल कर इसकी पुन: स्थापना की।

बद्रीनाथ जी की एक कथा यह भी प्रचलित है की पहले यह स्थान केदार था, यहां पर भगवान शिव व पार्वती रहा करते थे, लेकिन भगवान विष्णु को यह जगह इतनी पंसद आई की उन्होने एक बच्चे का रूप बना कर, माता पार्वती को प्रसन्न कर लिया ओर बाद मे अपने लिए यह जगह उनसे ले ली।
बदरीनाथ नाम कैसे पडा इस जगह का इस पर भी एक कथा प्रचलित है। कथा के अनुसार भगवान विष्णु ने यहां पर तपस्या की। तपस्या में लीन होने के कारण भगवान बर्फ में दब गए, तब माता लक्ष्मी जी ने बद्री(बेर) का पेड बनकर भगवान को हर मौसम से बचाया। बाद मे विष्णु भगवान ने लक्ष्मी के तप को देखकर यह कहा की आपका तप भी कम नही था इसलिए आज से यह जगह बद्रीनाथ के नाम से जानी जाएगी। कहते है जहां पर भगवान ने तप किया वहां पर तप की वजह से गर्म पानी का कुंड बन गया जो आज भी वहां पर मौजूद है।

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अब कुछ फोटो देखे जाए.......


सभी दोस्त हरिद्वार में एक साथ



ऋषिकेश से देवप्रयाग के बीच में माँ गंगा 




कर्णप्रयाग




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बद्रीनाथ मंदिर दर्शन









37 comments:

  1. पूर्ण एवं सुंदर विवरण

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    1. धन्यवाद रमेश जी

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  2. काफी रोचक और विस्तृत संस्मरण...
    इस यात्रा को कई मित्र अलग अलग लिख रहे हैं तो ऐसे में बहुत मुश्किल हो जाता है कुछ अलग लिखना! आपने बिना किसी से प्रभावित हुए अपनी मौलिकता बनाये रखी है, यह अत्यंत महत्वपूर्ण हैं 👍

    चित्र बढ़िया है, उम्मीद है जल्द ही अगला भाग भी आएगा 💐

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    1. धन्यवाद पाहवा जी।
      वैसे हर एक का यात्रा लेख कुछ बातो को छोडकर अलग होता है, क्योकी हर किसी का नजरिया अलग अलग होता है। बहुत सी बाते होती है जो लेख को अलग बनाती है, बस वही लिखा है वैसे कुछ बाते ओर भी एड हो सकती थी। पर चूंकि हम सफर कर रहे थे इसलिए सफर पर ही ध्यान रखा।

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  3. वैसे तो बीनू भाई के ब्लाग द्वारा पढ रहा हू इस यात्रा को लेकिन आपका भी लेखन सराहनीय है

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    1. धन्यवाद नीरज जी।

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  4. Sachin ji bahut sunder post hai..👍👍

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    1. शुक्रिया प्रतिमा जी।

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  5. आगे कब बहुत ही सुन्दर यात्रा वृतान्त

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    1. धन्यवाद नमन भाई।

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    1. धन्यवाद श्याम भाई।

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  7. बहुत सुन्दर विवरण।

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    1. धन्यवाद बीनू भाई।

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  8. Nice post. well written.

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  9. रुद्रप्रयाग से कर्णप्रयाग लगभग 33 किलोमीटर की दूरी पर है। यह अलकनंदा और पिंडर नदी के संगम पर स्तिथ है। यहाँ से एक रोड अल्मोड़ा ,कौसानी और नैनीताल की तरफ चला जाता है। यहां से हम चलते हुए नंदप्रयाग पहुंचे , यह अलकनंदा और नन्दाकिनी नदी के संगम पर बसा है ! इसके लिए बेहतर तरीका , जैसा आपने कहा खुद की गाडी से जाओ रुकते रुकते ! सचिन भाई , पिछले साल मैंने ऐसा ही किया था ! अपनी गाडी तो नही , हाँ सार्वजनिक वाहन से गया था और जहां रात हो गयी वहीँ रुक गया ! ऐसी यात्रा और भी मजेदार बन जाती है ! हेमकुंड का फोटो आपने चलती बस से ही खींचा था क्या ? बहुत सटीक

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    1. योगी जी धन्यवाद आपका, जी सही पहचाना चलती बस से ही फोटो खीची थी. वैसे आप मेरी सीट के पीछे ही बैठे थे.

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  10. boht he sundar vyakhya ki hai aapne. aap aage jaa pate to aur bhi acha hota.

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    1. माना भाई जी शुक्रिया,क्या करे कुछ चीजें अपने बस में नहीं होती .

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  11. हेमकुंड साहेब जाने के टाईम यही रास्ता होता है ।बद्रीविशाल के दर्शन भी किये और गर्म पानी के कुण्ड में स्नान भी जय बद्रीविशाल

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  12. जी बुआ जी सही पहचाना आपने , थैंक्स

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  13. सचिन भाई आपका ब्लॉग पढ़ा नहीं बल्कि सुना
    एक अप्प read it later के द्वारा मजा आ गया

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    1. वही वाह!
      मुझे नही पता था इस एप के बारे मे। धन्यवाद राजेश जी

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  14. अकसर ऐसा होता है, हम जा कहीं और रहे होते हैं और पहुँचते कहीं और है। आपकी नियति में इस बार बद्रीनाथ तक जाना ही रहा होगा

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  15. जी सही कहा आपने..थैंक्स हर्षिता जी .

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  16. जय बद्री विशाल की....

    बद्रीनाथ जी यात्रा का प्रथम भाग बहुत अच्छा लगा....

    एक बद्रीनाथ हो आया हु...

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    1. शुक्रिया रितेश भाई

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  17. Beautifully written with nice pictures. Thx for sharing.

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    1. Welcome you on my blog and Thanks nishi sehgal

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  18. Beautifully written with nice pictures. Thx for sharing.

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  19. bahut hi sundar likha hai aap ne.... or photo to sach me kamal ke hai... hame bhi yah sab dekhne ki ichcha jaga deta hai aap ka vivaran... yatra ke photo... dhanyawad.... sachin ji

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    1. Thanks kishor purohit ji aapko yeh post achhi lagi mere liye badi kushi ki baat hai. Thanks once again..

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  20. wah maza aa gaya padhkar, meri yatra aur aapki yatra ki tithi ek hi thi bas itna fark tha ki hum 10 june 2016 ko badrinath pahunch gaye the, aur 10 june 2016 ko delhi se chale the

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    1. धन्यवाद अभयानंद जी। अगर पहले जान पहचान हो जाती आपस में तो वही मिलना भी हो जाता।

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