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Friday, March 30, 2018

जयपुर यात्रा 2018 ( दिल्ली से जयपुर)

19 जनवरी 2018

काफी दिन से कही घुमने जाना नही हो पा रहा था। मन कही जाने को कह रहा था। एक बार मन में आया की उत्तराखंड में कही जाया जाए और बर्फ में खेलने का आनंद लिया जाए। परंतु उत्तराखंड में भी कही जाना सुनिश्चित नही हो पा रहा था। एक दिन मन में एक विचार आया की क्यों ना जयपुर ही चला जाए? वैसे भी जयपुर जाने का प्लॉन हर बार रद्द हो जाता रहा है। मैं पहले भी दो दफा जयपुर जा चुका हूं, लेकिन परिवार संग नही गया था। श्रीमती जी नें भी जयपुर जाने के लिए हामी भर दी। वैसे भी वह कई साल से जयपुर जाने को बोल भी रही थी। लेकिन हर बार उधर जाना ना हो पा रहा था इसलिए मैने बोल दिया की हम कल सुबह जयपुर के लिए निकल चलेंगे। इसलिए रात में ही पैकिंग की गई और अगले दिन बेटे की स्कूल से एक दिन की छुट्टी करा ली गई। क्योकी उससे अगले दिन शनिवार था और उसकी स्कूल की छुट्टी रहती है, और संडे रात तक हम वापिस भी आ जाएगे। अब हमारे पास तीन दिन थे, जयपुर घुमने के लिए और यह ज्यादा नही तो कम भी नही थे। तो हमारा जयपुर भ्रमण कार्यक्रम पूरी तरह से बन चुका था।

19 जनवरी को लगभग दोपहर के 11 बजे हम दिल्ली से जयपुर के लिए निकल चले। दिल्ली के महिपाल पुर होते हुए गुरुग्राम पहुंचे , गुरूग्राम तक सड़क पर काफी भीड़ मिली इसलिए हमे यहां तक पहुंचने में दो घंटे से अधिक का वक्त लगा। दिल्ली से जयपुर लगभग 289 km की दूरी पर है और यहाँ तक आने में पांच से छः घंटे लग जाते है। अब हम भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग  48 पर चल रहे थे। सड़क अच्छी बनी है लेकिन इस सड़क पर बडे वाहनों का बहुत ट्रैफिक रहता है। ट्रकों, टैंकर, बस आदि वाहन साईड भी आसानी से नही देते है इसलिए ओवरटेक बहुत करने होते है। जो मन को सकून नही देता है। मुझे वह सफर अच्छा लगता है जहां पर भीड कम हो। सुबह ब्रैड व दूध का नाश्ता ही करके चले थे इसलिए भूख भी जोरों से लग रही थी। रास्ते में एक अच्छा सा रेस्टोरेंट देखा बस खाने के लिए उधर ही रूक गए। इस रेस्तरां का नाम रजवाड़ा था। खाना भी स्वादिष्ट था जब यहां से चले तब लगभग 2:30 का समय हो रहा था। इसी रोड पर आगे धारूहेड़ा नाम की जगह आती है जहां से बांये तरफ एक सड़क तिजारा किशनगढ़ होते हुए अलवर चली जाती है और यह सड़क आगे राजगढ़ होते हुए भानगढ़ भी जाती है। 

खाना खाने के बाद आगे हम कही नही रूके और नीमराना व कोटपूतली नामक जगह से गुजरते हुए सीधा जयपुर पहुंचे। समय शाम के लगभग 6 बज रहे थे। हम हवामहल, जौहरी बाजार से होते हुए, मोती डूंगरी रोड पर स्थित होटल सूर्या विला पहुंचे। यह होटल बहुत अच्छा व साफ सुथरा था। होटल के रूम में पहुंच कर थोडा आराम किया गया फिर चाय भी पी गई। लगभग शाम के 7:30 पर हम पैदल ही बिडला मन्दिर की तरफ चल पडे। होटल से तकरीबन 10 या पंद्रह मिनट ही लगते है यहां तक पहुंचने में। लेकिन एक बैटरी चलित रिक्शा कर लिया गया 20 रू में मन्दिर तक के लिए और पांच मिनट में ही बिडला मन्दिर पहुंच गए। बिड़ला मन्दिर के नजदीक ऊपर एक पहाडी पर एक किला दिख रहा था जो रात में बेहद सुंदर दिख रहा था। मैने पास ही खडे एक गार्ड से उस किले के बारे में पूछा तो उसने बताया की इस किले में एक शिव मन्दिर है जिसे एकलिंगेश्वर महादेव कहते है और यह साल में केवल एक बार ही शिवरात्रि के दौरान ही खुलता है। और इसकी बहुत मान्यता है। जिस पहाडी पर यह बना है उसे मोती डूंगरी पहाडी कहते है। मैने गार्ड को धन्यवाद कहा और बिड़ला मन्दिर में प्रवेश किया। मन्दिर में प्रवेश किया ही था की वहा के पंडित ने जल्दी आने को बोला हम दौडकर अंदर पहुंचे। सामने भगवान विष्णु जी की मूर्ति को नमस्कार किया ही था की पंडित जी ने बाहर का पर्दा गिरा दिया। अब सुबह ही दर्शन हो पाएगे लेकिन हमने दर्शन कर लिये थे इस बात की खुशी थी। मन्दिर परिसर में घुम कर हम मन्दिर से बाहर आ गए।

बिड़ला मन्दिर - यह मन्दिर बिडंला ग्रुप के द्वारा सन् 1988 में बनवाया गया। यह मन्दिर सफेद संगमरमर पत्थर से बना है और यह भगवान विष्णु व माता लक्ष्मी को समर्पित है। इसलिए इसे लक्ष्मी नारायण मन्दिर भी कहते है। काली डूंगरी पर्वत की तलहटी में बसा यह मन्दिर बहुत सुंदर है।

बिड़ला मन्दिर के पास ही एक गणेश मन्दिर है जिसको मोती डूंगरी गणेश मन्दिर भी कहते है। मन्दिर के बाहर मिठाई की दुकान से प्रसाद के लड्डू ले लिए गए। और तीन चार सीढी चढ़कर मन्दिर में पहुंचे। गणेश जी मूर्ति लाल सिंदूर से सजी हुई थी। प्रसाद चढाकर हम मन्दिर से बाहर की तरफ चल पडे। हमने कुछ फोटो भी लिए । मन्दिर में तैनात एक पुलिस कर्मी ने हमारे पूछने पर बताया की यह मन्दिर काफी साल पुराना है। और यहां स्थापित गनेश जी की मूर्ति जयपुर के महाराजा माधो सिंह (प्रथम) की एक रानी अपने पीहर मेवाड(गुजरात) से सन् 1761 में लाई थी। हम मन्दिर से बाहर आ गए और गणेश मन्दिर के सामने एक अन्य मन्दिर जो हनुमान जी को समर्पित था वहां भी दर्शन कर आए।

यहां पर हमने एक ऑटो वाले को रोका। मैने उससे कहा की हमे किसी रेस्टोरेंट पर ले चलो वह हमे एक ढाबे पर ले आया उसने बताया की यह जयपुर का नामी ढाबा है जिसका खाना बडा स्वादिष्ट होता है। ढाबे का नाम हनुमान ढाबा था जो की राजा पार्क चौक पर था। अॉटो वाले ने हमसे यहाँ तक के 50 रुपये लिए। ढाबे पर बहुत भीड़ थी जल्द ही हमे टेबल मिल गई और खाने का ऑर्डर भी दे दिया गया। मैंने पहले ही बोल दिया था की खाना कम मिर्ची का बनाना। इसलिए खाने में कोई शिकायत नहीं थी, और खाना वाक्ई स्वादिष्ट बना था। यहां खाना खाने के बाद हम वापिस होटल पहुंचे।

आज की पोस्ट में बस इतना ही... बाकी मिलते है जल्द ही अगली पोस्ट पर..........
इस यात्रा की कुछ फोटो ... 
मोती डूंगरी पहाड़ी पर वो महल और एकलिंगेश्वर महादेव मंदिर। 



बिरला मंदिर 

बिरला मंदिर 


बिड़ला मंदिर 



गणेश मंदिर 

गणेश जी की मूर्ति 


पंचमुखी हनुमान मंदिर 

हनुमान ढ़ाबा 

मैं सचिन त्यागी होटल सूर्या विला में। 

होटल का बाहरी गेट 


Wednesday, February 28, 2018

भानगढ़ किले की यात्रा

21 जनवरी 2018
भानगढ़ का क़िला 
भानगढ़ का इतिहास :
भानगढ़ क़िले को आमेर के राजा भगवंत दास ने 16 वी शताब्दी (1573 )में बनवाया था। बाद में भगवंत दास के पुत्र व राजा मान सिंह के छोटे भाई माधो सिंह ने इसे अपनी रियासत की राजधानी बना लिया। माधो सिंह मुग़ल शहंशाह अकबर के राज में उनके दीवान थे। माधो सिंह के बाद उसका पुत्र छत्र सिंह गद्दी पर बैठा। कुछ समय पश्चात हरिसिंह का शासन  भानगढ़ पर  रहा । यही से भानगढ़ का पतन शुरू हुआ। छत्र सिंह के बेटे अजब सिह ने भानगढ़ के नजदीक ही अजबगढ़ का किला बनवाया और वहीं रहने लगा। इस समय औरंगजेब का क्रूर शासन पूरे भारत में फैला हुआ था। औरंगजेब कट्टर पंथी मुसलमान था। उसके दबाव में आकर हरिसिंह के दो बेटे मुसलमान बन गए, बाद में जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह ने इन दोनो को मारकर भानगढ़ पर कब्जा कर लिया तथा माधो सिंह के वंशजों को भानगढ़ का राज्य सौंप दिया।
( यह जानकारी भानगढ़ में लगे एक पुरातत्व विभाग के बोर्ड़ व विकिपीडिया द्वारा प्राप्त जानकारी के आधार पर है।) 

यात्रा वृतांत 
कुछ दिन जयपुर में परिवार संग घुमक्कड़ी कर वापिस घर की तरफ लौट रहा था। मुझे भानगढ़ क़िले को देखने की बहुत दिन से इक्छा थी, भानगढ़ अलवर ज़िला में स्तिथ है। यह सरिस्का वन अभ्यारण के नजदीक है। इस क़िले को भूतिया क़िला कहा जाता है। इसलिए हम जयपुर से भानगढ़ की तरफ चल दिए। जयपुर से भानगढ़ की सड़क से दूरी तक़रीबन 70 किलोमीटर है जिसको तय करने में डेढ़ से दो घंटे लग जाते है। दोपहर के साढ़े बारह का समय हो रहा था जब हम जयपुर से चले। हमने जयपुर आगरा रोड पकड़ लिया। यह रोड बहुत बढ़िया बना है। जयपुर से निकलते ही पहाड़ो के बीच से निकली एक लम्बी सुरंग मिली यह कुछ-कुछ मनाली के रास्ते में ओट जगह के नजदीक वाली सुरंग जैसी थी। वैसे इन सुरंगो को बनाने में बहुत मेहनत करनी होती है। लेकिन सड़़क यातायात केे मार्ग सुगम बन जाते है। सुरंग से पहले एक टोल पर ऐसा वाक्या हुआ जिस पर मुझे अपने आप पर बहुत शर्म आयी। हुआ यूँ की में एक टोल पर लाईन में लगा था तभी एक व्यक्ति बोला की आप उधर लाइन में मत लगो इधर वाली लाईन में लगो। तब मैंने उससे कहा की मैं इधर ही लगाऊगा अपनी गाड़ी । फिर उसने बोला की यह टोल प्राइवेट गाड़ी के लिए फ्री है और आप टोल देय वाली लाईन में लगे है। तब मुझे अपनी गलती का एहसास हुआ और उस व्यक्ति को धन्यवाद बोलकर टोल बैरियर सेे बाहर गया और आगे बढ़ चला। गूगल मैप पर देखा तो भानगढ़ अभी भी तकरीबन 60 km की दूरी पर था। हमे दौसा तक इसी सड़क पर आगे बढना था फिर दौसा से एक सड़क बांंयी तरफ भानगढ़ के लिए चली जाती है, और सीधी सड़क भरतपुर की तरफ चली जाती है।

सुबहे होटल में ही नाश्ता किया था अब भूख जोरो से लग रही थी। इसलिए सड़क के किनारे पर बने एक ढ़ाबे पर पेट पूजा की गयी। खाना खाने के बाद हम आगे की और चल पड़े। जल्द ही दौसा पहुंच गए, दौसा में काफी होटल है जहा रुका जा सकता है और आसपास के दर्शनीय स्थलों को देखा जा सकता है। हम बांये रास्ते को मुड़ गए यहाँ से भानगढ़ तक़रीबन 32 km है। मतलब 40 मिनटों में हम वहां पहुंच ही जायँगे। अब रोड छोटा हो चला था कही कही सड़क निर्माण कार्य चल भी रहा था। कुल मिला कर रोड ठीक ठाक था। अब हमे ग्रामीण परिवेश में होने का अहसास हो रहा था। सड़क के दोनों तरफ गाँव दिख रहे थे। कही कही कुछ लोग राजस्थानी पहनावा पहने भी दिख रहे थे। हम शाम के लगभग चार बजे भानगढ़ पहुंचे। क़िले से कुछ दूरी पर 50 रुपयों की एक पर्ची काटी गयी। बाकि क़िले देखने का कोई टिकट नहीं था।

गाड़ी एक तरफ खड़ी कर हम क़िले में प्रवेश कर गए। प्रवेश द्वार के ही समीप हनुमान मंदिर बना है। यहाँ से आगे चलते ही पुराना बाजार आ जाता है रास्ते के दोनों तरफ दुकाने बनी है, जो कभी दो मंज़िला रही होगी। जिनको देखकर लगता है की कभी यहाँ पर बहुत बड़ा बाजार रहा होगा। आज मात्र उनके खंडर अवशेष ही बचे है। इस बड़े बाजार से होते हुए हम एक और दरवाजे पर पहुंचे। यह महल का दरवाजा है। दरवाजे के बायें तरफ एक खंडरनुमा इमारत है, और दाहिनी तरफ गोपीनाथ मंदिर है। गोपीनाथ मंदिर कभी विष्णु भगवान को समर्पित होगा लकिन फ़िलहाल यह मंदिर मूर्ति रहित है। मंदिर की बुर्ज भी नहीं है। लकिन यह मंदिर बाहर से उत्तम वास्तुकला का एक सुन्दर उदाहरण है। जब कभी यह महल आबाद रहा होगा तब यह कितना सुन्दर रहा होगा। केवल आज हम सोच ही सकते है। यह क़िला तीन तरफ से अरावली की पहाड़ियों से घिरा है। जो इसे और भी खूबसूरत बनाता होगा, लकिन आज यह एक भूतिया क़िला मात्र बन कर रह गया है। थोड़ा आगे चलने पर एक पानी की बाबड़ी है, जिसमे आज भी भरपूर पानी था। बाबड़ी के नजदीक ही सोमेश्वर महादेव मंदिर है। जो शिव को समर्पित है, यही पर हमे एक स्थानीय व्यक्ति ने बताया की अब पर्यटक इधर आने लगे है पहले केवल आसपास के लोग ही आते थे। उसने हमे यह भी बताया की यहाँ कोई भूत -प्रेत नहीं है। यहाँ केवल जंगली जानवर है जिसमे जंगली सूूअर व तेंदुआ है जो गर्मीयो में यहाँ बाबडी पानी पीने भी आते है। उसने बताया की वह यहाँ कई साल से आता है लकिन उसे आज तक यहां कोई भी ऐसी अजीब बात महसूस नहीं की जिससेे यह साबित हो की यहां पर भूत प्रेत रहते है। उसने तांत्रिक सिंघिया की कहानी को भी नकली बताया। उसने एक पहाड़ी की तरफ इशारा करतेे हुुुए, एक छतरी दिखाई  उस ने  बताया की लोग उसे तांत्रिक की छतरी  कहते है , और तरह तरह की कहानियों से जोड़ते है। जबकी वह पहले सैनिको  के लिए रही होगी जहां सेे वह दूूूर तक नजर रख सके। उसको धन्यवाद करने के बाद हम मंदिर से बाहर आ गए।
खंडर हुआ भानगढ़ 

क़िले का पहला और बाहरी द्धार 
हनुमान मंदिर पहले प्रवेश द्वार पर ही है। 

पुराने बाजार की कुछ निशानियाँ 

भानगढ़ क़िले का मानचित्र 

भानगढ़ का इतिहास 

क़िले में बाजार , दोनों तरफ दुकानें थी। 


श्रीमती जी

मैं ही हूँ सचिन त्यागी 


ये वीरानी 


दूसरा दरवाज़ा क़िले के अंदर 

गोपीनाथ मंदिर ,भानगढ़ 

मूर्ति नहीं है मंदिर में। 


मंदिर की छत अंदर से। 

देवांग गोपीनाथ  मंदिर में 
गोपीनाथ मंदिर 

पानी की बाबड़ी (कुंड )पीछे सोमेश्वर मंदिर दिखता हुआ। 

सोमेश्वर मंदिर और वह स्थानीय व्यक्ति जिस ने हमे जानकारी दी। 

सोमेश्वर महादेव शिवलिंग 

नंदी महाराज 

पहाड़ के ऊपर तांत्रिक की छतरी। 


मंदिर से थोड़ा आगे चलकर एक और दरवाजा आया जो मुख्य महल या कहें की शाही राजमहल का था। कहते है की कभी यह कई मंजिला था लकिन आज दो या तीन मंजिल का ही रह गया है वो भी जर्जर हालत में। वैसे इस क़िले को भारतीय पुरातत्व विभाग ने अपने अधिग्रहण कर लिया है। हम किले की पहली मंजिल पर पहुुुुँचे, यहां पर आकर मेेेेरी श्रीमती और बेटा ऊपर नहीं गये क्योकि वो चलते चलते बहुत थक चुके थे। मैं ही ऊपर किले की तरफ चला गया। पहली मंजिल पर एक गलियारा बना था जिस के अंदर कमरे बने थे। जो अंधेरा समेटे हुए थे। यहां मेरे अलावा ओर कोई नही दिख रहा था। इसको देखकर मैंने अनुमान लगाया की यह जेल भी हो सकती है या फिर सैनिको की विश्राम करने की जगह भी। यहाँ से ऊपर चलने पर छत आ जाती है। इसकेे ऊपर जो मंजिले थी वह आज पूरी तरह से नष्ट हो चुकी है। कभी यह बहुत सुंदर बना हुआ होगा, हर जगह चहल पहल रहती होगी। 

इस किले की बर्बादी की भी बहुत सी कहानी है। इतिहास में वर्णित है की अज़बगढ़ और भानगढ़ में युद्ध हुआ जिसमे भानगढ़ हार गया और सब मारे गए और यह किला भी तबहा हो गया। लकिन कुछ लोगो का मानना है, की भानगढ़ तबाही के पीछे एक तांत्रिक सिंघिया का श्राप है। कहते है की भानगढ़ में एक तांत्रिक रहा करता था। जो काले जादू करने में माहिर था। उसने भानगढ़ की राजकुमारी रत्नावती को देखा और उस पर मोहित हो गया। वह उसको हर कीमत पर पाना चाहता था। उसने काला जादू कर एक इत्र की शीशी को राजकुमारी तक पंहुचा दिया अगर राजकुमारी उस इत्र को लगा लेती तो वह भी उसकी तरफ मोहित हो जाती लकिन रत्नावती को उस तांत्रिक की इस चाल का पता चल गया और राजकुमारी ने वह इत्र की शीशी एक पत्थर पर फैक कर तोड दी। जिससे यह हुआ की वह पत्थर तांत्रिक के काले जादू के कारण तांत्रिक पर मोहित हो गया और उसी पत्थर के कारण तांत्रिक की मौत हो गई। लेकिन तांत्रिक सिंघिया ने मरते मरते भानगढ़ को यह श्राप दिया की भानगढ़ पूरी तरह से तबाह हो जाएगा और सभी लोग मारे जाएगे। कहते है की बाद में अजबगढ़ ने भानगढ़ पर हमला किया जिस युद्ध में सब मारे गए और उनकी आत्मा व तांत्रिक सिंघिया की आत्मा आज भी भानगढ़ में मौजूद है। इसलिए ही इस किले को भूतिया किला माना गया है।

मैं ऊपर से नीचे आ गया। अब समय भी लगभग शाम के पांच बज रहे थे। रास्ते में मुझे एक स्थानीय लडका मिला वह पास के गांव में ही रहता था। उसने बताया की वह कई बार इधर आया है। लेकिन उसे आज तक कोई भूत प्रेत नही दिखाई दिया है जबकी रात में जंगली जानवर जरूर उसके गांव तक आ जाते है। उससे बात कर हम बाहर की तरफ चल पडे। एक दो मन्दिर और बने है किले में लेकिन वह थोडा हट कर बने है इसलिए उधर ना जा सका। सीधा बाहर के गेट पर पहुंच गया, यहां गेट के साथ ही हनुमानजी का मन्दिर बना है वही पर एक बूढे बाबा बैठे थे। जो उस मन्दिर के पुजारी भी थे। उनसे कुछ लोग बात कर रहे थे । उनसे पूछ रहे थे की इस जगह को लोग भूतीया किला क्यो कहते है?  और आपने कभी कुछ महसूस किया? उन बाबा ने कहा की मुझे यहां पर कई बार कुछ अजीब महसूस हुआ है, रात में जब मन्दिर में पूजा करने के बाद जब जाता हूं तब भी लगता है की कोई है आसपास। उन्होने बताया की वह भी रात में मुख्य किले में नही जाते।

उनकी बात सुनकर मैं किले से बाहर निकल आया। और अपनी कार में बैठ, दिल्ली के लिए निकल पडा। रास्ते में कई सवाल मन में आ रहे थे की दो व्यक्तियों ने यहां पर भूत प्रेत की घटना को केवल कहानी मात्र बताया जबकी तीसरे व्यक्ति ने यहां पर कुछ अजीब होना स्वीकार किया। चलो जो भी हो मुझे यह किला देखना था और मैने देख लिया।
क़िले का आखरी द्वार और पीछे हन्टेड क़िला दिखता हुआ (जैसा की लोग कहते है )

श्रीमती जी और बेटा आराम करते हुए। 

एक गलियारा जिसमे अंदर कई कमरे बने हुए थे। 

क़िले के अंदर का दर्शय 

यहाँ घुप अँधेरा था। कैमरे के फ्लेश से फोटो में उजाला आया। 

इधर मैं अकेला ही था फिर जल्द ही बाहर आ गया। 



क़िले से गोपीनाथ मंदिर दिखता हुआ। 

एक डरावना पेड़ और एक खंडर 

क़िले की छत पर जाते हुए एक सेल्फी 

ऊपर छत पर कहते है की इससे भी ऊपर कई मंजिले थी कभी यहाँ। 


एक वीडियो भी बनाया है , जिसमे आप भानगढ़ क़िले का भृमण कर सकते है।
 वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करे।