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गुरुवार, 3 जनवरी 2019

मेरी केदारनाथ यात्रा (केदारनाथ मंदिर)_Kedarnath by Helicopter

मेरी केदारनाथ यात्रा 
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फंस गए केदारनाथ में
केदारनाथ मंदिर 

2 मई 2018, बुधवार
सुबह जल्दी सभी कार्यो से निवृत्त होकर होटल के नीचे बने एक ढाबे पर पहुँचे और चाय संग आलू के परांठो का नाश्ता कर लिया। सभी सामान गाड़ी में पैक कर दिया क्योंकि हमें आज ही केदारनाथ से वापिस आना था इसलिए सिर्फ गर्म कपड़े पहन लिए और थोड़ा खाने का सामान रखा बाकी समान हेलीपैड की पार्किंग में खड़ी गाड़ी में ही रख दिये। दो छाते भी रख लिए जिन्हें हेलीपैड पर खड़े एक कर्मचारी ने देख लिया और हेलीकॉप्टर में रखने से मना करने लगा। मैंने उससे कहा कि इन छतरी में नोक नकुली नही है और बैग में आ सकती है इसलिए नियम अनुसार यह हेलीकॉप्टर में जा सकती है, इसलिए उसने इन्हें जाने दिया। वैसे आज मौसम साफ था इनकी जररूत पड़ेगी नही क्योंकि हमें आज दोपहर के 12 बजे तक लौट आना था और पहाड़ों पर दोपहर बाद ही मौसम बिगड़ता है। तो हम ने थोड़ा समान रख लिया और हेलीकॉप्टर की आने की प्रीतिक्षा करने लगे। हमारे पास एक व्यक्ति ने जिसका आज ही जाना और लौटना था। उसने अपनी लौटने की तारिख अगले दिन की करा ली थी। उसे देखकर मेरा भी मन केदारनाथ में रुकने का बन गया। लकिन मेरी श्रीमती ने आज ही लौटने को बोल दिया। क्योंकि आज ही हम लौटने के बाद कालीमठ रुकेंगे। फिर कल आगे वापिसी भी करेंगे। इसलिए मैंने भी आज ही लौटना तय किया।  एक और बात फाटा से एक ही हेलीकॉप्टर उड़ता है। फाटा से ले जाने का कार्य भी उसी का ही होता है और केदारनाथ से आने का भी कार्य उसी का ही है। मेरे हिसाब से एक हेलिपैड पर दो हेलीकाप्टर तो अवश्य होने चाहिए जिससे सवारियों को ज्यादा इन्तजार ना करना पड़े। फाटा से केदारनाथ और केदारनाथ से फाटा तक के सफर के लिए आपको 6700 रुपये देने होते है। 

कुछ समय पश्चात एक  हेलीकॉप्टर उड़ता हुआ हमारे हेलिपैड पर उतर गया। यह सन्तरी कलर का पवन हंस कंपनी का हेलीकॉप्टर था। यह एक सरकारी कंपनी है। प्राइवेट कंपनियों के हेलीकॉप्टर तो सुबह से ही उड़ रहे थे। आधा घंटा बीत गया लेकिन हेलीकॉप्टर नही उड़ा। क्यो? क्या हुआ? यही सवाल सभी यात्री उधर बने आफिस में पूछ रहे थे। जबाव मिला कि तकनीकी खराबी है थोड़ा समय लगेगा। सुबहें के लगभग 9:30 पर हेलीकॉप्टर उड़ चला और पहले ग्रुप को ले गया। हमारा भी नम्बर लगभग 10 बजे आ ही गया और हम भी हेलीकॉप्टर पर सवार हो गए। मैं आगे बैठना चाहता था लेकिन मुझे बताया गया कि आगे सबसे हल्का भार वाला व्यक्ति ही बैठता है। और अपन का वजन 80 kg था इसलिए मैं पीछे ही बैठ गया। फाटा की एल्टीट्यूड लगभग 1550 मीटर है वही केदारनाथ की एल्टीट्यूड लगभग 3550 मीटर है। मतलब 2000 मीटर ज्यादा ऊंचाई पर पहुचना होगा वो भी 8 मिनट में। अब हमारा हेलीकॉप्टर बहुत ऊँचाई पर उड़ रहा था। मंदाकिनी नदी के दोनों तरफ वाले केदारनाथ जाने वाले रास्ते साफ दिख रहे थे। एक रास्ते पर चहल पहल दिख रही थी क्योंकि यह नया रास्ता था जो 2013 कि प्रलय के बाद बना था और दूसरी तरफ वाला जगह जगह से टूटा हुआ दिख रहा था। अब यह रास्ता बंद हो चुका है। हेलीकॉप्टर में वायुदाब के कारण हमारे कान में हवा भर जाती महसूस हो रही थी। मेरे बेटे को तो कान में दर्द भी हो गया था। पड़ोस में बैठी एक सवारी काफी डरी हुई दिख रही थी वो राम नाम का जाप कर रही थी। लेकिन मुझे हेलीकॉप्टर में बहुत अच्छा लग रहा था। हेलीकॉप्टर से बर्फीले पहाड़, नीचे बहती नदी और पूरी केदार घाटी के दर्शन जो हो रहे थे। काश में हेलीकॉप्टर में आगे बैठ पता। हेलीकॉप्टर से बर्फ के पहाड़ बेहद नजदीकी से दिख रहे थे। जिनकी एक झलक पाते ही यात्रियों की यात्रा रोमांचक हो उठती है। कुछ ही देर बाद केदारनाथ मंदिर व आसपास की इमारतें दिखने लगी थी। कुछ ही मिनटों में हम केदारनाथ हेलिपैड पर उतर चुके थे। उतरने के बाद हमें पता चला कि यहां पर कितनी ठंडी हवा चल रही थी और कितना ठंडा मौसम था। हेलीपैड से मंदिर तक की दूरी मात्र 500 मीटर ही है। हम सीधा मंदिर की तरफ ही चल पड़े चल पड़े वैसे सीधा एकदम नहीं चलना चाहिए इसका ज्ञान हमे बाद में पता चला। हुआ यू की एक बुजुर्ग दंपति हेलीकॉप्टर से आये और सीधा मंदिर आ गए। उन ऑन्टी को ऑक्सीजन की कमी जैसे माहौल में बड़ी दिक्कत हुई उनको आर्मी वाले अपने कैम्प में लेकर गए । इसलिए अगर आप हेलिकॉप्टर से आ रहे हैं तो थोड़ी देर रुके । चाय-पानी पिए या थोड़ी देर आराम करें उसके बाद चले। क्योंकि हमारी बॉडी एकदम से मौसम के अनुकूल नही हो पाती है उसको थोड़ा समय चाहिए होता है। अन्यथा आपको चक्कर आना, उल्टी होना या सर दर्द होना स्टार्ट हो सकता है। यही लक्षण मेरे बेटे को हो गया उसके कान में दर्द तो था अब सर में दर्द में दर्द भी होने लगा था। हमने उसे थोड़ी देर मंदिर के पास ही बिठाया लेकिन उसको कोई आराम नहीं लग रहा था। वह थोड़ा चिड़चिड़ापन भी महसूस कर रहा था। 
फाटा होटल से सुबहे का फोटो 


हेलिपैड 

हेलीकाप्टर आ गया। 
मन्दाकिनी नदी के दोनों तरफ वाले रास्ते दिख रहे है एक टुटा हुआ है तो एक पर कैंप लगा हुआ.

हेलीकाप्टर से केदारनाथ मंदिर व अन्य इमारते दिखती हुई। 

चलो भई चलो केदार धाम 

देवांग थोड़ा आराम कर ले। 

चलो अब दर्शन कर लेते है। 

मैं और देवांग लाइन में दर्शन के लिए 

थोड़ी देर बाद एक पंडित जी हमारे पास आए जो अंदर हमारे पूजा कराने के लिए बोल रहे थे। हमने ₹251 उनको देने तय किया और पूजन कराने के लिए हम उनके साथ मंदिर में चले गए। हम अपने साथ कुछ पूजा का सामान भी लेकर आए थे। हमने अंदर शिवलिंग को जलाभिषेक किया। यहां आकर हमें बहुत अच्छा लगा। लगा कि जैसे हम भगवान केदारनाथ के समक्ष ही बैठे हुए थे। उनकी कृपया हम पर थी, जो हमें इतने अच्छे दर्शन हुए इतने खुले दर्शन हुए। केदारनाथ मंदिर दो भागों में बना है एक बाहरी कक्ष जिसमे एक पीतल के नंदी जी विराजमान है व दीवार की चारो तरफ पांचो पाण्डवो की मूर्तियां बनी है। एक अंदर वाले मुख्य कक्ष में जहां साक्षात शिव पिंडी रूप में विराजमान है। यहां शिव ज्योतिर्लिंग(11 वे) के रूप में विराजमान है। केदारनाथ धाम के कपाट अक्षय तृतीया से भाई दूज तक भक्तों के लिए खुले रहते है। फिर बाबा शीत काल में आराम करते है। अर्थात कपाट बंद हो जाते है। बाकी सर्दियों में इनकी पूजा ऊखीमठ में होती है।

मंदिर से जुड़ी एक कथा है। कथा कहती है कि पांडव महाभारत युद्ध (कुरुक्षेत्र युद्ध ) के बाद अपने पापों से मुक्त होने के लिए भगवान शिव को ढूंढते-ढूंढते केदारखंड की इस जगह पहुँचे। लेकिन भगवान शिव पाण्डवों से अप्रसन्न थे। पाण्डवों को आया देख शिव ने भैसे का रूप धारण कर लिया और भैस-भैसे के झुंड में शामिल हो गये। लेकिन महाबली भीम ने जान लिया की शिव इसी झुंड में शामिल है और शिव को पहचान ने के लिए महाबली भीम एक गुफा के मुख के पास पैर फैलाकर  खड़े हो गए। सभी भैस और भैसे उनके पैर के बीच से होकर निकलने लगे लेकिन भैसे बने शिव ने  भीम के पैर के बीच से जाना स्वीकार नहीं किया इससे भीम ने शिव को पहचान लिया। इसके बाद शिव वहां भूमि में विलीन होने लगे तब भैसे बने भगवान शंकर को भीम ने पीठ की तरफ से पकड़ लिया और तब भगवान शंकर ने पाण्डवों को दर्शन दिए और उन्हें पापों से मुक्त कर दिया।

हम लगभग 15 मिनट मंदिर में रहे और फिर बाहर आ गए। अब हम केदारनाथ मंदिर के पीछे वाले हिस्से में पहुँचे। इधर एक बहुत बड़ी शिला थी जिसकी लोग पूजा कर रहे थे। यह शिला (बोल्डर) या बहुत बड़ा पत्थर प्रलय के समय पानी के साथ बहता हुआ आया था। कुछ लोग कहते है कि यह गांधी सरोवर(ग्लेशियर झील) से बहता हुआ आया था । 16 जून 2013 की शाम आयी प्रलय में यह बहता हुआ ठीक मंदिर के पीछे आकर रुक गया और जिस जलधारा ने प्रचंड कोहराम मचा दिया था। इस शिला की वजह से मंदिर बच गया क्योंकि इसकी वजह से धारा दो भागों में बंट गई और केदारनाथ मंदिर सुरक्षित बच गया। मैंने भी उस शिला को स्पर्श किया और मन ही मन भगवान शिव को याद किया। फिर हम मंदाकिनी नदी के तट पर भी गए।

जय केदार 









मंदिर के पीछे यही शिला बहती हुई आयी थी इसी को भीम शिला कहते है। 




बाबा जी फ़ोन वाले 


भैरोनाथ मंदिर 


हम लगभग 11:30 पर वापिस हेलीपैड पहुँच गए। काफी देर हो गयी लेकिन पवनहंस का हेलीकॉप्टर नही दिखाई दिया। मैं उनके एक ऑफिसर से बात की तो पता चला कि हेलीकॉप्टर में कुछ तकनीकी प्रॉब्लम है । ठीक होते ही सेवाएं चालू हो जाएंगी। अब हमारे पास इंतजार के अलावा कोई चारा नही था। हल्की हल्की बारिश स्टार्ट हो गयी और सफेद कोहरे ने पूरी केदारनाथ घाटी को अपने कब्जे में ले लिया। उधर देवांग(बेटे) होटल जाने की जिद्द करने लगा। एक बार मन मे आया कि चलो पैदल ही चलते है। लेकिन हेलीकॉप्टर कर्मचारी ने बताया कि मौसम साफ होते ही हेलीकॉप्टर आ जायेगा। लगभग शाम के 4 बज चुके थे। मौसम साफ हो गया।  सभी कंपनियों के हेलीकॉप्टर उड़ने चालू हो गए। हमारी पवन हंस कंपनी के हेलीकॉप्टर ने भी दो तीन राउंड लगाएं। लेकिन जब हमारा नंबर आना था। उससे पहले ही मौसम बिगड़ गया। तेज बारिश होनी स्टार्ट हो गई ऊपरी पहाड़ों पर बर्फबारी चालू हो गई जिस कारण ठंड बहुत बढ़ गयी थी। बिजली कड़क रही थी हल्का हल्का अंधेरा हो चुका था। साथ मे एक बुरी खबर भी मिली कि आज की हेलीकॉप्टर सेवाएं बंद कर दी गई है । अब कल ही सेवाएं चालू होंगी। अब हमें आज रात केदारनाथ में ही रुकना था। हम गर्म कपड़े साथ में नहीं लाये थे। देवांग को काफी ठंड लग रही थी और बुखार भी हो गया था।अब मैंने सबसे पहले मैंने रूम लेने की सोची मैं gmvn के ऑफिस गया, वहां पर मैंने 700 रुपये की दो डॉरमेट्री ले ली ली। और एक रूम में जाकर लेट गया देवांग के लिए आर्मी कैम्प से बुखार की दवाई भी ले आया और साथ मे एक मैग्गी भी बनवा ली और देवांग को खिलवा भी दी। बारिश तेज हो चुकी थी और पूरे केदारनाथ में लाइट भी चली गयी। ठंड इतनी थी कि बारिश का रुका पानी भी जम जा रहा था। देवांग सो चुका था। कमरे में एक परिवार के लोग और भी थे। जो प्रलय की बात करने लगे कि कैसे कैसे लोगो ने रात काटी। कितने मर गए और कितने कैसे कैसे बचें।  समय लगभग 7:30 का था जब में बारिश में ही आर्मी कैम्प में बनी एक मेस(रसोई) में गया। उधर 250 रुपयों की खाने की थाली मिल रही थी। एक थाली ले ली उधर फौजियों में लाइट को लेकर बात चल रही थी कि चमोली साइड बादल फट जाने के कारण पूरे एरिया में लाइट नही है। उधर मंदिर में घंटियों की आवाज आ रही थी। लेकिन इतना थका होने के कारण ना आरती में गया और ना लाइट एंड साउंड शो देखने। वैसे आज मौसम ही अपना लाइट एंड साउंड शो दिखा रहा था। मैंने ऐसी रात की कल्पना बिल्कुल भी नही की थी जैसी आज की रात थी मेरी केदारनाथ में। खाने की थाली रूम तक लेकर आया। मेरा बेटा तो पहले ही सो चुका था इसीलिए उसको उठाया नही और हम दोनों ने ही वह खाना खाया और सोने के लिए चले गए।
हेलीपैड पर अपना हेलीकाप्टर नहीं था। 

मौसम ख़राब होना शुरू हो गया था। 


रात को इतनी ठण्ड थी की बारिश का पानी भी जम जा रहा था टीन से गिरता पानी बर्फ बना हुआ है फोटो में 

अगले दिन( 03 मई 2018)
सुबह 6 बजे के आसपास आँख खुली। अब बारिश रुक चुकी थी लेकिन सर्दी बहुत थी, खैर बिस्तर से उठ गए। कैम्प के नजदीक बने टॉयलेट में फ्रेश हो आया। अब उजाला हो चुका था। मेरा बेटा भी उठ चुका था अब वह बिल्कुल सही दिख रहा था। सर दर्द या बुखार बिल्कुल नही था उसको। उठते ही उसने मेरा कैमरा लिया और बाहर कुछ फोटो लेने लगा। बाहर आज का नजारा कल से कुछ अलग था। केदारनाथ के तीनों तरफ ऊपर बर्फीली चोटियां है जिनपर ताज़ी पड़ी बर्फ  चमक रही थी। सूर्य की कुछ किरण चोटियों पर पड़ रही थी जिससे वह स्वर्ण सी लग रही थी। शीतल हवा चल रही थी। 
सुबहे मौसम साफ़ था। 

सुबहे 



अब कुछ चाय की दुकानें खुल चुकी थी और हमने गरमा गरम चाय पी और हेलीपैड की तरफ चल पड़े। सुबहें लगभग 7 बजे हेलीकॉप्टर सेवा स्टार्ट हो गयी थी । लेकिन अभी हमारे वाला हेलीकॉप्टर आता नही दिख रहा था। थोड़ी देर बाद देवांग तेज़ी से बोला कि पा...पा वो देखो हमारा हेलीकॉप्टर आ गया मैंने देखा कि सन्तरी रंग का हेलीकॉप्टर उड़ता आ रहा है। और देवांग के मुख पर एक खुशी भी थी। पहले नंबर हमारा ही था इसलिए  हम हेलीकॉप्टर में सवार होकर कुछ ही मिनटो में फाटा पहुँच गए और अपनी कार लेकर वापसी के लिए चल पड़े। जाना तो हमे कालीमठ और त्रिजुनिनारायन मंदिर भी था। लेकिन अब कार्यक्रम बिगड़ चुका था इसलिए यह जगह कभी आग की यात्रा में देखी जाएंगी और हम लगभग शाम के सात बजे हरिद्वार पहुँच गए जहाँ रात में रुककर अगले दिन आपने घर को निकल गए।
हेलीपैड पर 

देवांग हेलीकाप्टर में 

रुद्रप्रयाग 

देवप्रयाग 

हरिद्वार 

मैं सचिन त्यागी 

यात्रा समाप्त।

मंगलवार, 1 जनवरी 2019

मेरी केदारनाथ यात्रा (देवलगढ़ मंदिर)

मेरी केदारनाथ यात्रा
इस यात्रा को शुरुआत से पढ़े 
देवलगढ़ मंदिर व धारा देवी मंदिर
गौरा देवी टेम्पल , देवलगढ़ (उत्तराखंड )

01 मई 2018, बुधवार
खिरसू से देवलगढ़ मंदिर तक की दूरी लगभग 18 किलोमीटर है इतनी दूरी कि आप अपनी सवारी से लगभग तीस से चालिस मिनटों में पूरी कर सकते है। और लगभग इतनी  ही दूरी श्रीनगर से भी है। जैसे ही हम ख़िरसू से निकले एक महिला ने हमसे लिफ्ट मांगी। उसको श्रीनगर जाना था अपनी बिटिया से मिलने। उसकी बेटी उधर ही पढ़ रही है। हमने बताया कि हम देवलगढ़ जा रहे है उसने कहा कोई बात नही आप देवलगढ़ वाले तिराहे पर उतार देना। उसने बताया कि उसका पति ख़िरसू GMVN  गेस्ट हाउस में ही कार्य करता है। उसके तीन बच्चे है एक लड़की दिल्ली में जॉब करती है। बेटा देहरादून में पढ़ रहा है और एक बिटिया श्रीनगर में पढ़ रही है। जिससे वो आज मिलने जा रही है। कुछ ही मिनटों में हमने उसे तिराहे पर छोड़ दिया। और हम बांये तरफ मुड़ गए। यही रास्ता देवलगढ़ जाता है और आगे धारी देवी के पास कल्यासोड़ में मैन रोड पर मिल जाता है। रास्ते में एक गांव का नाम था मंडोली। मैं भी दिल्ली के एक गांव मंडोली से ही हूं। लेकिन यह हमारे गांव की तरफ प्रदुषित नही था। दिल्ली व एनसीआर आज बहुत प्रदुषित हो चुके है। लेकिन इधर ही हवा स्वच्छ थी लेकिन हम इधर रुके नही। फिर आगे देवलगढ़ ही जाकर रुके। हम लगभग सुबह के 9:40 पर इधर पहुँच गए थे।

देवलगढ़ मंदिरों का एक समूह है यहां पर कई मंदिर है मुख्य यहां पर राजराजेश्वरी मंदिर, गोरा देवी मंदिर,  काल भैरव का मंदिर व गुफा है। गुफा जो नीचे सड़क के पास ही है। पुराने समय में उत्तराखंड 52 छोटे-छोटे गढ़ो(रियासतों) में बटा हुआ था। इसलिए इसे गढ़वाल भी कहा जाता है। राजा अजय पाल जी ने इन 52 गढ़ो में से 48 गढ़ों को जीतकर अपनी राजधानी चांदपुर गढ़ी से बदलकर देवलगढ़ में बनाई लेकिन फिर 6 वर्षों बाद उन्होंने अपनी नई राजधानी अलकनंदा नदी के किनारे श्रीनगर में बसाई बनाई। वैसे वह गर्मियों में देवलगढ़ रहते थे। और सर्दियों में श्रीनगर।

राज राजेश्वरी मंदिर मंदिर का निर्माण 15 वी शताब्दी में राजा अजय पाल के शासनकाल में कराया गया यह तीन मंजिला मंदिर है, तीसरी मंजिल पर ही मुख्य मंदिर है। यहां पर माता की स्वर्ण मूर्ति व कुछ अन्य प्रतिमाएं भी रखी गई है। यहां पर महाकाली यंत्र, मां कामख्या यंत्र, महालक्ष्मी यंत्र, बगलामुखी यंत्र व श्रीयंत्र भी रखे हुए है। और यहां पर इनकी विशेष पूजा होती है। यहां पर कई सालों से अखंड जोत भी जलती आ रही है। राजराजेश्वरी को शाही परिवार (राज परिवार) व ब्राह्मणों की कुलदेवी माना गया है। इनको तारा देवी, भैरवी, त्रिपुर सुंदरी, धूमावती  व मातंगी के नाम से भी जाना जाता है। यह ऐश्वर्य व मोक्ष देने वाली देवी हैं।

गौरा देवी मंदिर भी एक प्राचीन मंदिर है। लेकिन यह तब बना जब यहां पर राजराजेश्वरी मंदिर की स्थापना हो चुकी थी। चूंकि राजराजेश्वरी राजपरिवार की कुलदेवी थी। इसलिए प्रजा के लिए भी गौरा देवी का मंदिर बनवाया गया। गोरा देवी जी को गिरिजा देवी(पार्वती) जी भी कहा जाता है। और यह आसपास के गांव की कुलदेवी है। इनकी बहुत मान्यता है। आज भी वैशाखी के दिन यहां पर बहुत बड़ा मेला लगता है।
राजा का चबूतरा नाम से एक जगह और इधर बनी है  कहते है कि इस जगह पर  राजा अजय पाल सिंह जी बैठते थे और न्याय करते थे।  इसी पर पाली भाषा में कुछ लिखा भी गया है कहते है कि यह उनके न्याय की की कहानियां हैं। मंदिर मुख्य मार्ग से थोड़ा सा ऊपर बना है मंदिर तक जाने के लिए भी दो रास्ते हैं। दोनों ही एक दूसरे के विपरीत बने हैं। मैंने आगे वाले रास्ते से जाना तय किया क्योंकि यह थोड़ा नजदीक था। हम तकरीबन थोड़ा ही ऊपर पहुंचे थे। कि एक पुराना मंदिर हमें देखने को मिला यह गोरा देवी का मंदिर था। यह मंदिर भी आदि शंकराचार्य द्वारा जी के द्वारा ही जीर्णोद्धार किया गया है। यह लगभग केदारनाथ जैसी शैली में ही बना है। मैं इस शैली का नाम तो नहीं जानता कि यह कौन सी शैली में बना है लेकिन लगभग देखने में वही पत्थर वही, चिनाई उसी मुद्रा में खड़ा हुआ है जैसा केदारनाथ। गोरा देवी मंदिर के बाएं तरफ एक छोटा सा मंदिर है शायद वो किसी द्वारपाल का मंदिर होगा और एक उससे थोड़ा सा बड़ा मंदिर थोड़ा सा नीचे दाएं तरफ है इसमें गरुड़ पर बैठे भगवान विष्णु ही हैं। इन मंदिरों को देखकर हम थोड़ा ऊपर चल पड़े थोड़ा सा ऊपर चलने के चलते ही बाएं हाथ पर एक चबूतरा बना हुआ है। उसी के पास एक कुआं है, कुआं थोड़ा ऊपर है। और अब टूट-फूट भी चुका है। इसलिए हम उधर नहीं गए। हम केवल राजा के चबूतरे तक ही गये। यहां से थोड़ा आगे चलकर राजराजेश्वरी मंदिर आ जाता है। थोड़ी सीढ़िया चढ़नी होती है। यहां हमारे अलावा कोई नहीं दिख रहा था। इधर बहुत शांति थी। हवा का शोर गीत गाता सा प्रतीत हो रहा था। पेड़ो के पत्तों की आवाज जो एक दूसरे से टकराने पर बन रही थी। वह भी स्पष्ट सुनाई दे रही थी। थोड़ा आगे चले थे कि एक घर दिखा। उसमें आवाज लगा कर हमने पूछा कि मंदिर कहां पर है? तो उधर से एक पंडित जी आए। मुझे नाम तो पता नही पर शायद नौटियाल जी थे । यह यहां के मुख्य पुजारी है। यह हमें मंदिर के ऊपर के कक्ष में लेकर गए। उन्होंने हमें श्री यंत्र व अन्य मूर्तिया दिखलायी जो मंदिर में बड़े प्राचीन काल से रखी है।उन्होंने बताया कि राजराजेश्वरी माता, राजाओं की कुलदेवी है। और राजा इन्हीं की पूजा करते थे और इनसे ही युद्ध मे विजय और धन व अच्छा राजपाट प्राप्त करने के लिए वर मांगते थे।

मैंने फ़ोटो खींचना चाहा तो पुजारी जी ने मना कर दिया। हम कुछ देर मंदिर में बैठे रहे फिर नीचे उतर आए। यह मंदिर अन्य मंदिरों के तरह नहीं हैं। ऐसा लगता ही नहीं कि हम मंदिर में है। ऐसा लगता है कि जैसे हम किसी पहाड़ी घर पर है। मतलब मंदिर की बनावट घर जैसी है। यहां आकर मुझे बड़ा अच्छा लगा ऐसा लगा कि कि मैं वाकई में किसी शक्ति के पास हूं । यहां का वातावरण बहुत स्वच्छ व शांतमय था। पुजारी जी भी बड़े सज्जन व सीधे सादे लगे। हमे बड़े आराम से शांति से दर्शन हुए। पुजारी जी का व्यवहार और इस मंदिर का इतिहास जानकर मन खुश हो गया। 

तभी मेरा बेटा देवांग जमीन पर गिर गया चोट तो नही लगी पर मेरा छोटा कैमरा टूट गया। जिस कारण देवांग परेशान हो गया। क्योंकि वो कैमरा मैंने उसे ही दे दिया था। और वह अब पूरे ट्रिप पर फ़ोटो नही खींच पाएगा यह सोच कर वह ज्यादा उपसेट था। कुछ ही देर में वह और बच्चों की तरह सब भूल गया और सही भी हो गया। कुछ समय बाद हम नीचे उतर आये और कार में बैठ कर आगे धारा देवी की तरफ चल पड़े।
नीचे सड़क से  मंदिर का रास्ता। 


देवांग 

गौरा देवी मंदिर प्रवेश द्वार 

गौरादेवी मंदिर 


मंदिर के अंदर 

एक अन्य मंदिर 


राजराजेश्वरी मंदिर को जाता रास्ता। 

राजा का चबूतरा और कुंआ भी दिखता हुआ 

राजराजेश्वरी मंदिर 




धारा देवी मंदिर (धारी देवी)

हम देवलगढ़ से कल्यासोड़ मात्र आधे घंटे में ही पहुँच गए दूरी लगभग 14 km तय की गई। पिछली बार जब में बद्रीनाथ जी व चोपता गया था। इसी रास्ते से होते हुए गया था लेकिन तब भी धारा देवी के दर्शन नही किये थे। इसलिए अबकी बार दर्शन जरूर करूँगा यह पहले से ही तय कर चुका था। मैंने गाड़ी को नीचे नदी के किनारे ही लगा दिया। और पतले से लोहे के पुल से होते हुए मैन मंदिर में प्रवेश किया। ज्यादातर लोग जमीन पर बैठे हुए थे। और तीन चार पंडे- पुजारी बारी बारी से नीचे बैठे लोगों को बुला रहे थे और बड़े आराम से पूजा करवा रहे थे। हमारा भी नंबर आ ही गया और हमने भी माँ धारा देवी जी की पूजा बड़े आदर से की। इन देवी को उत्तराखंड की रक्षा करने वाली देवी माना गया है। यह हिमालय पुत्री पार्वती माता ही है। कुछ लोगो का मानना है। कि जब डैम बनने के कारण इनको इधर से हटाया गया तो यह गुस्सा हो उठी थी। जिस कारण केदारनाथ में प्रलय आ गयी थी। अब हम मंदिर से बाहर आ गए और अलकनंदा नदी के तट पर भी गए। कुछ देर बाद इधर बिताने के बाद हम आगे सफर पर चल पड़े।






आज हमें फाटा हेलीपैड के आस पास रुकना था क्योंकि हमें कल सुबहें 7 बजे फाटा से हेलिकॉप्टर द्वारा केदारनाथ पहुचना था। कल्यासोड़ से फाटा लगभग 80km की दूरी पर है और यह दूरी तय करने में हमे लगभग 3 से साढ़े तीन घंटे लग ही जायंगे। आगे हम रुद्रप्रयाग रुके इधर एक होटल पर खाना भी खाया और रुद्रप्रयाग से केदारनाथ वाले रास्ते जो की मंदाकनी नदी के साथ साथ चलता है मुड़ गए। रुद्रप्रयाग से एक रास्ता अलकनंदा नदी के साथ साथ बद्रीनाथ जी को चला जाता है। अगस्तमुनि, कुंड व गुप्तकाशी होते हुए हम शाम के लगभग 4 बजे फाटा पहुँच गए। हेलीपैड से कल की पूरी जानकारी ले ली और पास मेंं ही होटल देेेख लिया रुकने के लिए। यह एक  नया  होटल था फ़िलहाल होटल का  नाम भूल गया हूँ, लकिन नंबर मेरे पास है। (9582970010 प्रमोद फाटा ). लकिन हम इसके पहले ग्राहक थे। होटल थोड़ा महंगा मिला 2000 प्रति दिन के हिसाब से क्योंकि चार धाम यात्रा शुरू हो चुकी है और इस दौरान होटल व अन्य सेवाएं महंगी मिलती है। । और हम रात को इधर ही रुक गए.....
रास्ते में कही किसी जगह से दिखता चोखम्बा पर्वत 

फाटा 

फाटा होटल 

फाटा 

यात्रा अभी जारी है. .....