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Sunday, January 14, 2018

Tajmahal, ताजमहल

25 दिसम्बर 2016
ताजमहल 

यह यात्रा साल 2016 दिसम्बर माह में की गयी थी। मैं ओरछा यात्रा कर वापिस घर लौट रहा था। शाम के तकरीबन 6 बजे रहे थे। अब हल्का हल्का अंधेरा हो चला था। इसलिए हमने आगरा रूकना तय किया। इस यात्रा में मैं और मेरा छोटा सा परिवार (पत्नी व बेटा) सफर कर रहे थे। बेटे ने ताजमहल देखने की ख्वाहिश भी जाहिर की। हम सीधे ताजमहल पहुंचे। इस समय तक ताजमहल की टिकेट खिडकी बंद हो चुकी थी। इसलिए ताजमहल से कुछ दूरी पर ही एक होटल ले लिया गया। होटल पहुंचने पर थोडी देर सुस्ताने व चाय पीने के बाद हम आगरा की लोकल मार्किट देखने निकल पडे। वैसे तो आगरा कई बार गया हूं, लेकिन ताजमहल के दीदार हमेशा बाहर से ही किये थे। कई बार घर परिवार व दोस्तो के साथ भी प्रोग्राम बना की चलो आगरा हो आते है पर हर बार कुछ ना कुछ काम पड जाता या फिर यात्रा ही कैंसल हो जाती और आगरा आना खटाई में पड जाता। और इस बार तो ताजमहल देखना तय भी नही था और हम आज आगरा में थे। वैसे कई बार ऐसा हो जाता है

हम होटल से ऑटो में बैठ कर सीधा आगरे के सदर बाजार पहुंचे। आज बहुत भीड भी थी सभी लोग क्रिसमस के फैस्टीवल को एंजॉय कर रहे थे। हम एक गली में पहुचें यहां पर बहुत से व तरह तरह के खाने की चीजो के स्टॉल लगे हुए थे। हमने पहले पेट पूजा की फिर कुछ खरीदारी भी की। यहां पर बहुत सर्दी हो रही थी। हवा भी बहुत ठंडी व तेज चल रही थी मतलब शीत लहर थी। तब एक जनाब मुझसे बोले की सर यहां पर हर चीज दिल्ली से दुगनी है। गर्मी भी, सर्दी भी और मंहगाई भी। उस व्यक्ति की बात सुनकर वहा पर ओर लोगो में भी बात होने लगी। और हम कुछ समय मार्किट में बिता कर वापिस होटल आ गए।

27 दिसम्बर 2016
सुबह जल्दी उठ गए। नहा धोकर सीधा पैदल ही ताजमहल की तरफ चल पडे। होटल से लगभग आधा किलोमीटर की दूरी पर ही ताजमहल था। रास्ते में एक चाय की दुकान खुली हुई मिली, उसने आग भी जलाई हुई थी उसने हम वही बैठ कर चाय व बिस्किट का नाश्ता कर लिए। थोडी देर के बाद हम ताजमहल के टिकट घर पर थे। टिकट की दर भारतिय सैलानी के लिए 40 रूपये व विदेशी सैलानी के लिए लगभग 500 रूपये थी। सुबह के 6:30 से शाम के 7 बजे तक ताजमहल सैलानीयो के लिए खुला रहता है। लेकिन हर शुक्रवार को यह बंद रहता है। ताजमहल की सुरक्षा में लगे सिपाही बहुत मुस्तैद लगे। वह खाने पीने की वस्तु व किसी भी प्रकार की नशे की चीजों को अंदर नही जाने देते है। इसका उदाहरण यह है की मेरे बेटे ने टिकटेक की डब्बी ली खाने के लिए। यह एक प्रकार की कैंडी होती है जो एक सुरक्षा कर्मी ने उस से ले कर एक पेटी में डाल दी। मैने उससे वह मांगी तो उसने नही दी। फिर मैने भी ज्यादा बहस नही की, जबकी देवांग रो रहा था। फिर हमने ताजमहल में प्रवेश किया। और हां एक बात सुरक्षा कर्मी  ताजमहल में कैमरा, मोबाईल व पानी की बोतल ले जाने देते है।
अब हम एक गेट में पहुंचे, यहां से ताजमहल बहुत सुंदर दिख रहा था। लेकिन धुंध के कारण स्पष्ट नही दिख पा रहा था। दूर से हल्का हल्का पर खूबसूरत दिख रहा था।जैसे कभी घर में कांच के एक डब्बे में बंद ताजमहल की कलाकृति दिखती थी। यह दृश्य शायद उससे भी अच्छा था। सफेद संगमरमर के पत्थर से बना यह प्यार की निशानी इमारत जो विश्व भर में अपनी खूबसूरती के लिए प्रसिद्ध है। वाकई पहली झलक में इतनी सुंदर लगती है की बस लोग इसे देखते ही रह जाते है। जब हम वहां पहुंचे तब लगभग विदेशी सैलानियों की तादात ज्यादा थी। कुछ हमने उनसे तो कुछ हमने उनके फोटो खींचे। मुझे ताजमहल दिल्ली स्थित हुमायूँ का मकबरे की कॉपी लगी बस ताजमहल में चारो तरफ मिनारे है जो हुमायूँ के मकबरे में नही है। और यह सफेद संगमरमर पत्थर से बना है और वह लाल बलुआ पत्थर से। बाकी दोनो चारबाग शैली पर बने है, मतलब चारो तरफ बाग- बागीचे और बीच में एक चबूतरे पर मुख्य इमारत। जबकी कुछ लोगो का मानना है की इस इमारत की वास्तुकला शाहजहाँ नें खुद बनाई थी।

हम बाग व फव्वारे के बीच से होते हुए ऊपर चबूतरे पर बनी सीढियों से होकर ऊपर पहुंचे। हमने पन्नी के कवर निकाल कर जूतो पर पहन लिया। यह एक जरूरी कार्य होता है ताजमहल में प्रवेश करने से पहले। ताजमहल के दोनो तरफ लाल रंग की मस्जिद बनी है। जिन्हे देखकर हम ताजमहल में पहुँचे, ताजमहल के बीचो बीच एक कक्ष है जहां पर मुमताज महल व शाहजहाँ की नकली कब्र बनी है। असली कब्र नीचे तहखाना में बनी है। लेकिन नीचे जाना प्रशासन की तरफ से मना है। मुख्य कक्ष के चारो तरफ एक जैसे कमरे बने है। जहां पर बहुत सी संगमरमर के पत्थर की बनी जालीयां लगी है और बहुत सी नक्काशी देखने को मिलती है। ताजमहल एक उत्तम कलाकृति की दृष्टि से एक बेहतरीन इमारत है जिसे हर कोई देखना पंसद करता है। इसकी एक बात मुझे अच्छी यह लगी की ताजमहल को चाहे किसी भी दिशा से देख लो यह हर दिशा, हर तरफ से एक सा दिखता है। यह यमुना नदी के किनारे बना है वैसे पहले ज्यादातर हर किला व इमारत या कोई भी बडा शहर नदी के किनारे ही बनता था क्योकी नदी ही आवागमन का मुख्य स्रोत होती थी। और नदी ही अर्थ व्यवस्था का मुख्य स्रोत होती थी।

अब हम ताजमहल से चलकर, ताजमहल के संग्रहालय में पहुँचे। यहां पर भी अंदर विडियो बनाना व फोटो खींचने की मनायी है। यहां आकर ताजमहल का इतिहास का पता चलता है। उस समय के नक्शे, पत्थरो के नमूने, पत्थरो को चिपकाने की कला, मजदूरो के औजारो व बहुत सी अन्य जानकारी का पता चलता है। यहां पर कुछ बर्तन भी रखे थे जो कभी शाही परिवार अपने उपयोग में लाता था। एक पात्र ऐसा था जिसमे खाना परोसा जाता था यदि खाने में जहर होता था तो पात्र का रंग बदल जाता था। यहां आकर पता चला की ताजमहल को बनाने में तकरीबन 20000 मजदूर लगे। कई सौ हाथियों द्वारा बडे बडे पत्थरो को ढोया गया। ताजमहल तकरीबन सन् 1632 में बनना शुरू हुआ और सन् 1652 तक बन कर तैयार हुआ। ताजमहल को बनने में तकरीबन 20 वर्षो का समय लगा। और बाद में कुछ वर्ष तो इसको खूबसूरत बनाने में लगे। इसमे तरह तरह की पेंटिंग व रत्न लगाये गए, जिन्हे बाद में अंग्रेजी हुकुमत नें वहां से निकाल लिया। ताजमहल को बनाने में जनाब उस्ताद अहमद लाहौरी का मुख्य योगदान रहा इनके दिशा निर्देश पर ही ताजमहल इमारत बनी। मतलब यही ताजमहल के प्रमुख वास्तुकार थे।

ताजमहल एक मकबरा है जिसे मुगल शहंशाह शाहजंहा ने अपनी सबसे प्यारी बेग़म मुमताज महल की याद में बनवाया था। शाहजहां अपनी इस बेग़म से सबसे ज्यादा मोहब्बत करते थे। मुमताज महल का इंतकाल अपने 14 बच्चे को जन्म देते समय हो गया था। उनकी मृत्यु सन् 1631 में हुई। बाद में सन् 1666 में शाहजहाँ की भी मृत्यु हो गई तब उनके बेटे औरंगजेब ने उनको भी मुमताज महल की कब्र के बराबर में दफना दिया।
सुबह से घुमते घुमते काफी वक्त हो चला था। भूख भी जोरो से लग रही थी इसलिए हम ताजमहल से बाहर आ गए। ताजमहल से बाहर सड़क तक पहुंचने के लिए तकरीबन 1 किमी पैदल चलना होता है। यह सफर हमने घोडा गाडी से किया। काफी दिनो से तांगे में नही बैठे थे तो सोचा चलो आज बैठ लेते है जबकी इसके लिए हमे100 रूपये चुकाने पडे। वैसे यह सफर बैटरी रिक्शा से भी तय किया जा सकता है जिसका वह दस रूपया लेते है। तांगे से सड़क पर उतरे और होटल की तरफ चल पडे। होटल पहुंच कर छोले भटूरे व रायते का नाश्ता किया गया। फिर हम घर की तरफ चल पडे। रास्ते में हमने पन्छी पेठे वाले से पेठा भी खरीदा और सिकंदरा रूके।

सिकंदरा मुगल सम्राट अकबर का मकबरा है। यहां पर अकबर की कब्र बनी है। इसका निर्माण खुद अकबर ने ही कराया लेकिन सन् 1605 में अकबर के निधन के बाद उनके पुत्र जहांगीर ने इसे पूरा कराया। यह बाहर से लाल बलुआ पत्थर से बना है और अंदर संगमरमर पत्थर लगा है। मकबरे के बाहर चारो तरफ (रास्ता छोडकर) बगीचा बना है। जिसमें तरह तरह के पेड पौधे लगे है साथ में कई प्रजाति के हिरणो को भी रखा गया है। जिन्हे देखना बहुत अच्छा लगता है और अलग तरह का आनंद देता है। यहां पर हम कुछ समय व्यतीत करने के पश्चात वापिस दिल्ली अपने घर की तरफ चल पडे।

अब इस यात्रा की कुछ फोटो देखीं जाएं......... 

ताजमहल के बाहरी दरवाजे से ऐसे होते है ताज के दीदार 

धुंध कोहरे के पार वाह ताज 

ताजमहल का नक्शा 

मैं और मेरा परिवार 

देवांग ताजमहल की बुर्ज पकड़ते हुए 

जामा मस्जिद 

मस्जिद 

मैं सचिन त्यागी 

संगेमरमर पत्थर पर नक्काशी 

ताज 

ताज 

देवांग ताज की मीनार के दरवाजे पर। 

मीनार 


यमुना नदी, आगरा 




ताज संग्रहालय 


घोडा गाड़ी तांगा 





सिकंदरा , मुग़ल सम्राट अकबर का मकबरा 



मुख्य मकबरा 

मकबरे के अंदर 

मकबरे के अंदर 

अकबर की कब्र तक जाता गलियारा 

अकबर की कब्र 

हिरन 

लोधी का मकबरा 

Wednesday, January 3, 2018

CHOPTA TUNGNATH YATRA 2017

Friday, September 22, 2017

उत्तराखंड के एक गाँव बरसुडी की यात्रा (मेडिकल कैम्प व वापसी)

अब तक आपने पढा की हम कुछ दोस्त अपने अपने शहरो से बरसुडी गांव आए। हमने यहां पर बच्चो के लिए बरसुडी के स्कूल में एजूकेशन कैम्प लगाया ।
अब आगे...
14,aug,2017
सुबह आराम से सात बजे उठा । क्योकि आज कैम्प बरसुडी में ही लगाना था। उठते ही मैं पंचायत भवन पहुंचा। यहां पर मुरादाबाद से आए दोस्त योगेश शर्मा जी भी मौजूद थे। कुछ देर हम साथ बैठे रहे । कल व आज की चर्चा चली। फिर मैं वापिस हरीश जी के घर पहुंचा। उन्होने चाय बना दी थी। चाय के साथ उनसे बात होती रही। आज वह नीचे शहर की तरफ जा रहे थे। कल 15 अगस्त है इसलिए स्कूल मे बच्चो को दी जाने वाली मिठाई लेने शहर जा रहे थे। जब मैं स्कूल में पढता था तब हमे भी लड्डू मिला करते थे। वह समय याद आ जाता है कभी कभी। हरीश जी चले गए। हम भी नहा- धौकर पंचायत भवन पहुंच गए। आज यहां पर मेडिकल कैम्प लगाया जाएगा। मेडिकल कैम्प के संचालक के लिए डॉ प्रदीप त्यागी जी व डॉ अजय त्यागी जी को जिम्मेदारी दी गई। यह दोनो ही मुख्य डॉक्टर रहेंगे जो मरीजों की जांच व जरूरी सलाह देंगे। लेकिन गांव के कुछ लोग हिन्दी नही समझते है वह सिर्फ गढ़वाली ही जानते है ऐसे मरीजो के लिए श्री मति शशि जी जो उत्तराखंड की ही रहने वाली है और एक अध्यापिका भी है वह ऐसे मरीजो और डॉक्टर के बीच संवाद कराएगी। दवाई बांटने का जिम्मा मुझ पर व नरेंद्र चौहान जी पर था। लगभग सुबह के 9 बजे हमने बैनर, टेबल पर दवाई लगा कर सारी व्यवस्था कर दी। लेकिन कुछ दवाई जो कल ही आ जानी थी वह किसी कारणवश नही आ पाई। वह दवाई गुमखाल में रखी थी इसलिए पानीपत के सचिन कुमार जांगडा व राजस्थान से आये एक दोस्त रजत शर्मा जी बाईक पर उन दवाइयो को लेने चले गए। 
बरसुडी की सुबहा 


बरसुडी की सुबहा और केले के खेत 

टमाटर 

मेडिकल कैंप का बैनर 

कैंप में आते लोग 

डॉक्टर्स और शशि जी अपना अपना कार्य करते हुए। 

डॉ अजय जी मरीज से वार्ता कलाप करते हुए। 

मेडिसिन 

डॉ. प्रदीप जी मरीजों का इलाज करते हुए। 

बच्चे हो या बूढ़े सभी मेडिकल कैंप में आये। 

हम दोस्तों की एक साथ सेल्फी। 

अमन मल्लिक जी और मैं सचिन 

शशि नेगी जी और मैं सचिन एक सेल्फी में 

मैं और बीनू के चाचा जी( भीम दत्त कुकरेती जी )

गांव के बुजुर्ग कैंप में आते हुए 

बरसुडी आने जाने वाले रास्ते पर लैंड स्लाइड हो गया था हमारे घुमक्कड़ साथियो ने पत्थर हटा कर बाइक के लिए रास्ता बनाया था। उसी पल का एक फोटो। 

हलवाई नें नाश्ते में भरवा कचौडी व चाय बनाई। जिसका स्वाद हम घुमक्कड दोस्त व गांव वासियों ने भी लिया। नाश्ते के बाद सभी को खाने के लिए बेसन के लड्डू भी दिए गए। मरीजो में ज्यादातर संख्या बुजुर्गों की ही थी। हमारे दोनो डॉक्टर  बहुत अच्छी तरह से मरीजों की समस्या को सुन रहे थे व उन्हे जरूरी बातो के अलावा दवाई भी दे रहे थे। कुछ मरीजों को दवाई नहीं मिली थी उनको दवाई घर जाकर देने को भी कहा। मेडिकल कैंप में शामिल होने बहुत से लोग आ रहे थे। जिसको देखकर हम सभी खुश थे। बरसुडी गांव में कोई डॉक्टर या किसी भी प्रकार डिस्पैंसरी नहीं है इसलिए बीनू भाई ने मेडिकल कैंप लगाने की सलाह दी। जिसे आज हम सफल होता देख रहे थे।

आज हमारे बहुत से घुमक्कड़ साथी अपने अपने घर लौट रहे थे। कुछ सुबह ही चले गए थे। कुछ जाने की तैयारी कर रहे थे। बाकी कुछ साथी मेडिकल कैम्प को पूरा करने के बाद कल जाएगे। मै भी तकरीबन 11 बजे बरसुडी से चल पडा। कैम्प अभी जारी रहेगा लगभग तीन बजे तक । मेरे साथ झारखंड से आए एक दोस्त अमन मलिक जी भी चल रहे थे। जिनको मुझे दिल्ली छोडना था। हमसे कुछ आगे मुजफ्फरनगर से आए जावेद जी व राजस्थान से आए कोठारी साहब चल रहे थे। हमारे साथ रामानन्द जी भी चल रहे थे जो अपनी जॉब पर द्वारीखाल जा रहे थे। जब मै वापिस आने से पहले उनसे मिलने उनके घर पर गया तब उन्होने बोला की वह भी द्वारीखाल जा रहे है आप चलो, मैं भी आता हूं। रामानंद जी हमे द्वारीखाल दूसरे रास्ते से ले जा रहे थे जो थोड़ा ऊपर और पेड़ो के बीच से गुजरता है। जिस रास्ते से हम परसो आये थे, वह रास्ता कुछ नीचे साथ साथ चल रहा था। वैसे ऊपर वाले रास्ते पर धूप नही लग रही थी, साथ में शीतल हवा भी लग रही थी। यह रास्ता नीचे वाले रास्ते से बहुत छोटा था मतलब केवल पैदल चलने के लिए ही था। लेकिन बहुत सुंदर था। यहाँ से दूर तक का द्रशय भी दिख रहा था। हम बात करते हुए आगे पीछे चल रहे थे। अब हमें हल्की हल्की चढाई ही मिल रही थी। रास्ते में कुछ मधुमक्खीयो ने मुझे अपना डंक मार दिया। अमन मलिक जी जिनको हम प्यार से दादा कहते है। उन्होंने तुरंत हाथ मे पहने लोहे के छल्ले से उस जगह को रगड दिया।लकिन मुझे अब भी बहुत दर्द हो रहा था लेकिन बाद घर तक पहुंचने पर दर्द सही हो गया था।
अब हम वापिस चल पड़े 

ऊपर चोटी पर भैरव गढ़ी मंदिर है। 

रास्ते के सुन्दर नज़ारे 

रास्ता जो सकून देता है मन को 

रास्ते में एक बच्चा मिला जो अपनी भेड़ बकरियों को चराने लाया हुए था। 

हम ऊपर वाले रास्ते पर थे नीचे भी एक रास्ता है 

ये रास्ते और सुन्दर वादियां 

चीड़ का पेड़ 

जब दादा ने मेरी मदद की मधुमखियो से तो मैंने दादा को चीड़ का यह फूल दिया। 

रामानंद ने ये कसैला फल खिला दिया था मुझे। 

दादा और बरसुडी गांव 

अब हम द्वारीखाल पहुंचे उसी दुकान पर चाय पीने के बाद हम चल पडे। द्वारीखाल से कोटद्वार,  कोट्द्वार से खतौली होते हुए हम दिल्ली पहुंच गए। अमन जी को मैने मैट्रो स्टेशन पर छोड दिया और मैं लगभग रात के 8:30 पर घर पहुंच गया।

यात्रा समाप्त.....