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Wednesday, February 28, 2018

भानगढ़ किले की यात्रा

21 जनवरी 2018
भानगढ़ का क़िला 
भानगढ़ का इतिहास :
भानगढ़ क़िले को आमेर के राजा भगवंत दास ने 16 वी शताब्दी (1573 )में बनवाया था। बाद में भगवंत दास के पुत्र व राजा मान सिंह के छोटे भाई माधो सिंह ने इसे अपनी रियासत की राजधानी बना लिया। माधो सिंह मुग़ल शहंशाह अकबर के राज में उनके दीवान थे। माधो सिंह के बाद उसका पुत्र छत्र सिंह गद्दी पर बैठा। कुछ समय पश्चात हरिसिंह का शासन  भानगढ़ पर  रहा । यही से भानगढ़ का पतन शुरू हुआ। छत्र सिंह के बेटे अजब सिह ने भानगढ़ के नजदीक ही अजबगढ़ का किला बनवाया और वहीं रहने लगा। इस समय औरंगजेब का क्रूर शासन पूरे भारत में फैला हुआ था। औरंगजेब कट्टर पंथी मुसलमान था। उसके दबाव में आकर हरिसिंह के दो बेटे मुसलमान बन गए, बाद में जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह ने इन दोनो को मारकर भानगढ़ पर कब्जा कर लिया तथा माधो सिंह के वंशजों को भानगढ़ का राज्य सौंप दिया।
( यह जानकारी भानगढ़ में लगे एक पुरातत्व विभाग के बोर्ड़ व विकिपीडिया द्वारा प्राप्त जानकारी के आधार पर है।) 

यात्रा वृतांत 
कुछ दिन जयपुर में परिवार संग घुमक्कड़ी कर वापिस घर की तरफ लौट रहा था। मुझे भानगढ़ क़िले को देखने की बहुत दिन से इक्छा थी, भानगढ़ अलवर ज़िला में स्तिथ है। यह सरिस्का वन अभ्यारण के नजदीक है। इस क़िले को भूतिया क़िला कहा जाता है। इसलिए हम जयपुर से भानगढ़ की तरफ चल दिए। जयपुर से भानगढ़ की सड़क से दूरी तक़रीबन 70 किलोमीटर है जिसको तय करने में डेढ़ से दो घंटे लग जाते है। दोपहर के साढ़े बारह का समय हो रहा था जब हम जयपुर से चले। हमने जयपुर आगरा रोड पकड़ लिया। यह रोड बहुत बढ़िया बना है। जयपुर से निकलते ही पहाड़ो के बीच से निकली एक लम्बी सुरंग मिली यह कुछ-कुछ मनाली के रास्ते में ओट जगह के नजदीक वाली सुरंग जैसी थी। वैसे इन सुरंगो को बनाने में बहुत मेहनत करनी होती है। लेकिन सड़़क यातायात केे मार्ग सुगम बन जाते है। सुरंग से पहले एक टोल पर ऐसा वाक्या हुआ जिस पर मुझे अपने आप पर बहुत शर्म आयी। हुआ यूँ की में एक टोल पर लाईन में लगा था तभी एक व्यक्ति बोला की आप उधर लाइन में मत लगो इधर वाली लाईन में लगो। तब मैंने उससे कहा की मैं इधर ही लगाऊगा अपनी गाड़ी । फिर उसने बोला की यह टोल प्राइवेट गाड़ी के लिए फ्री है और आप टोल देय वाली लाईन में लगे है। तब मुझे अपनी गलती का एहसास हुआ और उस व्यक्ति को धन्यवाद बोलकर टोल बैरियर सेे बाहर गया और आगे बढ़ चला। गूगल मैप पर देखा तो भानगढ़ अभी भी तकरीबन 60 km की दूरी पर था। हमे दौसा तक इसी सड़क पर आगे बढना था फिर दौसा से एक सड़क बांंयी तरफ भानगढ़ के लिए चली जाती है, और सीधी सड़क भरतपुर की तरफ चली जाती है।

सुबहे होटल में ही नाश्ता किया था अब भूख जोरो से लग रही थी। इसलिए सड़क के किनारे पर बने एक ढ़ाबे पर पेट पूजा की गयी। खाना खाने के बाद हम आगे की और चल पड़े। जल्द ही दौसा पहुंच गए, दौसा में काफी होटल है जहा रुका जा सकता है और आसपास के दर्शनीय स्थलों को देखा जा सकता है। हम बांये रास्ते को मुड़ गए यहाँ से भानगढ़ तक़रीबन 32 km है। मतलब 40 मिनटों में हम वहां पहुंच ही जायँगे। अब रोड छोटा हो चला था कही कही सड़क निर्माण कार्य चल भी रहा था। कुल मिला कर रोड ठीक ठाक था। अब हमे ग्रामीण परिवेश में होने का अहसास हो रहा था। सड़क के दोनों तरफ गाँव दिख रहे थे। कही कही कुछ लोग राजस्थानी पहनावा पहने भी दिख रहे थे। हम शाम के लगभग चार बजे भानगढ़ पहुंचे। क़िले से कुछ दूरी पर 50 रुपयों की एक पर्ची काटी गयी। बाकि क़िले देखने का कोई टिकट नहीं था।

गाड़ी एक तरफ खड़ी कर हम क़िले में प्रवेश कर गए। प्रवेश द्वार के ही समीप हनुमान मंदिर बना है। यहाँ से आगे चलते ही पुराना बाजार आ जाता है रास्ते के दोनों तरफ दुकाने बनी है, जो कभी दो मंज़िला रही होगी। जिनको देखकर लगता है की कभी यहाँ पर बहुत बड़ा बाजार रहा होगा। आज मात्र उनके खंडर अवशेष ही बचे है। इस बड़े बाजार से होते हुए हम एक और दरवाजे पर पहुंचे। यह महल का दरवाजा है। दरवाजे के बायें तरफ एक खंडरनुमा इमारत है, और दाहिनी तरफ गोपीनाथ मंदिर है। गोपीनाथ मंदिर कभी विष्णु भगवान को समर्पित होगा लकिन फ़िलहाल यह मंदिर मूर्ति रहित है। मंदिर की बुर्ज भी नहीं है। लकिन यह मंदिर बाहर से उत्तम वास्तुकला का एक सुन्दर उदाहरण है। जब कभी यह महल आबाद रहा होगा तब यह कितना सुन्दर रहा होगा। केवल आज हम सोच ही सकते है। यह क़िला तीन तरफ से अरावली की पहाड़ियों से घिरा है। जो इसे और भी खूबसूरत बनाता होगा, लकिन आज यह एक भूतिया क़िला मात्र बन कर रह गया है। थोड़ा आगे चलने पर एक पानी की बाबड़ी है, जिसमे आज भी भरपूर पानी था। बाबड़ी के नजदीक ही सोमेश्वर महादेव मंदिर है। जो शिव को समर्पित है, यही पर हमे एक स्थानीय व्यक्ति ने बताया की अब पर्यटक इधर आने लगे है पहले केवल आसपास के लोग ही आते थे। उसने हमे यह भी बताया की यहाँ कोई भूत -प्रेत नहीं है। यहाँ केवल जंगली जानवर है जिसमे जंगली सूूअर व तेंदुआ है जो गर्मीयो में यहाँ बाबडी पानी पीने भी आते है। उसने बताया की वह यहाँ कई साल से आता है लकिन उसे आज तक यहां कोई भी ऐसी अजीब बात महसूस नहीं की जिससेे यह साबित हो की यहां पर भूत प्रेत रहते है। उसने तांत्रिक सिंघिया की कहानी को भी नकली बताया। उसने एक पहाड़ी की तरफ इशारा करतेे हुुुए, एक छतरी दिखाई  उस ने  बताया की लोग उसे तांत्रिक की छतरी  कहते है , और तरह तरह की कहानियों से जोड़ते है। जबकी वह पहले सैनिको  के लिए रही होगी जहां सेे वह दूूूर तक नजर रख सके। उसको धन्यवाद करने के बाद हम मंदिर से बाहर आ गए।
खंडर हुआ भानगढ़ 

क़िले का पहला और बाहरी द्धार 
हनुमान मंदिर पहले प्रवेश द्वार पर ही है। 

पुराने बाजार की कुछ निशानियाँ 

भानगढ़ क़िले का मानचित्र 

भानगढ़ का इतिहास 

क़िले में बाजार , दोनों तरफ दुकानें थी। 


श्रीमती जी

मैं ही हूँ सचिन त्यागी 


ये वीरानी 


दूसरा दरवाज़ा क़िले के अंदर 

गोपीनाथ मंदिर ,भानगढ़ 

मूर्ति नहीं है मंदिर में। 


मंदिर की छत अंदर से। 

देवांग गोपीनाथ  मंदिर में 
गोपीनाथ मंदिर 

पानी की बाबड़ी (कुंड )पीछे सोमेश्वर मंदिर दिखता हुआ। 

सोमेश्वर मंदिर और वह स्थानीय व्यक्ति जिस ने हमे जानकारी दी। 

सोमेश्वर महादेव शिवलिंग 

नंदी महाराज 

पहाड़ के ऊपर तांत्रिक की छतरी। 


मंदिर से थोड़ा आगे चलकर एक और दरवाजा आया जो मुख्य महल या कहें की शाही राजमहल का था। कहते है की कभी यह कई मंजिला था लकिन आज दो या तीन मंजिल का ही रह गया है वो भी जर्जर हालत में। वैसे इस क़िले को भारतीय पुरातत्व विभाग ने अपने अधिग्रहण कर लिया है। हम किले की पहली मंजिल पर पहुुुुँचे, यहां पर आकर मेेेेरी श्रीमती और बेटा ऊपर नहीं गये क्योकि वो चलते चलते बहुत थक चुके थे। मैं ही ऊपर किले की तरफ चला गया। पहली मंजिल पर एक गलियारा बना था जिस के अंदर कमरे बने थे। जो अंधेरा समेटे हुए थे। यहां मेरे अलावा ओर कोई नही दिख रहा था। इसको देखकर मैंने अनुमान लगाया की यह जेल भी हो सकती है या फिर सैनिको की विश्राम करने की जगह भी। यहाँ से ऊपर चलने पर छत आ जाती है। इसकेे ऊपर जो मंजिले थी वह आज पूरी तरह से नष्ट हो चुकी है। कभी यह बहुत सुंदर बना हुआ होगा, हर जगह चहल पहल रहती होगी। 

इस किले की बर्बादी की भी बहुत सी कहानी है। इतिहास में वर्णित है की अज़बगढ़ और भानगढ़ में युद्ध हुआ जिसमे भानगढ़ हार गया और सब मारे गए और यह किला भी तबहा हो गया। लकिन कुछ लोगो का मानना है, की भानगढ़ तबाही के पीछे एक तांत्रिक सिंघिया का श्राप है। कहते है की भानगढ़ में एक तांत्रिक रहा करता था। जो काले जादू करने में माहिर था। उसने भानगढ़ की राजकुमारी रत्नावती को देखा और उस पर मोहित हो गया। वह उसको हर कीमत पर पाना चाहता था। उसने काला जादू कर एक इत्र की शीशी को राजकुमारी तक पंहुचा दिया अगर राजकुमारी उस इत्र को लगा लेती तो वह भी उसकी तरफ मोहित हो जाती लकिन रत्नावती को उस तांत्रिक की इस चाल का पता चल गया और राजकुमारी ने वह इत्र की शीशी एक पत्थर पर फैक कर तोड दी। जिससे यह हुआ की वह पत्थर तांत्रिक के काले जादू के कारण तांत्रिक पर मोहित हो गया और उसी पत्थर के कारण तांत्रिक की मौत हो गई। लेकिन तांत्रिक सिंघिया ने मरते मरते भानगढ़ को यह श्राप दिया की भानगढ़ पूरी तरह से तबाह हो जाएगा और सभी लोग मारे जाएगे। कहते है की बाद में अजबगढ़ ने भानगढ़ पर हमला किया जिस युद्ध में सब मारे गए और उनकी आत्मा व तांत्रिक सिंघिया की आत्मा आज भी भानगढ़ में मौजूद है। इसलिए ही इस किले को भूतिया किला माना गया है।

मैं ऊपर से नीचे आ गया। अब समय भी लगभग शाम के पांच बज रहे थे। रास्ते में मुझे एक स्थानीय लडका मिला वह पास के गांव में ही रहता था। उसने बताया की वह कई बार इधर आया है। लेकिन उसे आज तक कोई भूत प्रेत नही दिखाई दिया है जबकी रात में जंगली जानवर जरूर उसके गांव तक आ जाते है। उससे बात कर हम बाहर की तरफ चल पडे। एक दो मन्दिर और बने है किले में लेकिन वह थोडा हट कर बने है इसलिए उधर ना जा सका। सीधा बाहर के गेट पर पहुंच गया, यहां गेट के साथ ही हनुमानजी का मन्दिर बना है वही पर एक बूढे बाबा बैठे थे। जो उस मन्दिर के पुजारी भी थे। उनसे कुछ लोग बात कर रहे थे । उनसे पूछ रहे थे की इस जगह को लोग भूतीया किला क्यो कहते है?  और आपने कभी कुछ महसूस किया? उन बाबा ने कहा की मुझे यहां पर कई बार कुछ अजीब महसूस हुआ है, रात में जब मन्दिर में पूजा करने के बाद जब जाता हूं तब भी लगता है की कोई है आसपास। उन्होने बताया की वह भी रात में मुख्य किले में नही जाते।

उनकी बात सुनकर मैं किले से बाहर निकल आया। और अपनी कार में बैठ, दिल्ली के लिए निकल पडा। रास्ते में कई सवाल मन में आ रहे थे की दो व्यक्तियों ने यहां पर भूत प्रेत की घटना को केवल कहानी मात्र बताया जबकी तीसरे व्यक्ति ने यहां पर कुछ अजीब होना स्वीकार किया। चलो जो भी हो मुझे यह किला देखना था और मैने देख लिया।
क़िले का आखरी द्वार और पीछे हन्टेड क़िला दिखता हुआ (जैसा की लोग कहते है )

श्रीमती जी और बेटा आराम करते हुए। 

एक गलियारा जिसमे अंदर कई कमरे बने हुए थे। 

क़िले के अंदर का दर्शय 

यहाँ घुप अँधेरा था। कैमरे के फ्लेश से फोटो में उजाला आया। 

इधर मैं अकेला ही था फिर जल्द ही बाहर आ गया। 



क़िले से गोपीनाथ मंदिर दिखता हुआ। 

एक डरावना पेड़ और एक खंडर 

क़िले की छत पर जाते हुए एक सेल्फी 

ऊपर छत पर कहते है की इससे भी ऊपर कई मंजिले थी कभी यहाँ। 


एक वीडियो भी बनाया है , जिसमे आप भानगढ़ क़िले का भृमण कर सकते है।
 वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करे।

Sunday, January 14, 2018

Tajmahal, ताजमहल

25 दिसम्बर 2016
ताजमहल 

यह यात्रा साल 2016 दिसम्बर माह में की गयी थी। मैं ओरछा यात्रा कर वापिस घर लौट रहा था। शाम के तकरीबन 6 बजे रहे थे। अब हल्का हल्का अंधेरा हो चला था। इसलिए हमने आगरा रूकना तय किया। इस यात्रा में मैं और मेरा छोटा सा परिवार (पत्नी व बेटा) सफर कर रहे थे। बेटे ने ताजमहल देखने की ख्वाहिश भी जाहिर की। हम सीधे ताजमहल पहुंचे। इस समय तक ताजमहल की टिकेट खिडकी बंद हो चुकी थी। इसलिए ताजमहल से कुछ दूरी पर ही एक होटल ले लिया गया। होटल पहुंचने पर थोडी देर सुस्ताने व चाय पीने के बाद हम आगरा की लोकल मार्किट देखने निकल पडे। वैसे तो आगरा कई बार गया हूं, लेकिन ताजमहल के दीदार हमेशा बाहर से ही किये थे। कई बार घर परिवार व दोस्तो के साथ भी प्रोग्राम बना की चलो आगरा हो आते है पर हर बार कुछ ना कुछ काम पड जाता या फिर यात्रा ही कैंसल हो जाती और आगरा आना खटाई में पड जाता। और इस बार तो ताजमहल देखना तय भी नही था और हम आज आगरा में थे। वैसे कई बार ऐसा हो जाता है

हम होटल से ऑटो में बैठ कर सीधा आगरे के सदर बाजार पहुंचे। आज बहुत भीड भी थी सभी लोग क्रिसमस के फैस्टीवल को एंजॉय कर रहे थे। हम एक गली में पहुचें यहां पर बहुत से व तरह तरह के खाने की चीजो के स्टॉल लगे हुए थे। हमने पहले पेट पूजा की फिर कुछ खरीदारी भी की। यहां पर बहुत सर्दी हो रही थी। हवा भी बहुत ठंडी व तेज चल रही थी मतलब शीत लहर थी। तब एक जनाब मुझसे बोले की सर यहां पर हर चीज दिल्ली से दुगनी है। गर्मी भी, सर्दी भी और मंहगाई भी। उस व्यक्ति की बात सुनकर वहा पर ओर लोगो में भी बात होने लगी। और हम कुछ समय मार्किट में बिता कर वापिस होटल आ गए।

27 दिसम्बर 2016
सुबह जल्दी उठ गए। नहा धोकर सीधा पैदल ही ताजमहल की तरफ चल पडे। होटल से लगभग आधा किलोमीटर की दूरी पर ही ताजमहल था। रास्ते में एक चाय की दुकान खुली हुई मिली, उसने आग भी जलाई हुई थी उसने हम वही बैठ कर चाय व बिस्किट का नाश्ता कर लिए। थोडी देर के बाद हम ताजमहल के टिकट घर पर थे। टिकट की दर भारतिय सैलानी के लिए 40 रूपये व विदेशी सैलानी के लिए लगभग 500 रूपये थी। सुबह के 6:30 से शाम के 7 बजे तक ताजमहल सैलानीयो के लिए खुला रहता है। लेकिन हर शुक्रवार को यह बंद रहता है। ताजमहल की सुरक्षा में लगे सिपाही बहुत मुस्तैद लगे। वह खाने पीने की वस्तु व किसी भी प्रकार की नशे की चीजों को अंदर नही जाने देते है। इसका उदाहरण यह है की मेरे बेटे ने टिकटेक की डब्बी ली खाने के लिए। यह एक प्रकार की कैंडी होती है जो एक सुरक्षा कर्मी ने उस से ले कर एक पेटी में डाल दी। मैने उससे वह मांगी तो उसने नही दी। फिर मैने भी ज्यादा बहस नही की, जबकी देवांग रो रहा था। फिर हमने ताजमहल में प्रवेश किया। और हां एक बात सुरक्षा कर्मी  ताजमहल में कैमरा, मोबाईल व पानी की बोतल ले जाने देते है।
अब हम एक गेट में पहुंचे, यहां से ताजमहल बहुत सुंदर दिख रहा था। लेकिन धुंध के कारण स्पष्ट नही दिख पा रहा था। दूर से हल्का हल्का पर खूबसूरत दिख रहा था।जैसे कभी घर में कांच के एक डब्बे में बंद ताजमहल की कलाकृति दिखती थी। यह दृश्य शायद उससे भी अच्छा था। सफेद संगमरमर के पत्थर से बना यह प्यार की निशानी इमारत जो विश्व भर में अपनी खूबसूरती के लिए प्रसिद्ध है। वाकई पहली झलक में इतनी सुंदर लगती है की बस लोग इसे देखते ही रह जाते है। जब हम वहां पहुंचे तब लगभग विदेशी सैलानियों की तादात ज्यादा थी। कुछ हमने उनसे तो कुछ हमने उनके फोटो खींचे। मुझे ताजमहल दिल्ली स्थित हुमायूँ का मकबरे की कॉपी लगी बस ताजमहल में चारो तरफ मिनारे है जो हुमायूँ के मकबरे में नही है। और यह सफेद संगमरमर पत्थर से बना है और वह लाल बलुआ पत्थर से। बाकी दोनो चारबाग शैली पर बने है, मतलब चारो तरफ बाग- बागीचे और बीच में एक चबूतरे पर मुख्य इमारत। जबकी कुछ लोगो का मानना है की इस इमारत की वास्तुकला शाहजहाँ नें खुद बनाई थी।

हम बाग व फव्वारे के बीच से होते हुए ऊपर चबूतरे पर बनी सीढियों से होकर ऊपर पहुंचे। हमने पन्नी के कवर निकाल कर जूतो पर पहन लिया। यह एक जरूरी कार्य होता है ताजमहल में प्रवेश करने से पहले। ताजमहल के दोनो तरफ लाल रंग की मस्जिद बनी है। जिन्हे देखकर हम ताजमहल में पहुँचे, ताजमहल के बीचो बीच एक कक्ष है जहां पर मुमताज महल व शाहजहाँ की नकली कब्र बनी है। असली कब्र नीचे तहखाना में बनी है। लेकिन नीचे जाना प्रशासन की तरफ से मना है। मुख्य कक्ष के चारो तरफ एक जैसे कमरे बने है। जहां पर बहुत सी संगमरमर के पत्थर की बनी जालीयां लगी है और बहुत सी नक्काशी देखने को मिलती है। ताजमहल एक उत्तम कलाकृति की दृष्टि से एक बेहतरीन इमारत है जिसे हर कोई देखना पंसद करता है। इसकी एक बात मुझे अच्छी यह लगी की ताजमहल को चाहे किसी भी दिशा से देख लो यह हर दिशा, हर तरफ से एक सा दिखता है। यह यमुना नदी के किनारे बना है वैसे पहले ज्यादातर हर किला व इमारत या कोई भी बडा शहर नदी के किनारे ही बनता था क्योकी नदी ही आवागमन का मुख्य स्रोत होती थी। और नदी ही अर्थ व्यवस्था का मुख्य स्रोत होती थी।

अब हम ताजमहल से चलकर, ताजमहल के संग्रहालय में पहुँचे। यहां पर भी अंदर विडियो बनाना व फोटो खींचने की मनायी है। यहां आकर ताजमहल का इतिहास का पता चलता है। उस समय के नक्शे, पत्थरो के नमूने, पत्थरो को चिपकाने की कला, मजदूरो के औजारो व बहुत सी अन्य जानकारी का पता चलता है। यहां पर कुछ बर्तन भी रखे थे जो कभी शाही परिवार अपने उपयोग में लाता था। एक पात्र ऐसा था जिसमे खाना परोसा जाता था यदि खाने में जहर होता था तो पात्र का रंग बदल जाता था। यहां आकर पता चला की ताजमहल को बनाने में तकरीबन 20000 मजदूर लगे। कई सौ हाथियों द्वारा बडे बडे पत्थरो को ढोया गया। ताजमहल तकरीबन सन् 1632 में बनना शुरू हुआ और सन् 1652 तक बन कर तैयार हुआ। ताजमहल को बनने में तकरीबन 20 वर्षो का समय लगा। और बाद में कुछ वर्ष तो इसको खूबसूरत बनाने में लगे। इसमे तरह तरह की पेंटिंग व रत्न लगाये गए, जिन्हे बाद में अंग्रेजी हुकुमत नें वहां से निकाल लिया। ताजमहल को बनाने में जनाब उस्ताद अहमद लाहौरी का मुख्य योगदान रहा इनके दिशा निर्देश पर ही ताजमहल इमारत बनी। मतलब यही ताजमहल के प्रमुख वास्तुकार थे।

ताजमहल एक मकबरा है जिसे मुगल शहंशाह शाहजंहा ने अपनी सबसे प्यारी बेग़म मुमताज महल की याद में बनवाया था। शाहजहां अपनी इस बेग़म से सबसे ज्यादा मोहब्बत करते थे। मुमताज महल का इंतकाल अपने 14 बच्चे को जन्म देते समय हो गया था। उनकी मृत्यु सन् 1631 में हुई। बाद में सन् 1666 में शाहजहाँ की भी मृत्यु हो गई तब उनके बेटे औरंगजेब ने उनको भी मुमताज महल की कब्र के बराबर में दफना दिया।
सुबह से घुमते घुमते काफी वक्त हो चला था। भूख भी जोरो से लग रही थी इसलिए हम ताजमहल से बाहर आ गए। ताजमहल से बाहर सड़क तक पहुंचने के लिए तकरीबन 1 किमी पैदल चलना होता है। यह सफर हमने घोडा गाडी से किया। काफी दिनो से तांगे में नही बैठे थे तो सोचा चलो आज बैठ लेते है जबकी इसके लिए हमे100 रूपये चुकाने पडे। वैसे यह सफर बैटरी रिक्शा से भी तय किया जा सकता है जिसका वह दस रूपया लेते है। तांगे से सड़क पर उतरे और होटल की तरफ चल पडे। होटल पहुंच कर छोले भटूरे व रायते का नाश्ता किया गया। फिर हम घर की तरफ चल पडे। रास्ते में हमने पन्छी पेठे वाले से पेठा भी खरीदा और सिकंदरा रूके।

सिकंदरा मुगल सम्राट अकबर का मकबरा है। यहां पर अकबर की कब्र बनी है। इसका निर्माण खुद अकबर ने ही कराया लेकिन सन् 1605 में अकबर के निधन के बाद उनके पुत्र जहांगीर ने इसे पूरा कराया। यह बाहर से लाल बलुआ पत्थर से बना है और अंदर संगमरमर पत्थर लगा है। मकबरे के बाहर चारो तरफ (रास्ता छोडकर) बगीचा बना है। जिसमें तरह तरह के पेड पौधे लगे है साथ में कई प्रजाति के हिरणो को भी रखा गया है। जिन्हे देखना बहुत अच्छा लगता है और अलग तरह का आनंद देता है। यहां पर हम कुछ समय व्यतीत करने के पश्चात वापिस दिल्ली अपने घर की तरफ चल पडे।

अब इस यात्रा की कुछ फोटो देखीं जाएं......... 

ताजमहल के बाहरी दरवाजे से ऐसे होते है ताज के दीदार 

धुंध कोहरे के पार वाह ताज 

ताजमहल का नक्शा 

मैं और मेरा परिवार 

देवांग ताजमहल की बुर्ज पकड़ते हुए 

जामा मस्जिद 

मस्जिद 

मैं सचिन त्यागी 

संगेमरमर पत्थर पर नक्काशी 

ताज 

ताज 

देवांग ताज की मीनार के दरवाजे पर। 

मीनार 


यमुना नदी, आगरा 




ताज संग्रहालय 


घोडा गाड़ी तांगा 





सिकंदरा , मुग़ल सम्राट अकबर का मकबरा 



मुख्य मकबरा 

मकबरे के अंदर 

मकबरे के अंदर 

अकबर की कब्र तक जाता गलियारा 

अकबर की कब्र 

हिरन 

लोधी का मकबरा