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Friday, 24 February 2017

ओरछा यात्रा (राम राजा मन्दिर व लाईट एंड साउंड शो)

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24 dec2016

बेतवा के तट से हम पैदल ही राम राजा मंदिर की तरफ चल दिए। ओरछा की एक बात मुझे अच्छी लगी की आप सारा ओरछा पैदल ही घूम सकते है। क्योकि सभी प्रसिद्ध जगह आस पास ही है। हम लोग शाम के लगभग 6:40 पर राम राजा मंदिर पहुँच गए। मंदिर के बाहर सड़क पर प्रसाद व फूलो की दुकाने लगी थी। एक दूकान से मैंने भी प्रसाद व फूल ले लिए। दुकान वाले ने बताया की पहले ओरछा में राम की आरती होती है, फिर अयोध्या में होती है। पता नहीं उसकी बात में कुछ सच्चाई भी है या नहीं। मै प्रसाद ले कर मंदिर के मुख्य द्वार पर पंहुचा। फिर हम सब जब अंदर चले तो वहाँ सुरक्षा के लिए तैनात पुलिस के एक सिपाही ने जींस से बेल्ट उतारने को बोला। क्योकि बेल्ट पहन कर अंदर जाना वर्जित है। क्योकि यहाँ राम को राजा के रूप में देखा जाता है और राजा के सामने कमर कसकर नहीं जाते है। बेल्ट वही एक खम्बे पर बांध कर अंदर चले गए। मंदिर के अंदर अभी आरती चल रही थी। दर्शन के लिए दो लाइन लगी हुई थी, एक महिला व दूसरी पुरुष के लिए। धक्का मुक्की ना हो इसलिए लोहे के पाइप लगे है। लकिन अगर आपको केवल भगवान राम के दर्शन ही करने है तो आप मुख्य कक्ष के सामने खुली जगह पर आराम से खड़े हो कर राम राजा के दर्शन कर सकते है।

ग्रुप की सभी महिलाये दर्शन के लिए लाइन में लग गयी और हम सभी ने खाली जगह से ही दर्शन कर लिए। अब समय 7:20 से ऊपर हो चूका था अभी भी महिलाओ को दर्शन नहीं हुए थे। उधर पांडेय जी लाइट एंड साउंड शो पर चलने के लिए बोलने लगे। जो मंदिर के सामने जहांगीर महल में शाम के 7:30 पर शरू हो जाता है। उधर ग्रुप की महिलायो ने बोल दिया की वह दर्शन करने के बाद ही लाइट एंड साउंड शो देखने जाएंगी। इसलिए मैं और दो और साथी वही मंदिर में रुक गए और बाकि शो देखने को चले गए। हम भी दूसरी लाइन में लग गए तभी देखा की मंदिर का एक कर्मचारी एक व्यक्ति को बहुत जोर से धमका रहा है और उसको दो चार थप्पड़ भी लगा दिए है। मैंने एक व्यक्ति से पूछा की मंदिर में यह क्या हो रहा है तो उसने बताया की मंदिर में किसी भी तरह की फोटोग्राफी मना है और उस व्यक्ति ने मंदिर में फोटो या सेल्फी खीच ली है। ये देखकर अच्छा नहीं लगा क्योकि आप नियम तोड़ने वाले को मार नहीं सकते हो। या तो उसकी फोटो डिलिट कर दो या फिर उस पर जुर्माना लगा दो। लकिन आप उसे मार नहीं सकते हो। हम लोगो ने भी श्री राम के दर्शन किये , पीने को चरणामृत मिला और बाहर आ गए।

राम राजा मंदिर की कहानी :-  मौजूदा मंदिर व उस समय का राज महल को ओरछा के राजा मधुकर शाह (संवत 1554-92 ) ने बनवाया था। कहानी या कहे की इतिहास यह है की राजा मधुकर शाह कृष्ण भक्त थे और उनकी पत्नी गणेश कुँवारी महा रामभक्त थी। एक बार मधुकर शाह ने रानी गणेश कुँवारी को अपने साथ बृज यात्रा पर चलने को कहा लकिन रानी ने अयोध्या जाने की बात बोली जिसे सुनकर मधुकर शाह को बहुत गुस्सा आ गया। उन्होंने रानी को आदेश दे दिया की अगर तुम इतनी बड़ी राम भक्त हो तो राम को ओरछा ले कर ही आना नहीं तो ओरछा नहीं आना। रानी राम को लेने अयोध्या आ गयी। लकिन राम ने दर्शन नहीं दिए। एक दिन उन्होंने अपनी ही भक्ति में कमी जानकर अयोध्या की सरयू नदी में छलांग लगा दी। और पानी में डूब गयी लकिन होना कुछ और था। जल के अंदर श्री राम ने बाल रूप में रानी को दर्शन दिए। और एक वरदान मांगने को कहा। तब रानी ने कहा की वह तो आपको ही लेने ओरछा से अयोध्या आयी है और आपको लेकर ही वापिस जायगी। राम ने कहा की वह बाल रूप में ही जायँगे और राजा बनकर ही जायँगे। साथ में एक बार जहां वह स्थापित हो गए फिर वही रहेंगे। रानी ने सभी शर्तो को स्वीकार कर लिया। रानी ने यह सन्देश ओरछा पंहुचा दिया। राजा मधुकर शाह ने राम के लिए चतुर्भुज मंदिर का निर्माण चालू करा दिया। जब राम ओरछा आये तब चतुर्भुज मंदिर का निर्माण पूरा नहीं हुआ था। इसलिए राम की मूर्ति राजमहल में ही रख दी। जब चतुर्भुज मंदिर का निर्माण पूरा हुआ और राम की मूर्ति को राजमहल से हटाकर ,चतुर्भुज मंदिर में स्थापित करना चाहा तो राम की मूर्ति अपनी जगह से हिली भी नहीं। तब राजा और रानी को राम की वह शर्त याद आ गयी की जहाँ रख दिया वही स्थापित हो जाऊंगा। इसलिए राजा ने चतुर्भुज मंदिर में श्री कृष्ण की मूर्ति स्थापित की। आज भी ओरछा में राम को राजा के रूप में पूजा जाता है। 

हम सभी जहाँगीर महल पहुच गए। गेट पर ही मुकेश पांडेय जी मिल गए। उन्होंने बता दिया की इस तरफ जाना है। काफी अँधेरा था और एक भारी और स्पष्ट आवाज चारो तरफ गूँज रही थी। ओरछा का पूरा इतिहास बताया जा रहा था। सभी की कहानी बताई जा रही थी। घोड़ो की चलने की आवाज व शेर के दहाड़ने की आवाज ऐसे लग रही थी जैसे हम उसी काल में पहुच गए हो। हम केवल आवाज और लाइट को देख और सुन रहे थे। और इतिहास को जान रहे थे। इस शो में शामिल होकर बहुत अच्छा लगा। इसलिए मुकेश पांडेय जी को बहुत बहुत धन्यवाद करता हू। जब शो आपने अंतिम भाग में था तब मेरे बेटे को भूख लग गयी। इसलिए हम किले के बाहर बने एक होटल पर गये और खाने के लिए दाल रोटी माँगा ली और खाना खाने के बाद होटल पहुच गए। आज पूरा दिन घूमने का ही रहा इसलिए अब शरीर में थकावट का एहसास होने लगा था। कुछ देर दोस्तों के बीच बैठकर मैं सोने के लिए आपने रूम में चला गया। 

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अब कुछ फोटो देखे जाये ...... 


ओरछा का राम राजा मंदिर का बाहरी हिस्सा 


मंदिर परिसर में सुन्दर फंवारा 

देवांग 
मैं सचिन त्यागी ओरछा के राम राजा मंदिर पर। 


ओरछा महल पर लाइट एंड साउंड शो के दौरान लाइटिंग 

ओरछा महल पर लाइट एंड साउंड शो के दौरान लाइटिंग

ओरछा महल पर लाइट एंड साउंड शो के दौरान लाइटिंग

ओरछा महल पर लाइट एंड साउंड शो के दौरान लाइटिंग

ओरछा महल पर लाइट एंड साउंड शो के दौरान लाइटिंग



Friday, 17 February 2017

ओरछा यात्रा (चतुर्भुज मन्दिर व बेतवा नदी)

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24 dec 2016

मैं झाँसी का किला देखकर ओरछा के लिए निकल पड़ा। एक जगह गलत मुड़  गया और झाँसी की तहसील में जा पंहुचा। फिर वहां से रास्ता पूछ कर सही रास्ते पर आ गया। हुआ ये की मैंने रास्ते में खाने को फल लिए , फल वाले ने ओरछा जाने के लिए अगले चौक से सीधे रास्ते को मुड़ने को बोल दिया, मैं मुख्य चौक की जगह पहले चौक से ही मुड़ गया। चलो कोई नहीं पांच मिनट बाद ही में सही रास्ते पर आ चूका था। यहाँ से ओरछा मात्र 19 km की दूरी पर था। रास्ता सिंगल ही था। लकिन अच्छा बना था। जैसे जैसे मैं ओरछा के नजदीक जा रहा था वैसे ही मन में एक अलग किस्म की ख़ुशी का एहसास हो रहा था। क्योकि अब तक बहुत से घुमक्कड़ दोस्त ओरछा पहुच चुके होंगे। और सब एक साथ एक जगह मौजूद होंगे। मैं कुछ पल भी छोड़ना नहीं चाहता था। इसलिए अब मुझे ओरछा दूर दिख रहा था, जबकि वो कुछ ही समय की दूरी पर था। जैसे कोई बच्चा जन्मदिन पर मिले उपहार को जल्दी से खोलना व देखना चाहता है वैसे ही मैं भी ओरछा जल्दी पहुँचना चाहता था।

रोड अच्छा था और ट्रैफिक भी बिलकुल नहीं था। मेरी कार हवा को चीरते हुए आगे बढ़ी जा रही थी। थोड़ी देर बाद एक नदी पड़ी उसको पार करने के बाद ही ओरछा लिखा हुआ मिला। अब मन को अच्छा लग रहा था। थोड़ा और चलने पर दो पुराने बड़े दरवाजे दिखे जिसके नीचे से निकल कर मैं सीधा जहांगीर महल के पास बनी पर्किंग के सामने जा कर रुक गया और मुकेश पांडेय जी को फ़ोन किया की मैं एक पार्किंग में खड़ा हू। उन्होंने बोला की वो किसी को भेज रहे है आप वही पर प्रतीक्षा करे। थोड़ी देर बाद मेरे फेसबुक मित्र सूरज मिश्र व एक अन्य व्यक्ति मुझे लेने आ पहुँचे। मैंने मिश्र जी को देखते ही पहचान लिया था। उनकी भाषा मुझे बड़ी पसंद आयी। उन्होंने बताया की सभी घुमक्कड़ मित्र चतुर्भुज मन्दिर पर ही है इसलिए आप भी वही चलिए। देवांग आगे आगे मिश्र जी के साथ चल रहा था। हम पीछे पीछे चल रहे थे। कुछ ही देर बाद हम मंदिर पहुँच गए।

चतुर्भुज मंदिर चार मंजिला (तल) बना है। प्रथम तल पर एक मंदिर है, जिसमे श्री कृष्ण विराजमान है। यही पर सभी मित्र मिल गए। कुछ से मैं पहली बार मिल रहा था। सभी से मिलकर बहुत अच्छा लग रहा था। अभी दो दिन से मै अकेला ही घूम रहा था अब परिवार वाली फीलिंग मन में आ रही थी। फिर हम सभी चतुर्भुज मन्दिर की सबसे ऊपर वाली छत पर पहुँच गए। यहाँ से पूरे ओरछा का 360 डिग्री का द्रश्य दिख रहा था। राजा राम का मंदिर , जहांगीर का महल, बेतवा नदी व राजाओ की छतरिया और भी बहुत सी इमारते दिख रही थी। यहाँ पर सभी फोटो खींचने में मस्त हो गए थे। कुछ देर बाद हम सभी नीचे चल पड़े। मैं अलग सीढ़ियों से नीचे आया क्योकि मैं ये जानना चाहता था की यह सीढिया भी नीचे जाती है या नहीं। खैर निचे वाले तल से पहले हमे यह सीढिया बंद मिली और हमे काफी घूम कर वापिस पुराने या पहले वाले रास्ते से ही वापिस आना पड़ा। चतुर्भुज मंदिर के एक झरोखे से सामने दिखता जहांगीर महल बहुत सुन्दर प्रतीत हो रहा था। मैं कभी कभी पूरानी इमारतों को देख कर उस काल में जाना चाहता हू जब इन इमारतों में चहल पहल होती थी। खैर हम नीचे आ गए और होटल की तरफ चल पड़े। चतुर्भुज  मंदिर को ओरछा के राजा मधुकर शाह ने बनवाया था लकिन इस मंदिर में पहले भगवान राम की मूर्ति स्थापित होनी थी लकिन ऐसा हो ना सका और श्री कृष्ण की मूर्ति यहाँ पर स्थापित करनी पड़ी। इसकी एक कहानी है जो अगली पोस्ट में आप पढ़ेंगे।

हम एक गली से निकल कर हरदौल की बैठक पर पहुचे। हरदौल यहाँ के स्थानीय देवता है, वैसे यह ओरछा के राजा वीर सिंह जी के सबसे छोटे पुत्र थे, जिनको उन्ही के बड़े भाई जुझार सिंह ने षडयंत्र रच कर विष पिला कर मार दिया था। एक बार जब इनकी बहन अपनी पुत्री के विवाह के अवसर पर जुझार सिंह को भात का न्यौता देने आयी तब जुझार सिंह ने बहन को भात देने से मना कर दिया। क्योकि वह हरदौल की प्रिय थी। वह हरदौल की समाधी पर आकर रोने लगी तब हरदौल की आत्मा ने आकर अपनी बहन से कहा की वह भात देने आएगा तुम शादी की तैयारिया करो। और शादी के दिन हरदौल की आत्मा ने भात दिया तभी से हरदौल लोक देवता के रूप में पूजे जाने लगे।

फिर हम लोग फूलबाग से निकले वहाँ पर मैंने एक बड़ा का कटोरा देखा जिसे चन्दन का कटोरा कहते है। इसका प्रयोग युद्ध पर जाने वाले सैनिको के माथे पर तिलक लगाने के लिए ,चन्दन का लेप बनाने के लिए होता था।
यहाँ से हम मंदिर के पीछे से होते हुए, एक होटल में पंहुचे जहां पर दोपहर के खाने का कार्यक्रम रखा हुआ था। खाने में सब्जी पूरी थी, दो पूरी खाई गयी और ऊपर की मंजिल पर बने एक कमरे को रुकने के लिए आरक्षित किया। और पार्किंग से लाकर होटल के पीछे बने एक टीले पर खड़ी कर दी। होटल की बात करे तो कमरो में साफ़ सफाई का बिल्कुल ध्यान नहीं था। कोई रूम सर्विस नहीं थी। झाड़ू भी रूम में नहीं लगी थी। शायद यह होटल बंद रहता होगा मुझे ऐसा लगा। मुझे ये होटल पसंद नहीं आया। लकिन दोस्तों की वजह से यही रुकना तय किया। कुछ देर बाद हम बेतवा नदी के एक किनारे पर बने एक पार्क में गए। यहाँ से बेतवा के दूसरे किनारे पर बनी। राजाओं की छतरिया (समाधी स्थल ) बहुत सुन्दर लग रही थी। सभी दोस्त अपने अपने कैमरे लिए फोटो उतार रहे थे। पांडेय जी ने एक पेड़ दिखया जहां पर मेंगो स्लाइस नामक कोल्डड्रिंक का विज्ञापन शूट हुआ था। जिसमे कटरीना कैफ इसी पेड़ के नीचे बैठी थी। वो पेड़ भी देखा। मैं कुछ हट कर शांति में बेतवा के किनारे पर बैठ गया। बेतवा का निर्मल जल कल कल करता बह रहा था। कुछ छोटे छोटे शंख या सिपिया बेतवा के जल में दिख रही थी। देवांग तो उनसे ही खेल रहा था। ग्रुप से कुछ नदी में बोटिंग का मजा ले रहे थे। अब शाम भी ढल चुकी थी। और दूर मंदिर से आरती की ध्वनियां भी इस शाम को और यादगार कर रही थी। मुम्बई से आने वाली दर्शन बुआ और बाकि मित्र भी आ चुके थे। सब मिलकर वापिस चल पड़े , नदी पर बने एक पतले से पुल को पार कर के सबने चाय पी और फिर राजा राम मंदिर की तरफ चल पड़े।

यात्रा अभी जारी है। .. 

पिछला भाग....  
अगला भाग..... 

अब कुछ फोटो देखे जाये>>>>कुछ फोटो मेरे मित्रो ने भी दिए है.... 


ओरछा का प्रवेश द्वार 

चतुर्भुज मन्दिर,ओरछा 




बच्चा पार्टी 

मैं और मेरा परिवार 

जहांगीर महल ,ओरछा 

कुछ वक्त ऐसे ही बैठना अच्छा लगता है। 

ओरछा का राम राजा मंदिर 

घुमक्कड़ी दिल से 

सेल्फी 

हरदौल की बैठक 

चन्दन का कटोरा 

अपना होटल 

देवांग और सूरज मिश्र जी 

ये बाबा हमेशा एक कुत्ते को गोद में लिए ही मिले। 


बेतवा नदी का एक सुन्दर किनारा 

बेतवा नदी के दूसरी और राजाओ की छतरिया (समाधी ) दिखती हुई। 


कटरीना ट्री 


क्रमश 

Tuesday, 7 February 2017

ओरछा यात्रा (पीताम्बरा पीठ,दतिया और झांसी का किला)

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24,dec,2016

सुबह रोज की तरह जल्दी ही उठ गए। आज हमे ओरछा पहुँचना था। ज्यादातर दोस्त ट्रैन से आ रहे थे। और ट्रैन भी मौसम (कोहरे ) के कारण समय से कुछ घंटे देरी से चल रही थी। इसलिए ज्यादातर लोग ओरछा लेट ही पहुचेंगे यह तय था। इसलिए हमने दतिया जो की रास्ते में ही पड़ रहा था। और दतिया में पीताम्बरा माता का मन्दिर भी  है। क्यों ना मंदिर देखा जाये इसलिए हमने माता के दर्शन करने का निर्णय किया। ग्वालियर से दतिया की दूरी लगभग 75 km है। हम होटल से बिना नाश्ता करे ही ग्वालियर से निकल चले। सोचा की रास्ते में किसी अच्छे से ढाबे पर कुछ खा लेंगे। क्यो समय खराब किया जाए। मै लगभग सुबह 7 बजे दतिया के लिए निकल पडा। रास्ते में एक छोटा सा मंदिर दिखा तो उस मंदिर में जाकर माथा टेक आये। झाँसी की दूरी ग्वालियर से 108 km है। एक जगह रास्ता मालूम किया और रोड पर सीधा चल पड़े। इस रास्ते पर सुबह सुबह लगभग हम ही चल रहे थे। किसी भी प्रकार का ट्रैफिक नही दिख रहा था। यह कोई नया रास्ता बन रहा था। कुछ किलोमीटर चलने के बाद यह रास्ता नेशनल हाई वे 44 पर मिल जाता है। अब हम सही चल रहे थे क्योकी हमे झाँसी की दूरी बता रहे बोर्ड दिख रहा था। कुछ किलो मीटर चलने के बाद एक ढाबा दिखा। उस पर दो कार और भी रुकी हुई थी। हम भी उसी होटल पर रुक गए। चाय और परांठा का नाश्ता किया गया। ढाबे से दिखती एक पहाड़ी पर एक मंदिर दिख रहा था। ढाबे वाले ने एक गांव का नाम बताया जो मैं अब भूल गया हू। उस गांव का ही एक मंदिर था। यह मंदिर देख कर लगान फिल्म का मंदिर याद आया। थोड़ी देर बाद हम नाश्ता कर वहाँ से चल पड़े।

रोड के दोनों और खेत दिख रहे थे। दिल्ली जैसे शहर से आकर लगता है की कोई इस वीरान जगह कैसे रहता होगा। कुछ दूर चलने के बाद रोड सिंगल हो गयी। और दतिया तक ऐसे ही रही। दूर एक महल दिखने लगा अन्दाजा हो गया था की दतिया आ चूका है। एक स्थानीय दंपंती जो की स्कूटर से जा रहे थे। मैने उन से पीताम्बरा मंदिर का रास्ता पता किया उन्होंने रास्ता बता दिया। उनको धन्यवाद कह कर हम आगे बढ़ गए। एक छोटे से तालाब को पार करते ही एक चौक पर पहुँचे। उधर ही एक महल दिखा शायद बीर सिंह पैलेस था।लकिन हम रास्ता पूछ कर आगे बढ़ गए। थोड़ी दूर चलने पर ही माता का मंदिर आ गया। यहां पर मुझे गाड़ी खड़ी करने की जगह नहीं मिली। मंदिर पर बहुत पुलिस खड़ी थी। थोड़ा आगे जाकर फिर वापिस मुड़ गया। तभी एक कार पार्किंग से बाहर निकली और मैने मौके देखकर तुरंत अपनी कार उस जगह खड़ी कर दी। पचास रुपए की पार्किंग लगी लकिन अब गाड़ी की टेंसन नहीं थी। मंदिर के बाहर बहुत सी दुकाने लगी थी इनमे से एक दुकान से फूल माला और लडडू ख़रीदे गए और चल पड़े पीताम्बरा माता के दर्शन करने के लिए। मंदिर के बाहर काफी पुलिस थी शायद कोई नेता या अफसर आने वाला था। तभी नीली बत्ती की गाड़ी से कोई परिवार निकला और मंदिर की तरफ चल पड़ा। हम भी लगभग साथ ही चल रहे थे। मंदिर में अंदर प्रवेश किया, देखा तो दर्शनो के लिए काफी लंबी लाइन लगी थी। लकिन हुआ ये की पुलिस वालो ने हमे भी उस परिवार से साथ सोच लिया और हमे भी उनके साथ पीछे की तरफ से ले जाकर माता रानी के दर्शन कराये और प्रशाद भी चढ़वा दिया।

पीताम्बरा माता के दर्शन एक खिड़की से ही करने होते है, माता की मूर्ति को स्पर्श नहीं किया जाता है और माता की मूर्ति भी दिन में तीन दफा रंग बदलती है। माता पीताम्बरा को बगलामुखी माता भी कहा जाता है। कहा जाता है की, पीताम्बरा माता की पूजा करने से सभी मसले हल हो जाते है। शत्रु पराजित हो जाते है, इसलिए 1963 में भारत चीन युद्ध के दौरान पंडित जवाहरलाल नेहरू जी भी यहाँ पूजा करने आये थे और चीन ने युद्ध बंद कर दिया था। यहाँ पर नेता, फ़िल्मी कलाकार भी आते है पूजा के लिए। कहते है की ये माता अदालत में चल रहे केस में भी जीत दिलवा देती है। हम मंदिर में बने अन्य मंदिर भी देखने के लिए गए। मंदिर के अंदर आप मोबाइल और कैमरा ले जा सकते है लकिन फोटो खींचना प्रतिबंधित है। इसलिए मैंने भी कोई फोटो नहीं लिया। एक मंदिर में गए वहाँ सब शांत मुद्रा में बैठे हुए थे। यह मंदिर उन स्वामी जी का था जिन्होंने 1935 में इस मंदिर को बनवाया था कहते है की पहले यहाँ शमशान हुआ करता था। फिर हम धूमावती माता के मंदिर में गए। यहाँ पर लिखा था की स्त्रियों का आना वर्जित है। लकिन मूर्ति के चारो तरफ पर्दा लगा होने के कारण मै भी इनके दर्शन नहीं कर पाया। बाद में पता चला की यह भारत में धूमावती माता का एक मात्र मंदिर है। फिर हम एक पांडवकालीन शिव मंदिर में गए। जिसे वनखंडेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है। यहां पर हमने भी एक प्राचीन शिवलिंग के दर्शन किए। अब हम मंदिर परिसर से बाहर आ गए। इस मंदिर की पौराणिकता बारे में ज्यादा तो नहीं पता चल सका लकिन मन्दिर के बाहर फूल बेचने वाली एक महिला ने हमे बताया की यहाँ सभी की मनोकामनाएं पूर्ण होती है। माता में बहुत शक्ति है। फिर हम वापिस कार के पास पहुँचे और चल पड़े झाँसी की ओर।
दतिया के  पीताम्बरा मंदिर के बाहर का दर्श्य। 

देवांग मंदिर के सामने। 


मंदिर के अंदर का दृश्य। 

माता पीताम्बरा (बगलामुखी माता ) दतिया ,मध्यप्रदेश 



झाँसी की कहानी 
झाँसी का किला सत्रहवीं शताब्दी में ओरछा के राजा बीर सिंह देव के शासन काल में बना। लकिन झाँसी प्रसिद्ध हुआ वीर रानी लक्ष्मीबाई की वीरता की वजह से। रानी लक्ष्मीबाई का बचपन का नाम मनु था उनकी शादी कम उम्र में ही झाँसी के राजा गंगाधर राव से हो गया। रानी लक्ष्मीबाई को एक पुत्र भी हुआ लकिन वह बीमारी की वजह से मर गया उसके वियोग में राजा गंगाधर राव भी अस्वस्थ रहने लगे और उनका भी निधन हो गया अब राज्य की सारी जिम्मदारी रानी लक्ष्मीबाई पर आ गयी उन्होंने बहुत अच्छे से झाँसी पर शासन किया। लकिन ब्रिटिश हुकुमत ने एक बिल पास किया जिसमे ऐसे सूबे और हुकुमत को जिसमे वारिस नहीं है उनको ब्रिटिश सरकार अपने आधीन कर लेगी। रानी के कोई संतान नहीं थी इसलिए अंग्रजो ने झाँसी पर कब्ज़ा करना चाहा फिर रानी ने एक बच्चे को गोद लिया लकिन अंग्रजी सरकार ने उसे वारिस नहीं माना और झाँसी पर कब्ज़ा लेने के लिए झाँसी को चारो और से घेर लिया लकिन रानी लक्ष्मीबाई ने झाँसी नहीं देने की घोषणा कर दी और मरते दम तक अंग्रेजी सेना से लड़ी। 

दतिया से झाँसी की दूरी लगभग 31 km है। रास्ते में गन्ने से गुड़ बनाने वाले बहुत से कोल्हू चलते दिख रहे थे। और सड़क पर गुड़ भी बहुत बिक रहा था। में कुछ दिन पहले ही बाजार से गुड़ लाया था नहीं तो यहाँ से जरूर ले जाता। लगभग दोपहर के 11 बजे हम झाँसी के किले पर पहुँच गए। किले के ही पास एक संग्रालय बना है, किला एक ऊँचे पहाडी पर बना है। जिसे बंगरा पहाडी कहते है। किले के बाहर कार खड़ी करने के बाद हम टिकेट घर की तरफ चल पड़े। दो टिकेट (15 रूपया प्रति व्यक्ति) कर अंदर ही गए थे। तभी एक व्यक्ति मेरे पास आया और बोलने लगा की आपको पूरा किला घुमाऊंगा, वो एक गाइड था। मैने उससे पूछा की कितना पैसा लोगे वो बोला की 250 रूपये लूंगा वैसे बात 150रू में तय हो गयी। हमारे गाइड का नाम मिथुन था। मिथुन हमे पहले कड़कबिजली तोप के पास लेकर गया उसने हमे बताया की इस तोप को रानी के एक खास तोपची गुलाम गौस खां ने ही बनाया था। आज भी इस तोप में एक गोला लगा है जिसे रानी ने चलाने से मना कर दिया था। क्योकि अगर यह गोला अंग्रजी सेना पर चलता भी तो साथ में झाँसी के और घर भी तबाह हो जाते , लकिन अंग्रजी सेना ने इस किले पर कई दिन तक गोले बरसाए, जिसमे तोपची गुलाम गौस खां व् और अन्य वफादार सिपाही भी शहीद हो गए। मिथुन ने हमे यह भी बताया की इस किले के चारो ओर पहले पानी की खाई हुआ करती थी और चारो तरफ तोप तैनात थी। एक तोप जिसका नाम भवानी शंकर है उसे महिला सिपाही ही चलाती थी।

फिर हम पंच महल देखने गए, इस महल में रानी ने अपने दंतक पुत्र दामोदर राव को गोद भी लिया था, साथ में जनता की फरियाद भी रानी यही सुनती थी। फिर हम फाँसी घर देखने गए जिसे रानी ने बाद में बंद करा दिया था। यही पर कूदान नाम की जगह भी थी। जहाँ से रानी अंग्रजी सेना से चारो ओर से घिर जाने पर और गुप्त रास्तो पर पर भी अंग्रजी सेना को पाकर। जब रानी लक्ष्मीबाई को कोई रास्ता ना मिल पाया तब वह अपने दंतक पुत्र को अपनी पीठ पर बांध कर अपने घोड़े समेत किले से कूद गयी थी,
रानी लक्ष्मीबाई एक पूजा पाठ करने वाली स्त्री थी। किले के अंदर दो मंदिर है, एक शिव मंदिर और गणेश मंदिर जहां रानी लक्ष्मीबाई नियमित रूप से रोज पूजा करने जाती थी। किले में कूदान जगह से ऊपर ध्वजः रोहण जगह है जहा आज तिरंगा लगा है। थोड़ी दूर एक जगह काल कोठरी बनी है, जहा रानी अपने दुश्मनो और प्रजा के दुश्मनो को सजा के तौर पर कैद करती थी। जगह जगह लोहे की खिड़किया बनी है जिनको अंग्रजो ने रानी के बाद बनवाया था, उन्होंने वहा पर ब्रिटेन से लायी गयी गन मशीन तैनात की थी। आज भी दो ख़राब गन मशीन किले में मौजूद है। किले के बाहर एक ईमारत बनी है जिसे बारादरी कहते है। इस ईमारत में बाराह दरवाजे बने है और यह राजा गंगाधर राव ने अपने भाई के लिए बनवाई थी क्योकि वह संगीत और नाटक में रूचि रखते थे।

झाँसी के किले के पास ही एक पीले रंग का एक भवन दिख रहा था। जब मैंने मिथुन जो हमारा गाइड थे, उनसे पूछा की वो क्या है? तब मिथुन ने बताया की राजा गंगाधर राव की मृत्यु के बाद रानी किले में शासन चलाने के बाद सोने के लिए उस महल में चली जाती थी। फिर हमने रानी का गार्डन भी देखा जहा रानी घूमा करती थी। रानी का रसोई घर भी देखा और भी कई कमरे थे जो हमने देखे। फिर हम मिथुन को उसके तय पैसे देकर वापिस किले से बाहर आ गए। और अपनी मंजिल ओरछा की तरफ चल पड़े।

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अब कुछ फोटो देखे जाये।
झाँसी का किला प्रवेश द्वार। 



कड़क बिजली तोप 




शिव मंदिर 

गणेश मंदिर। 


गणेश मंदिर 


पंच महल का एक हिस्सा जो बंद है। 

पंच महल का एक हिस्सा जहा राजा लोगो से मिलते थे और रानी ने अपने दंतक पुत्र को यही गोद लिया था। 

दो तोप जो आवाज ही करती थी। 



ध्वज स्तम्भ 

कुदान 


तोप भवानी शंकर। 

यहाँ पर फांसी दी जाती थी लकिन रानी ने वो बंद करा दी। 

कल कोठरी 

गन मशीन अंग्रजो द्वारा लायी गयी 


गन मशीन की खिड़की 
बारादरी 


वह भवन जहा रानी पति की मौत के बाद रहती थी। 


एक गुप्त दरवाजा 


पंच महल के पास रानी का उपवन 

सचिन त्यागी 

रानी झाँसी के वफादार लोगो की समाधी स्थल 

रसोई की चिमनी 

किले से दिखता झाँसी शहर।