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बुधवार, 11 फ़रवरी 2015

सलीमगढ़ किला व स्वतंत्रता संग्राम संग्रहालय

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मै ओर आयुष दोनो काफी हद तक लाल किला घुम चुके थे,फिर भी यहा पर मौजूद हर चीज को देखना चाहते थे ...
संग्रहालय-हम दोनो दिवान-ऐ- आम के ठीक सामने की एक पुरानी ईमारत मे स्थित एक संग्रहालय में पहुचें,यहा पर पुराने काल की कुछ झांकियां थी,पुराने हथियार व पोशाके थी,जब अंग्रेज हमारे देश में राज करने आए वो उस समय नई तकनीकी के हथियार लाए,जिसके बल पर उन्होने यहां राज किया वो हथियार भी यहां पर आप देख सकते है,एक बात आपको बता देता हुं,जब आप लाल किले में प्रवेश होने का टिकेट ले,जबही आप संग्रहालयो का भी टिकेट ले ले नही तो आप इन्हे नही देख पाएगे,ओर हां एक टिकेट से ही आप यहां मौजूद तीनो संग्रहालय घुम सकते है.
संग्रहालय से निकल कर हम छत्ता चौक पर पहुचें,वहा से हम सीधे हाथ की तरफ जाती सडक़ पर मुड गए,अगर आप लाल किले में प्रवेश कर रहे हे तो छत्ता चौक के बाएं यह सडक़ आपको मिलेगी,हम इस सडक पर मुड गए,यहा पर पर्यटको की भीड कुछ कम थी,शायद लोगो को इस तरफ कम पता हो,पर हमे क्या हमे तो इधर भी घुमना था,यह एक पुरानी बिर्टिश कालोनी है,इंही इमारत मे मौजूद है एक संग्रहालय जिसका नाम "स्वतंत्रता संग्राम स्मारक"है,
यहां पर हमने बहुत कुछ देखा जैसे अंग्रेजो का यहा पर कैसे आना हुआ ओर उन्होने यहां पर कैसे शासन स्थापित किया,सन् 1857 की क्रांति से जूडी इतिहास की जानकारी व फोटो आपको यहां देखने को मिलेगे,यदि आप सुभाष चंद्र बोस से जूडी चीजे देखना चाहते है तो यहा पर आपको बहुत सारी बाते व चीजे देखने को मिलेगी जैसे-उनकी व उस समय के नामी लोगो के साथ फोटो,उनकी कुर्सी व टोपी,पोशाके,हस्तलिखित पत्र व अन्य बहुत सी वस्तुएं,यह देखकर व पढकर,आपको अच्छा महसूस होगा,रानी लक्ष्मी बाई की झांकि व अन्य कवि जिन्होने आजादी दिलाने मे महत्वपूर्ण काम किये,चंद्रशेखर आजाद का वह चित्र जहां पर व शहीद हुए,आपको उस काल में क्या हुआ होगा सोचने को मजबुर कर देगा,शहीद भगत सिंह अन्य शहीदो के चित्र व उनकी निशानियां आप यहा देख सकते है,
यह सब देखकर हम दोनो उसी सडक पर सीधे चलते रहे,इस सडक के आखिर मे पानी की एक बावली है,(पुराने जमाने मे पानी का स्रौत जो बहुत बडी चौडी जगह होती थी),लेकिन हम उसी सडक से दाएं तरफ मुड गए,यह सडक जाती थी सलीमगढ़ के किले के लिए,हम चले ही थे की वहां मौजूद गार्ड ने हमे रोक लिया ओर बोला की इधर कहा जा रहे हो,हमने कहां की हम सलीमगढ़ का किला देखने के लिए जा रहे है,उसने कहां की वहां कुछ नही है,कुछ टुटे फुटे खंडर ही बचे है,उन्हे क्या देखोगे,मेने कहां की उन्हे ही तो देखना है,यह कह कर हम वहां से चल दिए,अब कुछ सलीमगढ़ के बारे मे..
सलीमगढ़ दुर्ग(किला)- सलीमगढ़ किले का निर्माण शेरशाहं सूरी के पुत्र इस्लामशाहं सूरी ने 1545-54ई० मे कराया,इस्लामशाहं को सलीमशाहं के नाम से भी जाना जाता था इसलिए इस किले के नाम सलीमगढ़ पडा,बाद मे अकबर ने इसे अपने अधिकार में ले लिया,ओर अपने बफादारो को सौप दिया,बाद मे शाहजहां ने लाल किला निर्माण के समय जहांगीर द्वारा निर्मित पुल का उपयोग सलीमगढ़ किले को लाल किले से जोडने में किया,(यह पुल आज भी मौजूद है,लाल किले के पीछे वाली सडक पर).
बाद में औरंगजेब ने इस किले का प्रयोग अपने काल मे शाही कारागार के रूप मे किया.सन् 1857 की क्रांति के बाद,अंग्रेजो ने लाल किले मे सेना की छावनी बनाई ओर सलीमगढ़ किले को ढहा कर रेलवे लाईन बिछाई,ओर किले की अन्य इमारतो को ढहा कर एक कारागार का निर्माण भी किया,जिसमे आजाद हिन्द फौज के सिपाहियो को कैद किया गया....
हम दोनो एक सुनसान सडक. पर चल रहे थे,हमारे अलावा ओर कोई वहां मौजुद नही था,हम जहांगीर द्वारा निर्मित पुल को पार करते हुए,सलीमगढ़ दुर्ग के गेट पर पहुचें,यहां से हमे रेलवे लाईन पर बना एक लोहे का पुल पार करना पडा,पुल उतरते ही हम सलीमगढ़ किला परीसर मे थे,यहा पर हमने केवल एक कारागार(jail) देखी ओर एक टुटी फुटी खंडर नुमा मस्जिद,इन सब चीजो को देखकर हम वापिस आ गए..
अब हम पहुचें बावली मे,मुझे पहले यह नही पता था की लाल किले मे भी बावली है,अब पता चल ही गया है तो क्यो ना इसे भी देख लिया जाए,हम कुछ ही मिनटो मे बावली पर पहुचं गए,वहां पर गार्ड मौजुद था,उसने हमे हिदायत दी की बावली मे ज्यादा नीचे की तरफ ना जाए,हमने वहा पर कुछ फोटो खिचे व कुछ देर आराम भी किया.अब बावलीयों के बारे मे...

बावली(Baoli)- बावलियां पुराने समय मे बनाई जाती थी,यह जमीन से तकरीबन तीन चार मंजिल नीचे बनी होती थी,गर्मीयो मे यहा बने कमरो मे आराम भी किया जाता था,पानी की कमी को तो यह पूरा करती ही थी,यह बावलीयां बहुत लम्बी चौडी व पत्थरो से बनी होती थी,
यह सब देखकर हम दोनो लाल किले से बाहर आकर कुछ पेट पूजा कर अपने घर की लौट चले..
अब कुछ फोटो देखे जाए...
दिवान-ऐ-आम के नजदीक संग्रहालयपानीपत के प्रथम युद्ध की झांकी
प्राचीन भारत की तलवारे
हाथ में पहने जाने वाला विशेष अस्त्र
मुगल सैनिक की युद्ध में पहने जाने वाली पोशाक

अंग्रैजो द्वारा लायी गई बन्दुके
बहादुरशाहं जफर व उनकी बेगम के प्राचिन फोटो
जलियां वाला बाग की झांकी
वे शहीद जिन्हे अब तक भी शहीदो का सम्मान नही मिला
चंद्रशेखर आजाद का फोटो
सलीमगढ़ किला व जंहागीर का पुल (इसके नीचे बनी सडक से कई बार निकले होगे आप)
अंग्रैजो की बनाई कारागार
बावली

गुरुवार, 29 जनवरी 2015

Delhi red fort(लाल किला)

बहुत दिनो से कही घुमना नही हो रहा था,कही घुमने नही गया काम की वजह से,इसलिए एक दिन दिल्ली के लाल किला भ्रमण की योजना बना ली,घर पर मेरा भांजा आयुष आया हुआ था,वह इंजनियरिगं कर रहा है,छुट्टीयों में यहा आया हुआ था,मेने उससे पूछा की लाल किला चल रहा है क्या? उसने तुरंत चलने की हामी भर दी,हम दोनो स्कूटी पर बैठ कर सुबह 10 बजे के आसपास अपने घर से लाल किले के लिए निकल पडे...........................

(इतिहास-लाल किला लाल बलुआ पत्थर से बना है,इसलिए इसका नाम लाल किला पडा,मुगल शासक शाहजहां ने आगरा से अपनी राजधानी बदल कर दिल्ली को अपनी नयी राजधानी बनाया,शाहजहां ने सन् 1628-58 मे लाल किला बनवाया,शाहजहां ने एक शहर बसाया जिसका नाम दिया गया"शाहजहांनाबाद".जो यमुना नदी के किनारे ही बसाया गया.बाद मे औरंगजेब व बहादुरशाहंजफर मुगल शासको ने भी लाल किले मे निर्माण कराए,सन् 1857 की क्रांति के बाद ब्रिटिश सेना ने लाल किले को अपने कब्जे मे ले लिया ओर यहां छावनी बना दी गई,लाल किले मे ही अंग्रेज हुकुमत ने आखिरी मुगल शासक बहादुरशाहं जफर पर मुकदमा चलाया,

बाद में आजादी के बाद 15 अगस्त 1947 को हमारे देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नहरू जी यही लाल किले पर एक जनसभा बुलाई ओर देश की जनता से कहा की अब हम आजाद है,तब से आज तक 15 अगस्त को यहा लाल किले पर प्रधानमंत्री द्वारा तिरंगा फहराया जाता है,

लाल किले में प्रवेश के दो गेट है पहला है दिल्ली गेट जिसमे केवल  vip लोगो ही जा सकते है बाकी सभी पर्यटको के लिए लाहोरी गेट है,)

मै ओर मेरा भांजा आयुष जब लाल किले पर पहुचें तो देखा की लाहौरी गेट पर बहुत लम्बी लाईन लगी है किले में प्रवेश के लिए,तब मेने आयुष से कहा की ऐसा करते है की मै लाईन मे लगा रहता हुं तब तक तुम टिकट ले आओ,मैने उसको 50र० देकर टिकेट लेने के लिए भेज दिया जो लाहौरी गेट के सामने ही है,दस मिनट बाद वह बगैर टिकट लिए आया ओर बोला की मामा कैमरे का टिकेट 25 र० का है,ओर पैसे दे दो तब मेने उससे कहा की वो विडियो कैमरे का टिकट होता है,सामान्य कैमरे का कोई टिकट नही लगता है,तब जाकर वह 10 रू० प्रतिव्यक्ति के हिसाब से दो टिकट ले आया ओर साथ मे रू 5 के दो संग्रहालय के टिकेट ओर ले आया,तब तक मे लाहौरी गेट के काफी नजदीक पहुचं चुका था,दोनो ने लाहौरी गेट से होते हुए लाल किले में प्रवेश किया,किले में घुसते ही छत्ता चौक आया यह एक पुराना बाजार है,जिसे मुगल शासक शाहजहां ने सन्1646 में बनवाया था,पहले बाजार खुले स्थान मे होते थे यह उस काल का पहला छत (कवर्ड)वाला शाही बाजार था जो दो मन्जिला था.

हम बाजार से होते हुए,एक अलिशान,खुबसूरत ईमारत में पहुचें,यह ईमारत थी दिवाने आम,यहां मुगल शासक विदेशी महमानो व फरीयादियो से रूबरू होते थे,वह यहां इंसाफ भी किया करते थे,यह भी लाल पत्थर से बना है पर मुगल शासक जहां बैठा करते थे,वह स्थान सफेद संगमरमर से बना है,ऊंचे ऊंचे खम्बो से बनी यह ईमारत बहुत सुन्दर दिखती है,

यहां से आगे चल कर हम दोनो पहुचें खास महल यह शाहजहां का निजी महल था,जहां शाहजहां खुदा की इबादत करता था,वह कुछ खास महमानो को भी यहां ठहराया जाता था,खाश महल के निचे रंग महल नामक एक महल था जहां शाहजहां हाथियों की लडाई व अन्य मनोरंजन के कार्यक्रम कराता था,हमारी इक्षा थी इसको देखने की पर वहा तीनो दरवाजो पर ताले लगे हुए थे.

खास महल के दाहिने होते हुए हम पहुचें मुमताजमहल,जोअब संग्रहालय के रूप मे प्रयोग के काम मे आ रहा है,यह पहले बहुत सुन्दर हुआ करता था पर अंग्रैजो ने इसे अपने काल मे जेल बना दिया था इसलिए उन्होने इसका पूरा स्वरूप ही बदल दिया,हम दोनो यहा पहुचें, यहां पर राजसी पौशाक ,कपडे ,बरतन वह बहुत सी कलाकृति,व बहुत सी अन्य चीजो को देखा जा सकता है पर यहां फोटो व विडियो बनाना सख्त मना है ओर जगह जगह कैमरे भी लगे है,

इसे देखकर हम दोनो पहुचें दिवाने खास,यह महल सफेद संगमरमर पत्थर से निर्मित हैं,सभी खम्बो पर नक्काशी हुई है.यह महल शाहजहां के विशिष्ट क्रर्मचारियो व शाही मित्रो से मुलाकात की जगह थी,इसके व महल के अन्य जगह भी  एक छोटी सी नहर बहा करती थी जो इन महलो को गर्मीयो मे ठंडा रखती थी,जब हम यहां पहुचें तो यहां पर मरम्मत का कार्य चल रहा था,इसलिए इसमे अन्दर नही जाने दिया लेकिन मै पहले वहां कई बार जा चुका हुं..

दिवाने खास के पास ही है मोती मस्जिद जिसे मुगल शासको में सबसे क्रूर माने जाने वाले शासक औरंगजेब ने निजी इबादत के लिए बनवाया यह भी सफेद संगमरमर से बनी है.

मोती मस्जिद के सामने ही बना है शाही हमाम घर जहां पर शाही परिवार नहाने के प्रयोग मे लाता था,यह भी किन्ही कारणो के कारण बंद था मेने एक खिडकी पर चढं कर इसके अन्दर के फोटो खिच लिए,तभी वहां पर एक गार्ड ने मुझे वहा से उतर जाने को कहा मैं वहा से सीधे एक छोटे से बाग में पहुचां,जिसके एक छोर पर सावन मंडप व दूसरे छोर पर भादो मंडप नामक दो छोटे छोटे हॉल बने थे ओर इनके बीच भी छोटी सी जलधारा बहती थी इसे शाहजहां ने बनवाया था,बाद मे मुगल शासक  बहादुरशाह जफर ने इन दोनो मंडपो के बीचो बीच लाल पत्थर से पानी के बीच जफरमहल नामक एक छोटा सा महल बनवाया.

इन्हे देखने के बाद हम पहुचें,शाह बुर्ज नामक इमारत पर जहां से यमुना का पानी महल मे चढाया जाता था ओर वह शाह बुर्ज से होते हुए,नहर-ऐ-बहिस्त नामक छोटी सी नहर या कहे ताजे पानी की नाला पूरे महल मे निकलती थी जो महल को ठंडा रखती थी वह बाग बगिचो की सिचांई करती थी,

लालकिला बाग बगिचो का किला था,जहां अंग्रैजो ने तोड फोड कर अपनी सेना के लिए नए निर्माण भी किए.यहा पर उन्होने रहने के लिए बहुमंजिला इमारत बनायी,जो आज भी देखी जा सकती है. 

यह सब देखकर हम बाहर की तरफ चल पडे,लेकिन अभी लाल किले में देखने को बहुत कुछ था जो हमने देखा भी,उसके बारे में आगे की पोस्ट में बताऊगा..




लाल किले के सामने मैं सचिन त्यागी
लाहौरी गेट
लाल किले का नक्शा
छत्ता चौक की दुकान
दिवाने आम
दिवाने आम में शाहजहां का तख्त
खास महल व नीचे नहर 
रंग महल में लगा हुआ ताला
दिवान-ए- खास
दिवाने खास
खम्बो पर नक्काशी
दिवाने खास
मोती मस्जिद
सावन मंडप
जफर महल
भादो मंडप
शाही हमाम
आयुष दिल्ली गेट के पास
शाह बुर्ज जहां पर यमुना से पानी ऊठाकर पूरे महल मे भेजा जाता था

शनिवार, 20 सितंबर 2014

दिल्ली मिलेनियम पार्क(बौद्ध स्तूप)Buddhists tample

मैं ओर मेरे एक मित्र पिछले महिने हुमायूं का मकबरा देखने के लिए गए थे,वहा से लोटते वक्त हम दिल्ली सराय काले खां के नजदीक बने एक पार्क पहुचें,इस पार्क में एक कोने पर बने बौद्ध धर्म की स्मारक दर्शको को अपनी तरफ आक्रर्षित करती है,वो भी इसलिए की यह स्मारक सम्राठ अशोक द्वारा बनाई गई सॉची (मध्य प्रदेश) के स्तूप से मिलती जूलती  है.यहा पर श्री गौतम बुद्ध की कई मूर्ति विभिन्न मुद्राओ में स्थापित है.गौतम बुद्ध जिन्होने शान्ति का उपदेश दिया.
यहा पर एक दरवाजा बना था जिसपर मूर्तिया बनी थी.इस दरवाजे को पार कर हम एक छोटे से घास के मैदान में पहुचे.इस छोटे से मैदान के बीचो- बीच बना है एक बौद्ध स्मारक,जहा पर गौतम बुद्ध की अनेक मुद्राओ में मूर्तियां लगी है.यह देखकर हम दोनो बाहर आ गए ओर अपने घर की तरफ चल पडे....

अब कुछ चित्र देखे:-

मिलेनियम पार्क स्थित बुद्धा स्तूप
मिलेनियम पार्क स्थित बुद्धा स्तूप
बुद्धा स्तूप से दिखता हुमायूं का मकबरा