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रविवार, 13 जुलाई 2014

श्रावन मास का महत्व व कांवड़ यात्रा

श्रावन मास के आरम्भ होते ही सभी शिवआलयों व अन्य मन्दिरो मे भक्तो का तांता लग जाता है.पुरूष हो या महिलाएं सभी पूर्णतय शिवभक्ति मे लीन होते है.
ऐसा माना गया है की श्रावन मास मे शिव के अलावा सभी देवता शयन(निंद्रा) करते है ओर सभी का काम शिव को ही करना पडता है.इसलिए यह सावन का महिना शिव(आशुतोष) की भक्ति का महिना माना गया है.
शिव को जल्द प्रसन्न होने वाला भगवान माना गया है इसलिए उन्हे भोले बाबा भी कहा जाता है.भक्त शिव को प्रसन्न करने के लिए उनका जलाभिषेक करते है उन्हे धतुरा,सफेद पुष्प,बेल पत्थर अर्पण करते है जिससे शिव जल्द प्रसन्न होकर उनकी मनोकामनाएं पूर्ण करे.
ऐसा माना गया है की मां पार्वती ने भी सावन के महिने मे व्रत रखकर शिव को पाया था,इसलिए सावन के महिने मे महिलाएं भी शिव भक्ति करती है चाहे व पूर्ण मास का व्रत रखे या सावन के सोमवारो का.
सावन के महिने में यात्राओ का दोर भी शुरू हो जाता है या यह कहे की शिव यात्राओ का बडा महत्व है.
कई प्रकार की यात्राएं आरम्भ हो जाती है जैसे-
1--कैलाश मानसरोवर की यात्रा,
2--आदि कैलाश व ओम पर्वत की यात्रा,
3--बाबा अमरनाथ की यात्रा, 
4--कांवड़(काँवऱ) यात्रा...
कांवड़ यात्रा अन्य यात्राओ से सुगम व कम खर्चीली भी है..
काँवड़ यात्रा:-
सावन मास के शुरू होते ही कांवड़ यात्रा का भी शुभआरंम्भ हो जाता है.इस यात्रा मे शिव भक्त जिन्हे कांवड़ीयाँ भी कहा जाता है,भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए हरिद्वार या गंगोत्री से गंगा जल ऊठा कर एक लम्बी पैदल यात्रा पर निकल पडते है,चाहे कितने भी कष्ट हो उनको पर वह शिव भक्ति मे लीन होकर सब सहते हुए,चलते रहते है,ओर सावन मास की शिवरात्री पर अपने गांव या शहर में पहुंच कर भगवान(शंकर) आशुतोष का जलाभिषेक करते है.
कांवड़ के भी कई रूप है:-
1*झूला कांवड़:-
यह कांवड़ झूला कांवड़ इसलिए कहलाती है क्योकी यह कांवड़ चाहे बांस से बनी हो या रस्सी के द्वारा लटकाकर,इस कांवड़ को कांवड़ीयों द्वारा विश्राम व भोजन के समय ऊपर हवा मे लटकाया या कहे झूलाया जाता है इस कांवड़ को जमीन या कही भी नीचे नही रखा जाता.पेड पर या कोई स्टेंड पर झूलायां जाता है.
2*खडी कांवड़:-
यह कांवड़ खडी कांवड़ इसलिए कहलाती है क्योकी इस पूरी यात्रा मे यह कांवड़ कन्धो पर ही रहती है अर्थात कांवड़ीये इस कांवड़ को न तो जमीन पर रख सकते है ओर न ही इसको झूला सकते है,
यदि जो कांवड़ीयाँ इस कांवड़ को लाता है उसे विश्राम या भोजन अथवा अन्य कोई भी काम करना हो तो उसे यह खडी कांवड़ किसी अन्य कांवड़ीये या किसी शिव सेवक को देनी पडती है.यह कांवड़ बडी कठीन होती है.पर शिव का आशिर्वाद से सब कठनाईयां दूर हो जाती है.
3* सुन्दर झांकीयां वाली कांवड़ यात्रा:-
इस कांवड़ मे कुछ कावडियां एक ग्रुप बना कर ट्रक,जीप,छोटे टेम्पो,ट्रेक्टर पर या अन्य वाहन पर शिव व अन्य भगवानो की बडी प्रतिमाएं लगाकर चलते है,फूलो से सजावट कर,
लाईट से सजीधझी यह झांकी कांवड बहुत सुंदर लगती है साथ मे चल रहे डी०जे० या अन्य गायन मंडली द्वारा इन झांकीयों को ओर सुन्दर बना देता है,यह बहुत आराम आराम से चलती है साथ मे अन्य कांवड़ीयाँ भी पैदल पैदल चलते रहते है इन झांकियो को देखने आसपास के गांव या शहर के लोग सड़को पर खडे हो जाते है ओर  यह झांकीया ज्यादात्तर शाम को चलती है ओर दिन निकलने पर यह झाकियां रूक जाती है.
4* डाक कांवड़:-
डाक कांवड़ यात्रा में ट्रक या जीप पर 15 से 20 कांवड़ीयों का ग्रुप सवार होता है,जीप या ट्रक मे बडा सा D.J लगा होता है जिस पर भोले शंकर के तेज आवाज मे गाने चल रहे होते है.कांवड़ीयो के लिए खाना पीना व आराम वही ट्रक मे ही होता है,इस डाक यात्रा मे पुरा ग्रुप इकठ्ठा होकर एक साथ हरिद्वार या गौमुख जहां से भी जल उठाए एक साथ ऊठाते है,फिर वह तय समय जैसे कोई 48 घंटे,कोई 36 या कोई 24 घन्टो मे. या कोई भीड भाड की वजह से समय भोले की इक्छा पर भी लिख देता है,डाक कांवड़ मे जल ऊठाते ही कांवड़ीयाँ जल को लेकर दौडना चालू कर देता है ओर बारी बारी जल को लेकर दौडते हुए,तय समय पर शिवरात्री पर शिवालय (शिव मन्दिर) मे एक साथ जल चढाते है,यह यात्रा भी बडी कठीन यात्रा होती है,
जल को लेकर लगातार दौडते रहना बहुत बडी बात होती है बिना तैयारी के तो कुछ पल दोडते ही सांस फूल जाती है पर शिव की महिमा से यह यात्रा पूर्ण होती है.
5* साईकल,स्कूटर व बाईक कांवड़ यात्रा:-
यह यात्रा भी कांवड़ का रूप है इसमे भी लोग अपनी सवारी से हरिद्वार या गौमुख से जल भर कर शिवरात्री पर शिव का जलाभिषेक करते है.पर आजकल यह बाईक वाली यात्रा ज्यादा लोकप्रिय हो रही है,लोग जल लेने के लिए बाईक व स्कूटर से तो जाते पर सेफ्टी के नियम व कानून की धज्जियां उडाते हुए जाते है जो अपने लिए तो खतरनाक है ही बल्की दूसरो के लिए भी खतरनाक होती है.
शिव को सावन के महिने में जल क्यो चढायां जाता है?
कांवड़ क्यो लाई जाती है-

*शिव को जल क्यो चढाया जाता है इस पर कई मत है,पहला की ऐसा मानना है की समुंद्र मंथन सावन के महिने मे ही हुआ था ओर जब समुंद्र मँथन के दौरान हलाहल नामक विष निकल आया जो समस्त संसार का नाश कर देता तब भगवान शिव ने ही आगे बढकर उस विष को पी लिया ओर अपने कण्ठ मे जमा कर लिया जिस कारण उनका कण्ठ नीला पड गया ओर वह नीलकण्ठ महादेव ने नाम से भी जाने गये.
विष की गर्मी के काऱण उनके मुख से राम राम की जगह बम बम की आवाज निकली चालू हो गई इसलिए सभी देवताओ ने गंगा मां का जल लेकर शिव के मस्तक पर जल डाला, जिससे शिव को शान्ति मिली.
इसलिए ही सावन के महिने मे गंगाजी के जल से  शिव का जलाभिषेक किया जाता है ओर यही से कांवड यात्रा की शुरूआत हुई

दूसरी यह है की श्रवण कुमार भी सावन के महिने मे ही कांवड़ बना कर अपने अंधे माता पिता को तीर्थ यात्रा पर ले गये थे ओर उन्होने शिव का जलाभिषेक भी किया था.

ओर भी कई कहानियां है जिस कारण सावन मास में शिव भक्त कावड लाकर शिव को जल चढाते है.
कांवडियों से विनती:-
सभी कांवडियें नही पर कुछ कांवडिये भोले का प्रसाद के तौर पर गांजा,भांग व अन्य नशा करते है ओर फिर लडाई झगडा करते है,इस पवित्र यात्रा की गरीमा को ठेस पहुचांते है यह गलत है इस यात्रा के दौरान किसी भी प्रकार का नशा नही करना चाहिए.सादा भोजन व शुद्ध विचारो वाला जीवन व्यतित करना चाहिए,ओर नित्य नियम पूर्वक शिव की भक्ति मे लीन होना चाहिए.

ओर भगवान शिव जैसे विचार अपनाने चाहिए.अर्थात शिवमय वातावरण बनाना चाहिए, जिस प्रकार शिव अत्यंत विषैला विष को भी पी गए उसी प्रकार प्रत्यैक कावडियें को शिव की तरह अपने आप पर काबू रखना चाहिए,किसी को बूरा कहना व लडना झगडना नही चाहिए,शांत मन से शिव की आराधना करनी चाहिए.
तभी शिव की कृप्या आप पर रहेगी ओर भगवान भोले बाबा सदैव आपका कल्याण करते रहेगे.............

'बोल बम' बम बम
जय शिव शम्भू
यदि आपको यह पोस्ट अच्छी लगी हो तो कृप्या कमेंट मे भोले बाबा का जयकारा लगाएं....



शुक्रवार, 20 जून 2014

नैनीताल,झीलो की नगरी,

नैनीताल
नैनीताल उत्तराखण्ड का प्रमुख पर्यटकीय शहर है.यह कुमाऊ क्षेत्र मे आता है,नैनीताल जिला मे सबसे ज्यादा झीले पाई जाती है.इसे झीलो का शहर भी कहा जाता है,यह समुंद्र तल से लगभग 1900 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है,यहा देशभर से सैलानी घुमने के लिए आते है,गर्मीयो मे तो यहा सैलानीयो का तांता लग जाता है,जब दिल्ली व आसपास के शहरो मे पारा 45° तक पहुंच जाता है तब भी यहा पर मौसम सुहाना व राते ठंडी होती है.नैनीताल का नाम यहां की झील नैनी झील के कारण पडा.यह चारो ओर पहाडियो से घिरा सुन्दर व शान्त जगह है.

नैनीताल मे घुमने के लिए स्थान:-

नैनीझील
नैनीझील नैनीताल की जान है,यह एक सुन्दर व बडी झील है.यहा आप बत्तखो के झुंड को तैरते देख सकते है,नाव द्वारा आप पूरी झील का भ्रमण भी कर सकते है.झील के दोनो ओर नैनीताल दो हिस्सो मे बसा है एक मल्लीताल  व दूसरा तल्लीताल के नाम से जाना जाता है.यही पर झील के किनारे मां नैना देवी का मन्दिर भी है जो एक शक्ति पीठ भी है,कहा जाता है की जब भगवान शिव अपने कंधे पर माता सती का मृत शरीर को ऊठा कर कैलाश की तरफ ले जा रहे थे तब यहा झील के किनारे पर ही माता सती की नैन(आंखे) गिरे थे,इसलिए यहा पर एक मन्दिर नैना देवी की स्थापना हुई.जिसकी बहुत मान्यता भी है.
अगर आप नैनीताल आए तो यहा जरूर दर्शन के लिए आईएगा.
मालरोड:-
झील के किनारे दोनो ओर सडके है,एक तरफ ठंडी सडक जिसपर मोटर गाडी वगरह नही चल सकती है व दूसरी ओर तल्लीताल की तरफ सड़क पर होटल,रेस्तरा,बैंक,ट्रेवलस् एजंन्सी व दुकाने है,इस सडक को ही मालरोड कहते है.यहा पर आप अपनी जरूरत के हिसाब से रहने के लिए होटल ले सकते है,व सभी जरूरत का समान भी ले सकते है.

रोपवे:-
मल्ली ताल से एक रोपवे भी चलती है जो आपको नैनीताल की सबसे ऊंची चोटी(स्नो व्यु प्वाईंट)पर ले जाती है जहा से आप पूरे नैनीताल को देख सकते है,पूरी झील तो देखने मे बहुत अच्छी लगती है यहां से.यहा पर टैलिस्कोप के द्वारा दूर हिमालय पहाडियों को भी देखा जा सकता है.

टाईगर केव:-
यह नैनीताल से दो या तीन किलोमीटर दूर खुरपाताल वाले रास्ते पर ही स्थित है यह जमीन मे काफी गहराई मे है,जहा पर आपको तंग जगहो से निकलना पडता है.(जब मैं गया था उस समय यह बारिश ज्यादा होने के कारण बंद थी)
आप जब भी नैनीताल जाए तो यहा पर भी कुछ समय गुजार सकते है.
तिब्बती बजार:-
यह बाजार झील के किनारे व नैना देवी मन्दिर के पास ही है यहा पर आपको गर्म कपडे व इलक्ट्रोनिक्स समान व बच्चो के खिलौने सस्ते दामो पर मिल जाएगे.पर कीमत कम कराने के लिए आपको कुछ बहस भी करनी पड सकती है.
खुरपाताल:-
यह नैनीताल से कुछ दूरी पर व कालाडुंगी वाले रास्ते पर है,रास्ते मे एक छोटा सा झरना भी पडता है उसे भी देखा जा सकता है.
खुरपाताल मे भी नैनीताल की तरह एक झील है पर उसके मुकाबले कुछ छोटी जरूर है यहा पर आप शान्ति से झील के किनारे आराम से कई घंटे बैठ सकते है,पिकनीक के लिए एक आदर्श जगह है यह,कोई शोर शराबा नही,गिने चुने एक दो होटल व कुछ घर ही है यहा पर.

ओर अन्य जगह नैनीताल के पास:-
सातताल-
सातताल मे भी एक सुन्दर झील जहा पर आप नौका विहार कर सकते है.
नौकुचिया ताल-
ऐसा कहते है की इस झील के नौ कोने है ओर कोई उन्हे एक साथ नही देख सकता है,वैसे उन्हे देखना मुमकिन भी नही है.यहा पर भी आप झील की सुन्दरता को देखकर खुश हो जाएगे.
जिम कार्बेट पार्क:-
यह नैनीताल रामनगर वाले रास्ते पर है,यह एक वन्य अभ्यारण्य है जहा पर आपको बाघ,बघिरा,लक्कडभग्गा,जगंली बिल्ली व अन्य जगंली जानवर देखने को मिल जाएगे.यह सितमबर से मई तक खूला रहता है बाकी समय यह आम पर्यटको के लिए बंद रहता है.
यहा पर जंगल सफारी कर सकते है इस के लिए आपको रामनगर से परर्मिट बनवाना पडेगा.यहा पर कई गेस्ट हाऊस भी है जहा आप जगंल के माहौल मे रात गुजार सकते है.
पास मे ही गार्जिया देवी का मन्दिर है जो नदी के बीचो बीच एक चट्टान पर बना है ओर काफी खडी सिढियां चढने के बाद यहा दर्शन के लिए पहुचां जाता है.
जिम कार्बेट साहब का घर जो आजकल एक संग्रहालय के रूप मे है जहा पर आप जगंली जानवरो के मृत शरीर को देख सकते है  की वह कैसे मरे, ओर क्यो मरे,आज भी ऐसे लगते है जैसे असली के हो.
जिम कार्बेट ने अपना जीवन उस घर मे बिताया उस ऐतिहासिक इमारत को भी देखा जा सकता है.

अब कुछ फोटो देखे:-

मंगलवार, 3 जून 2014

राजघाट,गाँधी जी की समाधि स्थल

एक दिन राजघाट जाने का प्रौग्राम बनाया,मै सुबह 10 बजे के आसपास राजघाट पहुँचा.राजघाट व अन्य समाधि स्थल  यमुना नदी के किनारे स्थित है,यह समाधि परिसर लगभग 240 एकड़ भूमि पर फैला है,यहा पर कई समाधि स्थल बने है जैसे:-
*वीरभूमि-राजीव गाँधी,
*शक्तिस्थल-इन्दिरा गाँधी,
*शांतिवन-प०जवाहरलाल नेहरू व संजय गाँधी,
*किसानघाट-चौ० चरण सिहं ,
*विजयघाट-लालबहादुर शास्त्री जी,
*समता स्थल- बाबू जगजीवन राम.

दिल्ली जैसे महानगर जहा फैक्टरीयो व गाडीयो का शोर व भीडभाड से दूर कुछ समय ऐकांत मे बिताना चाहता हो उसे राजघाट परिसर मे अवश्य आना चाहिए.यहां आपको कई तरह के पेड दिखने को मिल जाएगे,यहा पर दो छोटी झील भी बनी है जहा आप घंटो बैठ सकते हो.
राजघाट को नेता लोग कभी कभी धरने वअन्य कार्यक्रम के रूप मे भी उपयोग करने लगे है.
राजघाट दिल्ली का प्रमुख पर्यटनीय स्थल मे से एक है,यह क्रिक्रेट के मैदान फिरोजशाह कोटला मैदान के नजदीक है व इसके नजदीक कश्मीरी गेट बस अड्डा भी है....

क्या-क्या देखे:-

राजघाट:-
यह महात्मा गाँधी जी की समाधि स्थल है,यह काले रंग के सगंमरमर पत्थर से बनी है,गाँधी जी हत्या सन् 1948 मे हुई,यहां पर एक खुबसूरत बगीचा भी बना है जहा तरह तरह के पेड पौधे भी लगे है.

शक्तिस्थल:-
शक्तिस्थल समाधि स्थल हमारे देश की पहली महिला प्रधानमंत्री व प० नेहरू की पुत्री इन्दिरा गाँधी जी की है.यहा पर समाधि के बीचो बीच एक लोहे या पत्थर की बडी सी चट्टान रखी हुई है,जो कुछ कोंग्रेस के हाथ के निशान सा लगता है,यह राजघाट के बहुत नजदीक है ओर इसी के पास ही एक झील भी बनी हुई है.

वीरभूमि:-
इन्दिरा गाँधी के बडे पुत्र व देश के प्रधानमंत्री रह चुके,स्वर्गीय श्री राजीव गाँधी की समाधि स्थल का नाम वीरभूमि है यह राजघाट के नजदीक ही है,यहां समाधि स्थल पर ग्रेनाईट के पत्थर से बने कमल का फूल लगे हुए है इनकी भी हत्या हुई थी.

शान्तिवन:-
शान्तिवन भारत के पहले प्रधानमंत्री प० जवाहर लाल नेहरू की समाधि स्थल है,यहा पर भी एक शानदार पार्क बना हुआ है व पास ही एक झील भी बनी है.
झील के पास व नेहरू जी की समाधि के ठीक पिछे इन्दिरा गाँधी के छोटे पुत्र संजय गाँधी जी की समाधि स्थल भी है,