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Saturday, July 11, 2015

हिमाचल यात्रा-02(चिंतपूर्णी देवी)

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चिंतपूर्णी माता(छिन्नमस्तिका देवी):-चिंतपूर्णी माता को चिंता हरने वाली देवी या माता माना गया है।चिंतपूर्णी माता का मन्दिर हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले में स्थित है,यह धाम माता के 51 शक्ति पीठो में से एक है जहां पर सती माता के शरीर के अंग गिरे थे।यहा पर माता सती के चरण(पैर) गिरे थे,जिन्हे पिन्डी के रूप में पूजा जाता है।
इस स्थान पर माता नें अपने एक भक्त माई दास को वटवृक्ष के पेड के नीचे साक्षात दर्शन दिए,ओर कहा की इस पेड के नीचे में पिन्डी रूप मे विराजमान हुं। तुम उस पिन्डी को मिट्टी से निकाल कर यहां मन्दिर बना कर पूजा करो। मै यहा पर पिन्डी के रूप मे रहकर सभी की चिन्ता का हरण करूगीं। तब भक्त माई दास ने यहां पर माता का मन्दिर बना कर उनकी पूजा आरम्भ की।तब से आज तक पिण्डी रूप में माता की पूजा की जाती आ रही है।
माता के भक्त आज भी यहां पर अपनी चिंता अपनी समस्याओं के निदान के लिए मन्दिर मे स्थित पुराने वटवृक्ष पर मन्नत का धागा बांधते है ओर जब माता उनकी सभी चिंता व समस्याओं को हर लेती है तब वह यहां पर धागा खोल जाते है।
चिंतपूर्णी माता को छिन्नमस्तिका देवी भी कहा जाता है।श्री मार्कंडेय पुराण के अनुसार जब मां चण्डी जो मां पार्वती का ही रूप थी। उन्होंने व मां की अन्य शक्तियों नें सभी राक्षसो का संहार करने के पश्चात विजय प्राप्त की तब मां की दो सहायक सखी या योगिनियां अजया ओर विजया की रूधिर(रक्त)की प्यास बुझाने के लिए अपना मस्तक काट दिया। जिसमे से रक्त की तीन धारा निकली,एक धारा अजया ओर एक धारा विजया ओर एक धारा खुद के मुहं मे गई,ओर उनकी व अपनी रक्त की प्यास को शांत किया। इसलिए माता को छिन्नमस्तिका देवी भी कहा जाता है। माना गया है की यही वो पावन जगह है.....
अब यात्रा वृतांत की तरफ चलते है.....
नांगल स्थित फैक्टरी से निकलने के बाद मुस्किल से दस मिनट बाद ही हम ऊना पहुचं जाते है।यहा पर भी प्रवेश पर्ची कटती पर हमने वो पहले वाली पर्ची दिखा दी ओर वह चल भी गई। हम वहा से आगे बढे ही थे की गाड़ी से गडगड की आवाज आनी चालू हो गई। हमने ऊना में ही गाड़ी एक तरफ खडी कर देखा तो सब ठीक था पर गर्र गर्र की आवाज अब भी आ रही थी। थोडी देर गाड़ी बन्द कर दी,जब तक हमने पास ही ठेले वाले से गोल गप्पे खा लिए व घर से लाये खिरे भी साफ कर दिए।
थोडी देर बाद गाड़ी स्टार्ट की अब आवाज नही आ रही थी। हम ऊना से अम्ब वाले रास्ते पर चल रहे थे जो सीधा चिंतपूर्णी चला जाता है।हमारी गाडी में अम्ब से लगभग 20km पहले बहुत तेज गडगड की आवाज आनी चालू हो गई। जब बोनट खोल कर देखा तो आवाज ओर तेज हो गई,हमने गाड़ी का बंद किया तो आवाज कुछ कम हो गई हम गाड़ी से ही अम्ब पहुचें ओर वहा पर एक मैकेनिक को दिखाया तो उसने बताया की गाड़ी का अल्टीनेटर की बेरिंग पुली टुट गई है ओर उसके पास वह नही है आप या तो वापिस जलंधर चले जाओ नही तो कांगडा चले जाओ,वहां कुछ हो सकता है पर यह गाड़ी कब रूक जाए पता नही। हमने एक इलक्ट्रशियन को ओर दिखाया उसने हमे भरोसा दिलाया की बैरिंग नही टुटा है आप आराम से कांगडा पहुचं जाओगे।
हम उसकी बात सुनकर वहा से चल पडे.ओर शाम के 6:15 पर चिंतपूर्णी माता के दरबार में हाजरी लगाने पहुचं गए। अम्ब से पूरा रास्ता पहाड़ी व बहुत मनमोहक है जिसका हमे लुफ्त उठाते चलना चाहिए था पर हम सब के चेहरो पर एक ही डर था की बस गाड़ी ऐसे ही चलती रहे कही रूके नही। मन्दिर मे दर्शन बहुत अच्छे ढंग से हुए। मन्दिर परिसर मे एक पुराना बड का पेड था जिसपर लोग धागे बांध रहे थे,हमने किसी ने भी कोई धागा नही बांधा । बस मां  से विनती की आपका आशीर्वाद सदा हमारे परिवार के साथ बना रहे ओर हम कभी गलत राह पर ना चले। मन्दिर में अन्य भगवानो के भी छोटे छोटे मन्दिर है। दर्शन करने के बाद हम गाड़ी में बैठ सीधे ज्वालामुखी देवी की तरफ चल पडे जो चिंतपूरणी से लगभग 30 की दूरी पर स्थित है। पूरा रास्ता पहाड़ी है पर सडक अच्छी बनी है।हमारी गाड़ी में आवाज आती रही ओर हम पूरे रास्ते मां को याद करते रहे क्योकीं इस पर गांव कस्बे कम ही थे पुरा रास्ता सुनसान सा था। देवी माता को याद करते करते हम लोग रात के लगभग 10:30 पर ज्वालादेवी(ज्वालामुखी ) पहुचं गए।यहां कई सारे होटल देखे पर बडे कमरे या दो कमरे नही मिल पाए। लेकिन मन्दिर के पास ही हमे एक होटल मिल गया जहां पर गाडी पार्किंग की भी जगह थी।बस फिर क्या था इसी होटल मे कमरा लिया।खाना खाने के लिए बाहर निकल ही रहे थे की अचानक बहुत तेजी से हवा चलने लगी ओर तेज बारिश भी चालू हो गई जो देर रात तक पडती ही रही।अब तो खाना इसी होटल से ही कमरे में मंगाना पडा। खाना रात को 12:30 पर आया,खाना खाकर सभी सो गए..................।
अब कुछ फोटो देखे जाए...................
जय माता चिन्तपूर्णी(यह फोटो बाहर से लिया गया है)
अम्ब में गाड़ी को देखते मैकेनिक
मां चिन्तपूर्णी के दर्शन को जाते(मै,दीदी व पियुष)
आगे अमरीष जी पीछे नेहा ओर पियुष
मन्दिर तक ऐसा ही बाजार लगा रहता है,आयुष प्रसाद लिए हुए ।
बस यही से ऊपर सीढियों से जाना है मन्दिर तक
भगवान गणेश
माता का भवन
माता का भवन वटवृक्ष के नीचे
यही वो पेड है जहां पर भक्तगण मन्नत का धागा बांधते है।
माता का भवन
हवन कुन्ड

4 comments:

  1. Bhai photo me to nikahar aa gya hai
    Meri isha hai jaa ne dekhe kab bulawa aa ta hai

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    Replies
    1. धन्यवाद विनोद जी...
      जी जरूर जल्द ही बुलावा आऐगा...

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