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सुरकुंडा देवी मंदिर
टिहरी झील देख कर हम चम्बा होते हुए, धनोल्टी के लिए चल पड़े। चम्बा से धनोल्टी तक की दूरी लगभग 30km है। मतलब आप आराम से एक घंटे में रुकते रुकाते पहुँच ही जायेंगे। हम जब चम्बा से चले तो मौसम साफ था, आसमान में बादल जरूर थे लेकिन बारिश नहीं थी। हम कुछ ही देर बाद कानाताल पहुच गये। यहाँ पर धुंध ने सड़क पर हमारा स्वागत किया। सड़क पर बहुत धुंध थी और गाड़ी की लाइट जलानी पड़ी और अगले मोड़ पर कोहरा गायब हो गया और सड़क के किनारे लंबे लंबे पेड़ दिखलायी देने लगे। यहाँ पर देवदार, बुरांश के पेड़ भी बहुत है जो मन को अलग ही तरह से आनंदित कर रहे थे। आप इनकी सुंदरता को देखकर अपने आप ही रुक जाते हो। मैंने भी एक दो जगह अपनी कार को रोड के साइड लगाया थोड़ी देर रुक कर आस पास की सुंदरता को देखा और कैमरा को कुछ काम दिया। मतलब कुछ फोटो लिए।
कानाताल में बहुत रिसोर्ट है। क्लब महिंद्रा से लेकर और कई जाने माने रिसोर्ट। इन में ठहरने के लिए इनकी मेम्बर्सशिप लेनी होती है। कानाताल एक सुंदर व प्राकृतिक नजारो से भरी जगह है। पास में एक पार्क भी है, जहाँ आप घूमने जा सकते हो। यहाँ आप सात आठ किलोमीटर की ट्रैकिंग का मज़ा ले सकते है। लकिन हम यहाँ नहीं रुके क्योकि हमने कद्दूखाल जाना था, कद्दूखाल से ही माँ सरकुंडा देवी के लिए पैदल रास्ता जाता है। वैसे सुरकुंडा देवी मंदिर को एक रास्ता ज्वारना गांव से भी जाता है जो जंगल से होकर जाता है, अगर ट्रैकिंग करके किसी को सुरकुंडा जाना हो तो वह इस रास्ते से जाते है। ज्वरना गांव भी सड़क पर ही है और हमारे रास्ते में पड़ा भी लकिन हमे कद्दूखाल वाले रास्ते से जाना था इसलिए हम आगे बढ़ गए।
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हम कुछ ही मिनटों में कद्दूखाल पहुच गये। रास्ते में हल्की हल्की बारिश होने लगी थी। कद्दूखाल में बारिश कुछ तेज हो गयी थी। मैंने कार वही रोड के एक साइड में लगा दी और एक दुकान पर जा पँहुचे, दुकान से प्रसाद ले लिया गया व ऊपर के लिए पानी की बोतल और कुछ खाने के ले लिया। यहाँ एक गड़बड़ हो गयी अब बारिश तेज़ हो गयी। और हम देवांग का रेनकोट नहीं खरीद सके। मेने एक काम किया अपना रेन कोट का ऊपर का हिस्सा देवांग को पहना दिया। उसको वह ओवरकोट का काम कर रहा था, मैने वही पर मिल रहे 30 रुपया का एक पन्नी का फोंचु खरीद लिया।
अब हम सुरकुंडा मंदिर तक जाने के लिए तैयार थे। हम लगभग दोपहर 12 बजे ऊपर की तरफ चल पड़े।
कद्दूखाल से सुरकुंडा देवी मंदिर तक का लगभग 2km पैदल का खड़ा रास्ता है। क्योंकि कद्दूखाल लगभग 2300 मीटर ऊँचाई पर है और सुरकुंडा देवी मंदिर लगभग 3000 मीटर पर स्थित है। हमे लगभग 700 मीटर की दूरी 2km में करनी होगी वो भी सीढ़ियों पर या स्लैप पर। रास्ता अच्छा बना है पक्का बना है, जब में 14 साल पहले यहाँ आया था तब ये रास्ता पक्का नहीं बना था। रास्ता भी टुटा हुआ था लकिन अब रास्ता पक्का बना है। बीच बीच में तीन के शेड डाले हुए है और बैंच भी लगे है। जिसपर यात्री बैठकर आराम कर सकते है। यहाँ पर मुझे हर यात्री ख़राब हालात में मिला। सब थके थके हुआ से लगे। क्योकि एक तोह चढ़ायी ज्यादा थी फिर ऊपर से बारिश हो रही थी। बारिश की वजह से ऊपर से नीचे का कोई भी द्र्श्य नहीं दिख रहा था। दूर पहाड़ो को भी कोहरे ने ढका हुआ था। मुझे चलने में कोई परेशानी नहीं हो रही थी ना ही देवांग को। वो भी मस्ती में चले जा रहा था। लकिन मेरी श्रीमती को साँस फूलने व चक्कर की शिकायत हुई लकिन हम आराम आराम से चलते हुए ऊपर पंहुच ही गये।
ऊपर मंदिर परिसर में माँ सुरकुंडा देवी का मंदिर बना है और पास में ही भैरव मंदिर और शिव मंदिर और एक हनुमान मंदिर बना है। हम सुरकुंडा देवी मंदिर के अंदर गये। माँ की आराधना की फिर प्रसाद व कुछ दान देकर वही फर्श पर बैठ गए। एक भक्त माँ के लिए छत्र लेकर आया। पंडित जी ने वो छत्र माता के चरणों में चढ़ाया। मेने पंडित जी से पूछा की यहाँ माता के किस रूप की पूजा होती है तब पंडित जी ने बताया कि यहाँ पर गोरी माता की पूजा होती है और यहाँ सती माता का सर गिरा था। आपको दक्ष प्रजापति वाली कहानी तो पता ही है उस कथा के अनुसार जहां आज सुरकुंडा देवी मंदिर है यही पर माता सती का सर गिरा था। इसलिए यह माता का 52 शक्तिपीठो में से एक है। यहाँ पर गंगा दशहरा के दिन मेला भी लगता है।
मंदिर के अन्दर फोटो खींचना मना है। जबकि कुंजापुरी में फोटो लेना मना नहीं था , चलो जैसी जिस मंदिर की व्यवस्था। हम मंदिर से बाहर आ गए, एक जगह सब लोग नारियल फोड़ रहे थे, मैंने भी अपने प्रसाद वाला नारियल फोड़ा। फिर बारी बारी से सभी मंदिरों में गये। बारिश अभी भी हो रही थी जिसके वजह से हमे ऊपर से दिखने वाले नज़ारे भी नहीं दिखे। जब मौसम साफ होता है तब सुरकुंडा देवी से हिमालय की बहुत सी उच्च पर्वत चोटियाँ दिखती है, यहाँ से उत्तराखंड की ज्यादातर सभी उच्च पर्वत माला के दर्शन हो जाते है लकिन मुझे ऐसा अवसर दोनों बार में से एक बार भी नहीं हुआ। जब में पिछली बार आया तब यहाँ पर बहुत बर्फबारी हुई थी तब भी मौसम खराब था और आज बारिश की वजह से। चलो कोई बात नहीं अगली बार अगर कभी आया तब शायद दिख जाए।
कुछ देर यही बिता कर हम नीचे उतर आये। नीचे दो तीन ढ़ाबे बने है वहाँ हमने खाना खाया। यहाँ पर एक परिवार और बैठा था जिसने बताया कि वो भी कल ही दिल्ली से चले थे लकिन रुड़की से देहरादून वाली सड़क पर डाट वाली माता के मंदिर के पास सुरंग के पास लगे जाम में तीन घंटे फंसे रहे फिर मंसूरी रोड पर भी जाम मिला, अब वो हरिद्वार जा रहे है मैंने उनको कहा कि आप वापिस ना जा कर चम्बा की तरफ से जाये वो रोड आपको खाली और जल्दी पहुचा देगा। होटल वाले ने भी यही सलाह दी की चम्बा की तरफ से जाओ।
हम खाना खाने के बाद धनोल्टी की तरफ निकल गए। कद्दूखाल से धनोल्टी केवल सात किलोमीटर की दूरी पर है। ये शांत व सुंदर जगह है जहाँ मसूरी में शोर सराबा और चमक धमक है, वही धनोल्टी में पेड़ है, शांति है। वैसे अब यहाँ भी बहुत होटल बन गए है। फिर भी यहाँ पर हम प्रकर्ति को काफी करीब से महसूस करते है।
अब बारिश रुक गयी है मेने एक होटल देख कर एक कमरा बुक कर लिया है, होटल से कुछ ही दूर ईको पार्क है लकिन थके होने के कारण वहा जाने को मन नहीं है।फिर भी देवांग के कहने पर मैं उसको लेकर कुछ देर होटल के पास ही घूमता रहा, फिर ईको पार्क तक भी हो आये। ईको पार्क बंद हो गया था क्योकि वह शाम 6 बजे तक ही खुलता है, ईको पार्क कल सुबह जाएंगे ऐसा सोचकर हम वापिस होटल आ गए। अब मौसम एकदम साफ हो गया था और रूम की खिड़की से दूर बर्फ की पहाड़ियां दिख रही थी। पक्का तो नहीं था की यह कौन सी पीक है, पर गंगोत्री व स्वर्गारोहिणी पीक हो सकती है। देवांग खिड़की पर खड़े होकर उन स्वेत बर्फ से ढकी पहाड़ियों को देख रहा था और अपने बाल प्रश्नों की बौछार कर रहा था। की वहाँ कौन रहता है? वहां भगवान रहते है? हम वहा जा सकते है ? मेने कुछ जवाब दे दिए की वहा कोई नहीं रहता है क्योकि वह बर्फ ही बर्फ होती है। फिर भी वह उन पहाड़ियों पर जाना चाहता था। कुछ देर बाद रूम पर खाना आ गया और हम खाना खाकर जल्द ही सो गए।
बहुत रोचक वर्णन किया है साथ ही रास्ते की अच्छी जानकारी मिली। धन्यवाद । अगली कड़ी की प्रतीक्षा है
जवाब देंहटाएंआभार कृष्ण देव जी आपका।
हटाएंमनोरंजक एवम जानकारी से पूर्ण लेख है,धन्यवाद
जवाब देंहटाएंसुंदर लेखन त्यागी जी और फोटो तो कमाल के है जय माता दी
जवाब देंहटाएंजय माता दी गुप्ता जी
हटाएंBachpan se dekthe aaye jagahon ko aap ki najar se dekhna badiya laga.
जवाब देंहटाएंThanks for sharing.
धन्यवाद महेश जी।
हटाएंजी आपका ही जिला है, आपसे ज्यादा और कौन जान सकता है।
जय माता की
जवाब देंहटाएंजय माता दी डॉ साहब।
हटाएंजय माता दी ।
जवाब देंहटाएंबढ़िया यात्रा विवरण
धन्यवाद चन्दन जी।
हटाएंबढ़िया लिखा है ।कभी यहाँ गया नहीं । बादलों में तस्बीरें अच्छी आई हैं।
जवाब देंहटाएंधन्यवाद नरेश जी।
हटाएंअब की बार सपरिवार हो आयो सुरकुंडा माता के दरबार।
बढ़िया लेख त्यागी जी.....और फोटो भी
जवाब देंहटाएंसुरकुंडा देवी की जय .....हम भी कुछ दिनों पहले यही पर होकर आये थे , फिर उसके बाद चम्बा में ही रुके थे....
आभार रितेश भाई।
हटाएंआपके यात्रा लेख का इन्तजार रहेगा।
पैगोडा स्थापत्य लग रहा है मंदिर का जैसे इसके बनाने पर तिब्बेत या जापान का प्रभाव रहा हो ! मंदिर और उस तक पहुँचने का रास्ता बहुत खूबसूरत है ! इसकी प्रसिद्धि देखकर आभास नही होता कि ये मंदिर 3000 मीटर की ऊंचाई पर है ! बहुत बढ़िया दर्शन करा दिए सचिन भाई आपने
जवाब देंहटाएंआभार योगी सारस्वत जी।
हटाएंहां इस मंदिर की रूपरेखा कुछ हिमाचल जैसे मंदिरो जैसी ही है। अभी कुछ साल पहले ही इसको यह रूप मिला है,बाकि पहले यह मंदिर इस रूप में नहीं था।
बहुत बढ़िया भाई
जवाब देंहटाएंआभार श्याम सुंदर भाई।
हटाएंसुन्दर वृतान्त सचिन भाई।
जवाब देंहटाएंशुक्रिया बीनू भाई।
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