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Thursday, October 15, 2015

ओंकारेश्वर मन्दिर व ममलेश्वर (ज्योतिर्लिंग) ओर नर्मदा नदी दर्शन

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29 जून 2015,दिन सोमवार
हम सुबह के लगभग 11बजे उज्जैन से ओंकारेश्वर के लिए चल पड़े। उज्जैन से ओंकारेश्वर तक की दूरी लगभग 127km है।उज्जैन से इंदौर तक टोल रोड है, जिस पर 19रूपयो का टोल लगता है। हमने टोल टैक्स दिया ओर हमारी गाड़ी सरपट दौड़ चली। यह रोड वाकई बहुत बढ़िया बनी है। हम जल्द ही इंदौर पहुँच गए। इंदौर मध्यप्रदेश का एक विकसित शहर है। इंदौर पहुंचने पर हमने एक दवाई घर से कुछ जरूरी दवाईयां ले ली जिनकी रोजमर्रा में जरूरत पड़ती है। इंदौर से ओंकारेश्वर तक की दूरी लगभग 77 km है। अब हम मैन रोड से बांये तरफ जाते खांडवा रोड पर चल पड़े। इस रास्ते पर थोड़ा चलने के बाद ही पहाड़ी रास्ता चालू हो जाता है।रास्ते के मनोहारी दृश्य बहुत सुंदर लग रहे थे। रोड के दोनों तरफ हरे भरे पेड़ पौधे मन को सकुन दे रहे थे। साथ साथ एक नदी भी बह रही थी। जहां पर कुछ पिकनिक स्पोट भी बने थे। कुछ दूर गाड़ी चलाने के बाद राहुल जी ने गाड़ी चलाने की बागडोर मुझे सौंप दी। वहां से लेकर ओंकारेश्वर तक गाड़ी मेने ही चलाई। रास्ता बहुत अच्छा बना था। जितनी परेशानी हमने गुना से उज्जैन तक सहीं थी। आज वह सब मन से बाहर निकल गई क्योकी आज हमे सड़क बहुत अच्छी जो मिली थी। हम उज्जैन से लगभग रूकते रूकते तीन -चार घंटों मे ओंकारेश्वर पहुँच गए । ओंकारेश्वर पहुंचने पर सबसे पहले तो हमने दोनों गाड़ी एक पार्किंग मे लगाई।फिर वही पर एक दुकान पर चाय पी। चाय पीने के बाद हम वहां से पैदल चल पड़े मन्दिर की तरह। थोड़ा चलने पर हमे दूर से विंध्य पर्वत के दर्शन हुए। कहते है की ओम शब्द का पहला उच्चारण यही ओंकारेश्वर मे ही हुआ था।  ओर विंध्य पर्वत  का आकार ओम जैसा है, ओर जैसे ओम मे जहां चंद्र बिंदु होता है, वैसे ही ओंकारेश्वर महादेव का मन्दिर भी विंध्य पर्वत के उसी चंद्र बिंदु में स्थित है। ओंकारेश्वर मन्दिर एक ज्योतिर्लिंग है। यह शिव के बारह ज्योतिर्लिंग मे से एक है। ओंकारेश्वर लिंग किसी मनुष्य के द्वारा गढ़ा, तराशा या बनाया हुआ नहीं है, बल्कि यह प्राकृतिक शिवलिंग है। इसके चारों ओर हमेशा जल भरा रहता है।
मन्दिर तक जाने के दो रास्ते है। एक पुराने पुल से व दूसरा नए झूला पूल से।वैसे हम तो पुराने पुल से ही गए।मन्दिर के ही समीप नर्मदा नदी बह रही थी। नदी का साफ व हरा पानी देखकर हमारे मन मे इसे नजदीक से देखने व छुने की प्रबल इक्षा हुई। इसलिए हम काफी सीढ़ियों से उतरते हुए नर्मदा के एक घाट पर पहुँचे। यहां से मन्दिर बिल्कुल नजदीक ही दिखलाई पड़ता रहा था। नर्मदा का जल बड़ा स्वच्छ था,जिसमें छोटी छोटी मछलिया तैरती हुई दिखलाई दे रही थी। नाव वाले नाव चला रहे थे। लोग उनमें बैठ कर सैर कर रहे थे। घाट पर ही कुछ दुकानें लगी हुई थी, जिनपर प्रसाद व पुष्प बिक रहे थे। ओर साथ मे मछलियों को खिलाने के लिए भूने हुए चने बिक रहे थे। मेरा बेटा देवांग ने मुझसे कहा की पापा आप चने खरीद लीजिए, फिर मछलियों को खिलाऐगे। मैं 10 रू० के चने ले आया ओर देवांग ने मछलियों को चने खिलाए।
मछलियों को चने खिलाने के उपरांत हमने नहाने की सोची। हममें से कुछ नहाएं तो कुछ ने हाथ मुहं ही धौ लिए। मैं ओर देवांग तो जी भर के नहाऐ। जब तक सबने यह नही कह दिया की अब तो बाहर आ जाओ।
नर्मदा नदी को गंगा व यमुना से भी पवित्र नदी माना गया है। कुछ पौराणिक कहानियों व ग्रंथों मे नर्मदा नदी के बारे मे यह कहा गया है की गंगा के सात स्नान व नर्मदा का एक स्नान बराबर है। मतलब यह की गंगा जी मे सात स्नान करने के बाद आपको जितना फल मिलता है, उतना नर्मदा मे एक बार स्नान करने पर ही मिल जाता है। ओर नर्मदा नदी के पत्थर को भगवान शिव माना गया है। यह कहावत प्राचीन समय से ही चली आ रही है की नर्मदा के पत्थर पत्थर मे भगवान शिव का वास है।
हम सभी लोग नर्मदा मे नहाने के पश्चात ओंकारेश्वर महादेव के दर्शन के लिए मन्दिर की तरफ चल पड़े।मन्दिर से पहले कुछ सीढ़ियाँ बनी है, जहां पर काफी भीड़ पहले से ही मौजूद थी। यहां पर दर्शन हेतु महिलाएँ व छोटे बच्चो के लिए अलग लाईन थी। हमसे पहले हमारी ग्रुप की महिलाओं ने दर्शन कर लिए। जब महिलाएँ ने दर्शन कर लिए तब पुरुषों को अन्दर भेजा गया। भोले बाबा के जयकारे लगाते हुए हम मन्दिर के प्रवेश द्वार से अंदर चले गए। अन्दर बड़े बड़े खम्बे जिनपर सुन्दर नक्काशी हो रही थी। उनके बीच से होते हुए। एक छोटे से कमरे मे पहुचें,यहां पर बहुत भीड़ हो रही थी, इसी कमरे से जुड़ा एक छोटा सा कमरा ओर है, जहां पर हमने ओंकारेश्वर महादेव ज्योतिर्लिंग के दर्शन किये। तरह तरह के पुष्पो से ढकां यह शिवलिंग मुझे दिखलाई पड़ा।इसके आगे शीशे का अवरोधक बनाया हुआ था , जिससे भक्त केवल जल चढ़ा सके बाकी इस शिवलिंग को टच ना कर सके। सभी भक्त शिवलिंग पर जल चढ़ा रहे थे। हमने भी महादेव के दर्शन किये ओर मन्दिर से बाहर आ गए।
बाहर आकर हमारे साथ आए पंडितजी सैंकी महाराज ने नर्मदा के जल से एक छोटी सी पूजा कराई। पूजा करने के बाद हम थोड़ी देर मन्दिर मे ही बैठे रहे, जब सब लोग फोटो सोटो खिंच कर आ गए, तब हम सभी एक साथ नए झूला पूल की तरफ से वापस चल पड़े। झूला पूल से दोनों तरफ का शानदार नजारा दिख रहा था। एक तरफ ओंकारेश्वर मन्दिर का बेहतरीन नजारा दिख रहा था तो दूसरी ओर नर्मदा नदी पर बना एक विशाल बाँध सबको अपनी तरफ आकर्षित कर रहा था। झूला पूल को पार करने पर हम वापिस बाजार मे आ गए।
अब हम यहां पर मौजूद दूसरे ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने के लिए चल पड़े। ओंकारेश्वर व ममलेश्वर(अमलेेश्वर) दोनों ही ज्योतिर्लिंग है। इनसे सम्बंधित एक कथा है, ओर कथा के अनुसार एक बार विंध्याचल पर्वत ने भगवान शिव की लगातार छः महीने तक घोर अराधना की। भगवान शिव अत्यधिक प्रसन्न हुए और उन्होंने विंध्याचल पर्वत को दर्शन दिए। उचित अवसर देखकर देवता और ऋषिगण भी आ गए, जिनकी प्रार्थना पर ओंकार नामक लिंग के दो भाग किए गए। जिनमें से पहले में भगवान शिव ओम रूप में विराजे और वह ओंकारेश्वर कहलाया तथा दूसरा उस पार्थिव लिंग से प्रकट होने के कारण अमलेश्वर कहलाया। कहते है की इन दोनों ज्योतिर्लिंग की गणना एक मे होती है। इसलिए सम्पूर्ण ज्योतिर्लिंग दर्शन करने के लिए ओंकारेश्वर व ममलेश्वर दोनों के ही दर्शन जरूरी माने जाते है।
कुछ दूर चलने पर हम ममलेश्वर महादेव के प्राचीन मन्दिर(10वी शताब्दी कालीन) के पास आकर रूक गए।काले व भूरे पत्थर से बना यह मन्दिर दिखने मे बड़ा सुंदर लग रहा था। मन्दिर के पास चार पांच मन्दिर ओर भी थे। फिलहाल हम ममलेश्वर मन्दिर मे ज्योतिर्लिंग दर्शन के लिए अंदर गए। शिवलिंग के दर्शन बहुत अच्छे ढंग से हो गए।यहां पर भीड़ बिल्कुल भी नही थी। शिवलिंग का पूजन जल व पुष्प से किया।फिर मन्दिर के अंदर ही शिवलिंग के फोटो भी लिए,एक बात यहां देखी की ओंकारेश्वर की तरह यहां पर फोटो खिंचने की मनाई नही है। यहां पर आप कितने ही फोटो खिंच सकते है, बिना किसी की रोकटोक के। हम लोग दर्शन कर मन्दिर से बाहर आ गए। बाहर आकर मैं वहां पर अन्य बने मन्दिर देखने लगा। यहां पर बहुत से पंडितजी अपने जजमानो की पूजा करा रहे थे। एक मन्दिर मे कई तरह की प्राचीन व दुर्लभ मूर्तियाँ रखी थी, वहां पर वारह अवतार की भी मूर्ति रखी थी। एक पंडित जी थे मेने उनसे पूछा की यह सब यहां पर एक साथ क्यों रखी है। तब उन्होंने बताया की यह सब मूर्तियाँ बड़ी प्राचीन है, ओर यहां पर खुदाई मे ही मिली है। जगह की कमी की वजह से इन्हें एक ही जगह रखा गया है। मेने उन सभी की एक फोटो खीची ही तभी मेरे कैमरे की बैटरी खत्म हो गई। ओर मै मन्दिर से बाहर आ गया। फिर हम सब पार्किंग की तरफ चल पड़े। लेकिन हमारे साथ आएं पंडित जी ने हमे कोई ओर दूसरा रास्ता दिखा दिया। हम उस रास्ते पर चल दिए। आगे जाकर उस रास्ते पर हमें बहुत से बंदरो का सामना करना पड़ा। बंदरो से निपटने के बाद हम सभी पार्किंग पहुँचे। गर्मी बहुत लग रही थी,इसलिए निम्बू पानी पीया गया। थोड़ी देर बाद हम वहां से वापिस उज्जैन की तरफ चल पड़े। रास्ते मे एक अच्छा सा ढाबा देखकर खाना खाया गया। जब हम वहां से चले तो मौसम कुछ अच्छा सा हो गया था। हवा मे कुछ ठंडक हो गई थी। इंदौर पार करने के बाद तो इतनी तेज बारिश हुई की उज्जैन तक नही रूकी। शाम के लगभग सात बजे हम उज्जैन पहुँचे।जहां से हम अपने होटेल मे चले गए।
अब कुछ फोटो देखे जाए इस यात्रा के......
ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग 
इंदौर खंडवा रोड पर कहीं 
पुराना पूल ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग व विंध्य पर्वत दर्शन 
ओंकारेश्वर मंदिर दर्शन व सामने नर्मदा पर बना बाँध दिखता हुआ 
नर्मदा का एक घाट 
नर्मदा के शांत जल पर तैरती एक  नाव
में सचिन अपने बेटे देवांग संग नर्मदा के एक घाट पर 
मंदिर तक जाता रास्ता व दोनों ओर  दुकाने 
मन्दिर पर ऐसी भीड़ का सामना करना पड़ा 
दीदी ,जीजाजी व सूरज भाई और उनकी फैमिली 
एक फोटो अपनी फैमिली का भी ओंकारेश्वर मंदिर के सामने 
में सचिन त्यागी ओंकारेश्वर मंदिर पर 
बच्चे अपनी ही मस्ती में होते है (देवांग और वीर )
 झूला पूल व बांध 
झूला पूल से दिखते अन्य मंदिर 
ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर 
ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग शिवलिंग दर्शन 
यही वोह मंदिर था जॅहा पर बहुत सारी मूर्तियाँ  साथ रखी थी 

14 comments:

  1. बहुत अच्छे सचिन भाई... पूर्णविराम के बाद एक स्पेस दे देना तो अच्छा लगेगा।

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    1. नीरज जी..शुक्रिया।
      जल्द ही गलती ठीक कर ली जाऐगी।

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  2. नीरज से सही बात की है।पूर्ण विराम के बाद एक स्पेस तो बनता है।
    आप नाव से ओंकारेश्वर मन्दिर तक जाते तो और भी बढ़ियाँ लगता।जाने के टाईम आप् नाव वाले को थोडा आगे पत्थरो के पास जहाँ बाँध है वहां छोड़ने को कहते तो नहाने का आनन्द और भी आता ।हम लोग हमेशा वही नहाते है । नहाने के बाद नाव वाला ही आपको मन्दिर तक छोड़ देता ।फिर दर्शन कर के आप पुल से वापस आ सकते थे। आप नाव से जाते तो आपको गुप्त गंगा के भी दर्शन हो जाते जो नर्मदा में मिली है।

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    1. दर्शन कौर धनोय जी धन्यवाद।
      यह सारी बातें पहले नही पता थी।अब पता चल गई, आगे कभी जाना हुआ तो अवश्य आपकी बातें ध्यान मे रखी जाऐगी।

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  3. Sachin bhai aap ne aachi jaankari di hame sirf
    Ujjain ka hi pataa tha aaj ki post se bahot. jaankari mili

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    1. धन्यवाद विनोद गुप्ता जी,पोस्ट पसंद करने के लिए।

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  4. अच्छा लेख, अच्छी चित्रकारी और शुभ दर्शन ............ छोटी-छोटी गलतियाँ सही होती जाएँगी......!

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    1. शैलेन्द्र भाई धन्यवाद।

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  5. बहुत ही सुंदर और ज्ञानवर्धक पोस्‍ट। मेरे ब्‍लाग पर आपका स्‍वागत है।

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  6. शुक्रिया !! जमशेद आज़मी जी।

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  7. बहुत सुंदर और informative पोस्ट ।

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  8. धन्यवाद नीतिन मिश्रा जी, आप जैसे घुमक्कड का ब्लॉग पर स्वागत है।

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  9. बहुत लाभदायक जानकारी है सचिन जी मैं कल ओमकारेश्वर और महाकाल के दर्शन करने जा रहा हूं आप की जानकारी मुझे लाभ देगी

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    1. धन्यवाद प्रदीप श्रीवास्तव जी। अगर मेरे ब्लॉग से किसी को जानकारी मिले तो मेरे लिए बड़ी खुशी की बात है।

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