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बुधवार, 30 अगस्त 2017

चोपता तुंगनाथ यात्रा_चोपता से तुंगनाथ मन्दिर

तृतीय केदार तुंगनाथ मंदिर, चोपता ,उत्तराखंड 

29 मई 2017
सुबह 5 बजे फोन में अलार्म बज गया। वैसे मैं अलार्म बजने से पहले ही ऊठ चुका था लेकिन बिस्तर नही छोडा था। क्योकी बाहर अभी सर्दी थी और रजाई से बाहर निकलने का मन नही कर रहा था। कुछ देर बाद ललित भी ऊठ गया। मैने ललित को बोला की नहाने व पीने के लिए गर्म पानी ले आ। थोडी देर बाद वह पीने के लिए गर्म पानी ले आया। मुझे सुबह गर्म पानी पीने की आदत है। खैर पानी आ गया पर पीने को मन नही किया। क्योकी पानी में चीड के पेड की लकडी के धुंए की महक आ रही थी। यहां पर लाईट नही है केवल सोलर पावर से ही फोन चार्ज व लाईट को जलाने का जुगाड़ हो पाता है। इसलिए लकड़ियों द्वारा ही नहाने व पीने के लिए पानी गर्म किया जाता है। हम दोनो नहा-धौकर सुबह लगभग 5:40 पर चोपता की तरफ चल पडे।

वैसे बनियाकुंड से चोपता की दूरी लगभग एक किलोमीटर के आसपास ही है इसलिए हमे अपनी कार से वहा तक पहुंचने में कुछ ही मिनट लगे। चोपता में जहां से भगवान तुंगनाथ की यात्रा आरम्भ होती है, उधर पास में ही सड़क किनारे अपनी कार को खडा कर दिया। और एक ढ़ाबे पर सुबह की चाय के साथ बटर ब्रेड खा लिए। साथ में पानी की एक बोतल व कुछ बिस्किट खरीद कर हम चल पडे बाबा तुंगनाथ की यात्रा पर।

तुंगनाथ पंचकेदार में से एक है इन्हे तृतीय केदार माना जाता है। यह मन्दिर लगभग 1000 वर्ष पुराना है लेकिन इस मन्दिर की स्थापना पांडवो द्वारा की गई थी ऐसा बताया जाता है। बाद में किसी ने इसका दोबारा से (जीर्णोद्धार) निर्माण कराया होगा। आपने वह कहानी तो सुनी ही होगी जब पांडवो ने कुरूक्षेत्र में अपने ही गोत्र भाईयो(कौरवों) की हत्या कर युद्ध जीता था। तब पांडवो से भगवान शिव नाराज हो गए और पांडवो को गोत्र वंश हत्या का दोष लग गया। महर्षि वेद व्यास जी के कहने पर पांडव शिव के दर्शन करने केदारखंड आए। केदारखंड मतलब शिव की भूमि जिसे आज हम उत्तराखंड के नाम से जानते है। शिव दर्शन देना नही चाहते थे और पांडव शिव के दर्शन के बिना जाने वाले थे नही। ऐसे में पांडवो ने पूरा केदारखंड घूम लिया। एक दिन शिव का पीछा करते हुए पांडव एक घाटी में पहुंचे जहां पर बहुत से बैल घास चर रहे थे। इन्ही बैलो में भगवान शिव भी बैल का रूप धारण किये हुए थे। महाबली भीम ने शिव को पहचान लिया और शिव रूपी बैल को पकड लिया। शिव रूपी बैल गायब होने लगा। बैल का आगे का हिस्सा नेपाल के पशुपतिनाथ में निकला। केदारनाथ में बैल का ऊपरी भाग। मध्महेश्वर मे नीचे का भाग (नाभि ) तो तुंगनाथ मे भुजा व उदर भाग, रूद्रनाथ में मुंह व कल्पेश्वर में जटांए। बाद में भगवान शिव ने पांडवो को दर्शन दिए व उनको दोष से मुक्त भी किया।

चोपता समुंद्र तल से लगभग 2650 मीटर पर है जबकी तुंगनाथ मन्दिर की ऊंचाई लगभग 3560 मीटर है। तुंगनाथ पंचकेदारो में सबसे ऊंचाई पर बसा शिव मन्दिर है। शीतकालीन मे इस मन्दिर के कपाट बंद हो जाते है क्योकी यहां पर कई फुट बर्फ रहती है। लेकिन कुछ लोग तब भी यहां पर लम्बी ट्रैकिंग करके पहुंच जाते है। अब हम दोनो पैदल ऊपर की तरफ चल पडे। रास्ता पक्का बना हुआ है। शुरू में हल्की चढाई हैं, एक बुग्याल तक। लेकिन बुग्याल के बाद खडी चढाई है। चोपता से तुंगनाथ तक की दूरी लगभग 3 किलोमीटर की है। इस दूरी को तय करने में तकरीबन 2 घंटे लग ही जाते है। बुग्याल तक ललित की हालत खस्ता हो चुकी थी। उसके घुटनो ने जवाब दे दिया और उसने घोडा कर लिया ऊपर तक के लिए। एक घोडा वाला वापसी आ रहा था। उसके पास दो घोडे थे मुझसे भी बहुत कहा की बैठ जाओ पर मै बैठा नही। बाद में घोडे वाले ने कहा की साहब मेरे दोनो घोडे ऊपर जा ही रहे है आप जो दीजिएगा वही ले लूंगा। ललित ने भी कहा की बैठ जाओ जल्दी पहुंच जाएगे। मुझे मजबूरी में बैठना पडा। क्योकी पैदल चलने में जो मजा है वह घोडे की सवारी में नही। खैर हम जल्द ही एक दूकान पर रूके घोडे को चने व गुड खिलाया। घोडे वाले ने बताया की उसकी यह दोनो घोडीयां केदार नाथ त्रासदी में बह गई थी। फिर यह दसवे दिन जंगल में मिली जब यह बहुत कमजोर हो गई थी। ललित भी अपनी केदारनाथ यात्रा के वह पल उसे सुना रहा था। जिसे मैं सुनता चल रहा था।




तुंगनाथ यात्रा प्रवेश द्वार 


बुग्याल (घास का मैदान )

सामने सारी गांव है दूर पहाड़ के नीचे ,जहां से देवरया ताल यात्रा शुरू होती है। 

ललित 

यह सुंदर रास्ते 


पहाड़ो , पेड़ो को निहारता मैं सचिन त्यागी। 


पहाड़ी झोपडी 

ललित

सुबह सुबह हवा में ठंडक थी लेकिन उतनी नही जितना कल शाम लग रही थी। बादलो ने चारो और अपना साम्राज्य फैलाया हुआ था। सुंदर दृश्य बादलो के पीछे छिपे थे। आगे एक दुकान आई जहां से लगभग मन्दिर 1किलोमीटर रह जाता है। कुछ दूरी पर एक गणेश मन्दिर बना है। पास में ही रावण शिला है जहां पर रावण ने तपस्या की थी और भोलेनाथ को प्रसन्न किया था। मन्दिर से तकरीबन 1.5 किलोमीटर ऊपर चंद्रशिला नामक चोटी है। जहां से 360° का पैरोनोमा व्यू दिखता है। चोखम्भा पर्वत तो पूरे रास्ते आपके साथ बना रहता है, मतलब बादल ना हो तो यह दिखता रहता है। मन्दिर से कुछ पहले दो तीन दुकान बनी है। कुछ धर्मशालाए भी है जहां पर यात्री रात में रूक भी सकते है। मन्दिर में चढ़ाने के लिए प्रसाद ले लिया व एक पंडित जी भी साथ हो लिए पूजा कराने के लिए। मन्दिर में दो कक्ष बने है एक बाहरी कक्ष व दूसरा मुख्य कक्ष जहां पर साक्षात भगवान शिव का वास है। पंडित जी ने बहुत अच्छे से पूजा कराई बाद में हमने उनको दक्षिणा देकर विदा किए।
मन्दिर के पास छोटे छोटे दो तीन मन्दिर और बने है। जिसमे एक मन्दिर पार्वती जी का भी है। कुछ देर बाद कुछ लोग आए जो मन्दिर की विडियो बना रहे थे। उनमे एक थे हैरी रावत जी जिनका यूट्यूब पर एक चैनल है। वह उसके लिए ही विडियो बनाने गाजियाबाद से यहां आए थे। हम मन्दिर के चारो तरफ एक चक्कर लगाते हुए मन्दिर परिसर में ही बैठ गए। यही से एक प्राचीन रास्ता गोपेश्वर के लिए जाता था, जो अब टूटने के कारण बंद कर दिया है। मन्दिर के पीछे बहुत गहरी खाई भी है जिसमे से बादल ऊपर ऊठ रहे थे। मौसम खराब था ऊपर बादल ही बादल थे। इसलिए चंद्र शिला जाना कैंसल कर दिया। अगली बार के लिए छोड दिया। 
कई दुकान पड़ती है रास्ते में ऐसी। थोड़ा सामान महंगा मिलता है बस। 

इसको पारले जी का पूरा पैकेट खिला दिया था। 

दूर चन्द्रशिला चोटी दिखती हुई। 

गणेश मंदिर और उसके पीछे रावण शिला 

गणेश मंदिर और उसके पीछे रावण शिला 


पुराना रास्ता ,,बोर्ड से ही अंदाजा लग रहा है। वैसे थोड़ा चल कर आओ इस रास्ते पर सुंदर दर्शये दिखते है। 
चलो तुंगनाथ मंदिर आ गया। 

घुटने के दर्द के वाबजूद भी मुझ से आगे ललित। 

तुंगनाथ मंदिर व साथ में पार्वती मंदिर ,,साथ में कोहरे का कहर। 

मैं सचिन 

सेल्फी विथ तुंगनाथ टेम्पल 

ललित कुमार 

मंदिर से आगे जाता रास्ता साथ में कोहरा। 

एक अन्य मंदिर 


वापसी के लिए हम नीचे चल पडे। बुग्याल तक पहुंचे और घोडे वाले को ललित ने पैसे दिये और कुछ देर वही घास के हरे भरे बुग्याल में बैठे रहे फिर वापस पैदल नीचे चल पडे। तुंगनाथ का पौराणिक महत्व तो है ही लेकिन यहां का वातावरण इतना सुंदर है की लोग यहां आकर अपने आप को प्रकृति के बेहद करीब महसूस करते है इसलिए ही तो कपाट बंद होने के बाद भी लोग यहां आते रहते है।
चौखंबा पर्वत 

बादलो के परे श्वेत बर्फीले पर्वत। 

वापिस बुग्याल पर। 

नीचे पहुंच कर गाडी में रखे केले खाए गए क्योकी भूख बहुत लग रही थी। ललित के घुटने में दर्द था इसलिए आगे गाडी चलाने की जिम्मेदारी मैंने ले ली।और चल पडे वापसी हरिद्वार की ओर। हमने वापसी के लिए मक्कू बैंड से दूसरा रास्ता पकड़ लिया। जो कई गांवो से होता हुआ भीरी में मैन सड़क पर मिल गया। भीरी से अगस्त्य मुनि पहुंचे। यहां पर आते वक्त मेने कुछ दवाईयां ली थी लेकिन आज हम बाजार में नही रूके बल्की कुछ दूर आगे चलकर सड़क किनारे गाडी खडी करके मंदाकिनी नदी के किनारे पहुंचे। पानी कल कल करके बह रहा था बहुत ही शांत स्वभाव में, जबकी केदारनाथ त्रासदी के समय इस नदी ने विकराल व प्रचंड रूप ले लिया था। हम दोनो कुछ देर मंदाकिनी नदी के किनारे बैठे रहे। फिर ललित ने एक बोतल मे नदी से जल भरा और गाडी में रख लिया। फिर हम वहां चल पडे। रूद्रप्रयाग पहुंचे और एक होटल पर खाना खाया। फिर देवप्रयाग होते हुए रीशीकेश पहुंचे। यहां पर जाम लगा हुआ था इसलिए नीलकंठ वाले पूल को पार कर के बैराज पहुंचे। इधर कोई जाम नही मिला और शाम तक हरिद्वार पहुंच गए। रात हरिद्वार में बीता कर सुबह एक दो मन्दिर देख कर हम दोपहर बाद अपने घर पहुंच गए।
ललित का दर्द अब कार मुझे चलनी पड़ेगी। हा  हा हा 

वापसी में अगस्त्यमुनि से आगे मंदाकनी नदी के किनारे

वापसी में अगस्त्यमुनि से आगे मंदाकनी नदी के किनारे पर मैं सचिन और  ललित 

धन्यवाद मिलते है अगले सफर पर। .... 

(दिल्ली से दिल्ली यह यात्रा आप तीन से चार दिन में कर सकते है। आप इस टूर में देवरीया ताल भी शामिल कर सकते है)
यात्रा समाप्त.!
पिछली पोस्ट...
इस यात्रा की सभी पोस्ट। ... 
1 - दिल्ली से देवप्रयाग 
2 - देवप्रयाग से चोपता 
3 - चोपता से तुंगनाथ 

सोमवार, 31 जुलाई 2017

चोपता तुंगनाथ यात्रा_ धारी देवी_ कोटेश्वर महादेव _चोपता

धारी देवी मंदिर 
28 मई 2017
देवप्रयाग घुमने के बाद हम वापिस कार पर पहुंचे । मेने सुझाव दिया की यहां से कुछ दूर रूद्रप्रयाग  (67 किलोमीटर) है। आज वही रूक जाएगे और रूद्रप्रयाग के पास ही कोटेश्वर महादेव मन्दिर भी है वह भी देख लेंगे और अगले दिन वापिस चल देंगे। ललित ने भी आगे चलने की स्वीकृति दे दी। हम देवप्रयाग से लगभग दोपहरी के 11:30 पर आगे रूद्रप्रयाग की तरफ चल पडे। पता नही सबको यह महसूस होता है या नही पर मुझे हरिद्वार से निकलते ही और पहाड पर चढते ही बडी अच्छी सी फीलिंग्स आने लगती है। रास्ते मे हमे सिख भाईयो की टोली मिलती रही जो पवित्र धाम हेमकुंड जा रहे थे। रास्ते में कई लोग चार धाम यात्रियों के लिए भण्डारा भी लगाए हुए थे। जल्द ही श्रीनगर पहुंच गए। श्रीनगर उत्तराखंड का एक बडा नगर है। श्रीनगर से लगभग 15 किलोमीटर चलने पर कलियासौड़ जगह आती है। यहां पर माँ धारी देवी का मन्दिर अलकनंदा नदी के किनारे बना है। इन देवी की यहां पर बहुत मान्यता है। ऐसी मान्यता है की यह देवी उत्तराखंड की रक्षा करती है। चार धाम तीर्थों की रक्षा करती है। कहते है की किसी स्थानीय निवासीयो ने नदी में औरत की चीख सुनी। वह नदी के समीप गए तो देखा एक मूर्ति बहती हुई आ रही है। मूर्ति को गांव वालो ने वही स्थापित कर दिया, और अपने गांव के नाम पर ही इन माता का नाम धारी देवी रख दिया।
अभी कुछ साल पहले से अलकनंदा नदी पर बाँध बनाने का कार्य चल रहा है। जिससे विधुत उत्पादन किया जाएगा।  बाँध की वजह से अलकनंदा नदी के जल स्तर में बढ़ोतरी हुई। जिससे यह प्राचीन मन्दिर डूब क्षेत्र में आ गया। इसलिए 16 जून 2013 को धारी देवी की मूर्ति को उसकी जगह से हटाना पडा। और संयोग से उसी दिन उत्तराखंड में जल प्रलय आ गई। हर जगह बारिश हो रही थी। बादल फट गए थे ग्लेशियर टूट गए थे। जिससे हजारो की संख्या में लोग मारे गए। लोगो को कहना था की धारी देवी नाराज हो गई थी इसलिए यह प्रलय आई। बाकी आज मन्दिर को नया रूप दे दिया गया है। हमने धारी देवी को दूर से ही प्रणाम कर लिया। क्योकी अभी हमे 27 किलोमीटर और आगे रूद्रप्रयाग जाना था। अगली बार जब इधर आऊंगा तब धारी देवी के दर्शन अवश्य करूंगा।
श्रीनगर 

श्रीनगर के पास 


मैं सचिन त्यागी और धारी देवी मंदिर नीचे दिखता हुआ। 

सड़क पर मंदिर का प्रवेश द्वार 



अब हम धारी देवी से तकरीबन 27 किलोमीटर दूर रूद्रप्रयाग की तरफ निकल पडे। लगभग दोपहर के 1:30 हो चुके थे, हम रूद्रप्रयाग पहुंचे। भूख भी जोरो से लग रही थी। ललित ने एक होटल की तरफ इशारा करते हुए बताया की जब वह जून 2013 में केदारनाथ आया था तब इसी होटल में रूके थे खाना खाने के लिए। मेने गाडी उसी होटल की पार्किग में लगा दी। खाने के लिए बोल दिया 60 रू थाली मिली। खाना स्वादिष्ट व सादा ही था। यह होटल अलकनंदा नदी के पास ही था। खाना खाने के बाद होटल के मालिक से रूकने के लिए रूम के लिए पूछा तो उसने 1000 रू बताया। हमने कहां की फिलहाल कोटेश्वर महादेव जा रहे है। वापसी में देखते है शायद आपके यही रूक जाए। अब हम प्रयाग के पास पहुचें । रूद्रप्रयाग मे बद्रीनाथ से आती अलकनंदा नदी व केदारनाथ से आती मन्दाकनी नदी का संगम है। हम नीचे प्रयाग नही गए। हम लोहे के पुल को पार करके बांये तरफ जाते रोड पर चल दिए। यह रोड केदारनाथ की तरफ जाता है। थोडा सा चलने पर ही कोटेश्वर मन्दिर के लिए एक रास्ता दांयी तरफ अलकनंदा नदी के साथ अलग चला जाता है। हम भी उस तरफ चल पडे। लगभग तीन किलोमीटर चलने पर कोटेश्वर महादेव मन्दिर पहुँच गए। मन्दिर नीचे नदी के किनारे बना है। एक प्राचीन गुफा भी है जिसमे पानी रिसता रहता है और अजीब अजीब सी आकृतियाँ  रूप ले लेती है। जिनको लोग भगवान का नाम व अस्त्रशस्त्र का नाम दे देते है। बाकी यह प्राकृतिक गुफा देखने में बडी ही सुंदर लगती है क्योकी प्रकृति द्वारा बनाई गई हर चीज सुंदर ही होती है लेकिन मनुष्य उनका ज्यादा दोहन कर कर के उनको बर्बाद कर देता है। गुफा में दर्शन करने के पश्चात् हम नीचे अलकनंदा नदी के समीप गए। कुछ फोटो सोटो लिए और हाथ मुंह धौकर ऊपर आ गए। ऊपर कुछ मन्दिर और भी बने है जिनसे शनिदेव, हनुमान व शिव की मन्दिर भी है। एक मन्दिर में कुछ भक्त शिव का जल अभिषेक कर रहे थे। हमने भी माथा टेका और मन्दिर से बाहर आ गए। बाकी इस मन्दिर की पौराणिक महत्व पता नही चल पाया। लेकिन यह केदार खंड है मतलब शिव की भूमि तो कुछ ना कुछ इस मन्दिर का महत्व तो जरूर रहा होगा तभी तो लोग यहां पर दर्शन करने आते है। बाकी यह जगह काफी सुंदर है आप वैसे भी यहां आ सकते है  और इस जगह की सुंदरता को देख सकते है।
रुद्रप्रयाग 

रुद्रप्रयाग 
यहाँ से लेफ्ट होना है केदारनाथ वाले रस्ते पर फिर वहा से पोखरी वाले रोड पर मुड़ना है वही से कोटेशवर के लिए रास्ता अलग होता है 
कोटेश्वर महादेव मंदिर का बाहरी द्वार 

मंदिर तक जाता रास्ता 

मंदिर तक जाता रास्ता 

किसी ने मिट्टी का शिवलिंग बनाया हुआ है 

मंदिर परिषर 

मंदिरो के बीच से गुफा तक जाता रास्ता और नीचे मन्दाकनी नदी दिखती हुई 


गुफा में शिवलिंग 

रिसते हुए पानी से बनी आकृतियाँ 

शेषनाग 


नीचे मंदाकनी नदी ऊपर झूला पुल 

ललित 

हम ही है सचिन 


कुछ देर बाद हम वापिस गाडी पर पहुंच गए और समय देखा तो लगभग तीन बज रहे थे। मैने ललित से कहां की चल चोपता चलते है पास में ही है लगभग 6 बजे तक वहां पहुंच जाएगे। उसने कहां की चलो ठीक है। अब गाडी की कमान ललित ने पकड ली। और चल पडे चोपता की तरफ। हम दोनो तिलवाडा होते हुए अगस्तमुनी पहुंचे। यहां पर महर्षि अगस्त का मन्दिर भी है। लगभग उसी मन्दिर के पास ही बाजार से मेने एक दवाई घर से एक मूव खरीदी। फिर हम आगे चल पडे। भीरी पहुंचने पर हमे तेज बारिश मिली। ललित ने मुझे याद दिलाया की आज 28 मई है और मौसम विभाग ने 28 और 29 को एक चेतावनी जारी की है की उत्तराखंड में तेज बारिश होगी। हम बारिश में चलते रहे और बारिॆश और तेज होती गई। ललित ने मुझसे कहा की वापिस रूद्रप्रयाग चलते है उसने तो एक सिक्के से टॉस भी कर लिया था की आगे जाए या नही। मैने उसे समझाया की हर बार जल प्रलय नही आती। हम उखीमठ रूकेंगे आज। मुझे पता था की वह कुछ डरा हुआ है क्योकी वह 16जून 2013 को केदारनाथ में था जिस दिन केदारनाथ में जल प्रलय आई थी। तब से वह कुछ डरने लगा है पहाडो की बारिश को देखकर। हम दोनो कुंड नामक जगह पहुंचे। यहां पर मैने अपने एक दोस्त संजय कौशिक जी को फोन लगाया की आप ऊखीमठ में कहा रूके थे एक दिन पहले।  उन्होने बताया की वह होटल का नाम नही जानते पर वह पहले चौक के पास ही है। खैर हम आगे बढ गए अब मौसम साफ हो चुका था। दूर अखंड हिमालय की उच्च चोटियां साफ नजर आ रही थी। इतनी साफ की देखते रहने का मन करता है। अब ललित भी खुश था और रास्ते की सुंदरता के मजे ले रहा था। ललित को रास्तो का व जगहो का नाम इतना याद नही रहता। लेकिन चोपता के रास्ते उसको जाने पहचाने लग रहे थे। उसने बताया की वह 16 जून 2013 को इसी रास्ते से चमोली गया था। हम दोनो थोडी देर के लिए मक्कु बैंड पर रूके हमने एक दुकान पर चाय पी और बिस्किट खाए। आगे चलकर हम बनियाकुंड पर रूक गए । हनुमान मन्दिर के ठीक सामने। हमे 800 रू में कमरा मिल गया। यहां पर फोन काम नही कर रहा था इसलिए होटल से चोपता की तरफ चल पडे एक ऊंची जगह पर चढ गए आगे एक कैम्प भी लगा था। यहां पर वोडाफोन के सिग्नल आ रहे थे। घर फोन करके बता दिया की हम हरिद्वार से चोपता आ गए है। और दो दिन बाद घर आएगे। घर फोन करना इसलिए जरूरी था क्योकी हम घर से केवल हरिद्वार बता कर ही आए थे। यहां पर हमे एक परिवार मिला जो देहरादून से आया हुआ था। और कैम्पिंग का पूरा समान लिए हुए थे। लेकिन बारिश की वजह से उनको होटल लेना पडा। उन्होने हमें चाय अॉफर की फिर हम दोनो उनके साथ काफी देर तक बैंठे रहे। ललित भी अपनी केदारनाथ यात्रा के बारे में सुनाता रहा। फिर हम वहां से चल पडे। अब अंधेरा हो चुका था होटल पहुंचते ही हमे खाना मिल गया। अब मौसम में ठंड बढ़ने लगी थी। और हम गर्म कपडे लाए थे नही वो तो मेरे बैग में एक गर्म हाफ जैकेट पडी थी जो मेने पहन ली, ललित को मेने अपनी रेन कोट की जैकेट दे दी। अंदर दोनो ने दो दो टी-शर्ट पहन ली। अब सर्दी कम लग रही थी। खाना खाने के बाद देहरादून वाला परिवार सड़क पर मिला वह कुछ लोग खाना खाने आए थे। उन्होने एक बहुत लम्बी दूरी तक रोशनी फेंकने वाली टार्च ली हुई थी। कह रहे थे की आगे रोड पर जाएगे और जंगली जानवरों को इस टार्च की वजह से देखेंगे। आप को बता दूं  की चोपता व आसपास की जगह केदारनाथ वन अभयारण्य क्षेत्र में आता ।इसलिए भालू, काकड व अन्य जंगली जानवरों का यहां मिलना साामान्य है। लेकिन यह जानवर जहां इंसानी बस्ती व ज्यादा चहल पहल होती है, उधर नही आते है। कुछ स्थानीय लोग जो हमारे पास बैठे थे वह भी हमको भालू के किस्से सुनाने लगे। काफी देर बाद मुझे नींद आने लगी थी और ललित को भी, इसलिए हम सोने के लिए अपने रूम में चले गए......
चल पड़े मुसाफ़िर ,(रुद्रप्रयाग )

रुद्रप्रयाग से आगे 

अगस्तमुनि और मंदिर को जाता रास्ता 

कुंड से सीधे हाथ पर मुड़ने के बाद ऐसा नज़ारा दीखता रहता है। 


बनियाकुण्ड में जहाँ हम रुके थे वो होटल (होटल मोनल ) और ललित 

अखण्ड हिमालय 


हनुमान मंदिर बनियाकुण्ड ,चोपता 

चोपता को जाती सड़क 

देहरादून का परिवार जिन्होंने हमे चाय पिलवाई थी साथ में ललित 

आग से निकला धुंआ और ढलती सर्द शाम 

बोन फायर 

कैंप जहां खाने पिने और रहने का 3500 रुपए लगते है अकेले बन्दे के 

शिकार और शिकारी 

चोपता 

चोपता 

चोपता