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शुक्रवार, 10 अप्रैल 2015

रेणुका झील की परिक्रमा व mini zoo

दिनांक 26 जनवरी
आज आँख जल्दी ही खुल गई,खिडकी से पर्दा हटाकर बाहर देखा तो पूरे बाजार मे सन्नाटा छाया हुआ था,किसी भी प्रकार की दुकाने नही खुली हुई थी,होटल के सामने गिरी नदी शान्त स्वभाव में बह रही थी,चाय पीने का मन था पर अभी होटल नया बना था इसलिए रेस्टोरेंट की सुविधा नही थी,मै होटल से बाहर आकर थोडी दूर घुम आया पर दुकाने बंद ही मिली,शायद आज 26 जनवरी(गणतंत्र दिवस) है इसलिए दुकाने देर से खुले इसलिए मै वापस होटल की तरफ चल पडा,होटल के बाहर होटल के मालिक मिल गए,थोडी उनसे बातचीत होती रही,उन्ही से पता चला की यहां पर गिरी नदी पर डैम बनाया जाऐगा जहां से बिजली बनेगी व ददाहु से शिमला के लिए व पावंटा साहिब के लिए बस मिल जाती है,उन्होने यह भी बताया की पहले यहां पर बहुत कम बाहर का पर्यटक आता था पर अब यहां पर पर्यटक आने चालू हो गए है,इसलिए ही मेने यह होटल बनाया है,
कुछ देर उनसे बात होती रही इतने में ही होटल के पास वाली एक दुकान खुल गई,मैने उससे दो चाय पैक कराई ओर सीधे अपने रूम मे पहुचां,चाय पीने के बाद,हम नहाकर व सुबह के दैनिक कार्य को निपटा कर गाडी के पास पहुचें,गाडी में समान रखकर सीधे रेणुका झील पहुचें,सुबह सुबह का मौसम था,हर ओर साफ व मन को प्रसन्न करने वाली ताजी वायु चल रही थी,ऐसी जगह मन अपने आप ही खुश हो जाता है,पक्षीयो की आवाज इस माहौल को ओर भी सुन्दर बना रही थी,यहां पर केवल हम ही थे ओर कोई हमे यहां पर दिखाई नही दिया,वैसे थोडी देर बाद यहां पर कई पर्यटक आ गए थे!
देवांग ने गाडी में से एक कुरकुरे का पैकिट निकाल कर खोला ही था की एक बलशाली बंदर महाराज ने वो पैकिट देवांग से छीन लिया ओर पेड पर बैठ कर बडे मजे से कुककुरो का आनन्द लिया,यहां पर बंदरो की बहुत बडी फौज है जो हर जगह आपको मिल जाऐगी ओर आपको परेशान भी कर सकती है,
बंदर से बच कर हम मन्दिर पहुचें,यहा पर पूजा की ,प्रसाद खाया व दक्षिणा दी,वहा पर एक परिवार भी था जो शायद वहां का लोकल भी हो,उन्होने हमे बताया की यहां पर प्रसाद में कच्चे चावल भी मिलते है,वह चावल उनको खिलाए जाते है जिनको बूरे सपने व नींद मे बोलने व चलने की बिमारी होती है,
पंडित जी ने हमे भी कच्चे चावल दिए,हम मन्दिर से बाहर आ गए,मन्दिर के बाहर ही एक टिले नुमा जगह थी जिस पर परशुराम बैठ कर तप किया करते थे,यह सब देख कर हम तीनो झील की परिक्रमा मार्ग पर चल पडे,
यह परिक्रमा मार्ग लगभग 3.5 km लम्बा है,आज सोमवार था इसलिए इसका बडा गेट बंद था नही तो गाडी,बाईक से भी परिक्रमा की जा सकती है,परिक्रमा मार्ग पक्का बना हुआ है,ऐसा प्रतित होता है जैसे आप किसी जंगल में जा रहे हो,पक्षीयों की आवाज,बन्दरो की आवाज,ओर साथ में शेर की दहाड भी सुनाई दे जाती है,क्योकी यहां पर परिक्रमा मार्ग पर दर्शको व भक्तो के लिए एक छोटा चिडियाघर (mini zoo)बनाया हुआ है,जहां पर कई तरह के जंगली जानवर खुले बाडे(पिंजरे) में रहते है ओर पूरे परिक्रमा मार्ग पर मौजूद है,जिनको देखते देखते परिक्रमा भी पूरी हो जाती है,यहां पर जंगली भैसा,शेर,तेन्दुंआ,भालू,जंगली बिल्ली,कई तरह के हिरण व कई अन्य प्रकार के जीव आप देख सकते है,
हम झील के किनारे किनारे चलते रह थे,आसपास या आगे पिछे कोई नही था,नयी जगह थी इसलिए हम वही किनारे पर रूक गए थोडी देर बाद एक ग्रुप जिसमे कुछ जापानी व बाकी हिन्दुस्तानी लडके लडकीयां थे,हमने उनको देखा ओर आगे आगे चल दिए,रास्ते मे एक मन्दिर भी मिला,जहां पर एक स्वच्छ पानी की धार निकल रही थी,इसको देखकर हम आगे चल पडे,झील लगभग दो km लम्बी ओर 300 मीटर चौडी है,पर हर जगह अलग ही नजारा देखने को मिलता है,जहां शुरू मे मन्दिर,आश्रमो दिखते है तो आखिर में पेड पौधो से घिरे तट भी है,खजूर के पेड भी झील की शोभा को बढा रहे थे,यहां पर अर्थात रेणुका झील मे महाशीर मछलीयां बहुत पाई जाती है,पर्यटक व भक्त इन मछलीयो को आटे की गोली व चने खिलाते रहते है,हमने भी चने व आटे की गोलियां मछलीयो को खिलाई ओर हजारो मछलीयां वहा प्रकट हो गई,बडा ही मस्त नजारा था वो,
यहां से आगे चले ही थे की आश्रम वाले बुढे बाबा मिल गए ओर कहने लगे की कल आप वापिस नही आए तब मेने उनको बताया की रात हम ददाहु मे रूक गए थे,मेने उनको कुछ पैसे दिए आश्रम के लिए,ओर उनको प्रणाम कर आगे बढ चला,यहा पर बोटिंग भी कर सकते है,जब हम आए थे जब बोटिंग चालू नही थी पर अब बोटिंग चालू हो चुकी थी,
तभी हमे भारत का राष्ट्रगान के स्वर सुनाई दिए ओर हम उसके सम्मान मे शांत खडे हो गए,राष्टगान के बाद हम गाडी के पास पहुचें,
पार्किंग के पास ही एक दुकान पर चाय पी गई ओर नाश्ते के तौर पर मैगी खाई,
यही पर एक परिवार मिला जो अभी अभी रेणुका जी पहुचां था,उन्होने बताया की वे लोग हरीपूर धार नामक जगह से आ रहे है जहा पर मां भाग्यानी देवी का मन्दिर है ओर अच्छी खासी बर्फ भी है,इस जगह के बारे में मुझे पहले से ही पता था, हरीपुरधार से ही चूरीधार नामक जगह है जहां पर लोग ट्रैकिंग करते है ओर मेरे एक मित्र नीरज जाट वहा पर जा चुके है,
लेकिन हमारा कोई इरादा नही था वहा पर जाने का लेकिन भविष्य में एक बार वहा अवश्य जाऊगां,
मैगी खाने के बाद हम गाडी मे सवार हो गए ओर निकल पडे अगली मन्जिल पाँवटा साहिब गुरूद्वारा की तरफ.....
अब कुछ फोटो देखे जाए.....
गिरी नदी(ददाहु)
रेणुका मन्दिर
बंदर देवांग के कुरकुरे खाता हुआ
रेणुका मन्दिर परिसर
तपे का टिला
भगवान परशुराम मन्दिर
रेणुका मन्दिर
हिमाचल सरकार का गेस्ट हाऊस
रेणुका झील व आश्रम 
झील की परिक्रमा मार्ग
मां का दूध मन्दिर
जंगली बिल्ली
रीछ(भालू)
शेर
हिरण
काला हिरण
देवांग हिरण के पास फोटो खिचवां ता हुआ
जंगली भैंसा(मिथुन)
कैसा लगा 
आसमान को छुता पेड
यह फोटो देवांग ने खिचां था
बोटिंग 
तेन्दुआ
मछलियां
झील का एक किनारा

शनिवार, 4 अप्रैल 2015

रेणुका झील(Renuka ji lake)

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25jan2015

हम शाम के 5:30 पर रेणुका जी पहुचं गए,सबसे पहले हमने रहने के लिए कमरा ढुंढना उचित समझा,रेणुका जी में ही हिमाचल प्रदेश सरकार का एक होटल बना है जो बिल्कुल झील के सामने ही बना है,हमने गाडी वही बनी पार्किग में खडी की ओर हिमाचल पर्यटन विकास के इस होटल में पहुचं गए,कमरे के लिए पुछा तो पता चला की सब के सब कमरे पहले से ही भरे हुए है,यहां से हम मुंह लटकाकर बाहर आ गए,
झील के पास ही हमे कुछ रोशनी सी होती नजर आई,घन्टो की ध्वणि बडी मधुर लग रही थी,पूरा माहौल बडा रमणिक हो रहा था,हमने आगे चल कर देखा तो यहां पर कुछ आश्रम व मन्दिर बने है,हम एक आश्रम में पहुचें जहां पर एक बुढे बाबा बैठे थे,हमने इनसे पुछा की क्या रहने को कमरा मिल सकता है,तब वह बाबा बोले की शराब,अंडा,मीट तो नही खाते हो,..
मैने जबाव दिया की..नही जी बिल्कुल भी नही
इस पर उन्होने हमे कमरा दिखा दिया,पूरे आश्रम में हम ही थे ओर कोई नही था,कमरा देखा ठीक ठाक था पर शौचालय बहुत दूर था ओर आश्रम में हम ही थे,इसलिए मेने परिवार की सुरक्षा के खातिर वहां नही रहने का विचार कर लिया,
बाहर अब बिल्कुल अंधेरा फैल चुका था,मेरा बेटा देवांग को भूख लग रही थी,क्योकी हमने करनाल मे ही खाना खाया था,बुढे बाबा से यह कहकर बाहर आ गए की हम खाना खाने जा रहे है,अगर हम एक घन्टे में लौटकर नही आए तो समझ लेना की हम कही ओर ठहर गए है, रेणुका जी मे ओर कोई रहने का इन्तजाम नही है,इसलिए रेणुका जी से दो कि०मी० पहले एक कस्बा है ददाहु,जहां हमने पहुचं कर एक होटल जो गिरी नदी के किनारे बना हुआ था.नाम था होटल गिरी व्यु मे पहुचें ओर रहने के लिए एक कमरा ले लिया,कमरा अच्छा था ओर होटल में बहुत से पर्यटक भी ठहरे हुए थे,काफी मोलभाव करने के बाद 700 रू० मे कमरा मिल गया,कमरे में समान रख कर हम खाना खाने के लिए एक छोटे से ढाबे पर पहुचें,वहा पुछा की खाने मे क्या मिल सकता है,ढाबे वाले ने बताया की दाल ओर आलू- गोभी की सब्जी ही मिल पाएगी पर मेरा बेटा देवांग पनीर मांगने लगा,इसलिए ढाबे वाले ने बराबर वाली दुकान से पनीर मंगा कर पनीर बना दिया,खाना खाकर हमने पुछा की भाई कितने हुए तो वह बोला की जितने देने हो दे दो,मेने कहां की नही भाई आप बताओ तो उसने हिसाब लगाकर 190 रू बताए,मेने उसको 200 रू दिए ओर सीधे होटल मे आ गए......
अब कुछ रेणुका जी के बारे मे..
रेणुका जी हिमाचल प्रदेश के जिला सिरमौर की शिवालिक पहाडियों पर बसा एक छोटा सा व एक सुन्दर जगह है,यह गिरी नदी के पास बसा हैओर गिरी नदी की दूसरी तरफ ददाहु नाम का कस्बा भी है जहा पर होटल,दुकाने आदि है,रेणुका जी में एक झील है,जो बडी पवित्र मानी जाती है,यह जगह भगवान परशुराम की जन्मस्थली भी है, ओर रेणुका जी परशुराम जी की माता का नाम था,पर इस झील का नाम रेणुका झील क्यो पडा इसके पिछे एक कहानी छुपी है.......
कभी पहले यह घनघोर जंगल हुआ करता था,यहा पर ऋषि जमदग्नि ओर उनकी पत्नी भगवती रेणुका जी का आश्रम था,उनके पुत्र राम (जो बाद मे शिव जी के फरसे के कारण परशुराम कहलाए)रहते थे,बालक राम अपनी तपस्या के लिए कही गए हुए थे,उसी दौरान जंगल में शिकार खेलने के लिए राजा सह्त्रबाहु आया,बह भूखा प्यासा था इसलिए वह जमदग्नि के आश्रम में पहुचां तब रेणुका जी ने उन्हे बहुत स्वादिष्ट कई तरह के व्यंजन दिए खाने के लिए,राजा भोजन के बाद बहुत खुश हुआ उन्होने रेणुका जी से पुछा की आप इस जंगल में इतने स्वादिष्ट भोजन कहां से लेकर आई ,तब रेणुका जी ने उन्हे कामधेनु गाय के विषय में बताया की जिस चीज की आप इक्छा करेगे यह कामधेनु गाय उन सभी इक्छाओ को पूरा करती है,तब राजा सहत्रबाहु ने अपने बल के जोर पर वह गाय अपने अधिकार में ले ली ओर ऋषि जमदग्नि की हत्या कर दी,ओर बल पूर्वक माता रेणुका को भी ले जाने लगा तब रेणुका जी ने अपनी लाज बचाने के लिए,राम सरोवर नामक सरोवर मे जल समाधि ले ली,
जब भगवान परशुराम बडे हुए ओर शिव से शस्त्र शिक्षा ली तो वह अपने घर पहुचें जब उन्हे राजा सहस्त्रबाहु के इस अपराध के बारे में पता चला तब उन्होनो राजा सहस्त्रबाहु व उसकी सम्पूर्ण सेना का विनाश अपने फरसे से कर दिया तब से ही वह राम से भगवान परशुराम कहलाए,
उन्होने अपने तपोबल से अपने पिता ऋषि जमदग्नि को जिन्दा कर दिया ओर अपनी मां को भी रामसरोवर से बाहर आने पर मजबूर कर दिया पर भगवती रेणुका जी ने परशुराम जी को वचन दिया की वह हर वर्ष  देव प्रवोधिनी एकादशी को इस सरोवर से बाहर आया करेगी ओर सभी को दर्शन दिया करेगी ओर उनको आशिर्वाद देगी,इतना कहकर मां भगवती रेणुका जी रामसरोवर के जल मे विलिन हो गई,तब से यह सरोवर रेणुका झील कहलाने लगा,
इसलिए आज यहां पर कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मेला लगने लगा,जहां पर भक्तगण मां रेणुका जी के दर्शन करने के लिए आते है....
अब कुछ चित्र भी देखे.....
यह झील दो भागो में बटी है,यह पहला भाग
भगवान परशुराम का मन्दिर
रेणुका झील का दूसरा भाग साथ में मन्दिर व आश
आश्रमकुछ भक्त रेणुका झील की पूजा करते हुए
रेणुका जी की प्रतिमा
भगवान विष्णु जी मन्दिर
भगवान परशुराम
परशुराम मन्दिर यहां कभी आश्रम होता होगा
मां रेणुका जी का मुख्य मन्दिर व प्रतिमा
ढाबे वाले का खाना
देवांग झील के नजदीक 

शुक्रवार, 20 मार्च 2015

रेणुका झील यात्रा वाया कुरूक्षेत्र

रेणुका जी जाने के कई अवसर बने पर मै नही जा पाया,
पहला अवसर:-रेणुका जी झील के बारे में पता चला,फेसबुक के एक दोस्त अजय भारतीय से,एक दिन इन जनाब का फोन आया,शायद दिपावली से अगले दिन,की सचिन भाई हिमाचल चल रहे हो,मेने कहा की एक दिन के लिए घुम सकता हुं,हिमाचल जाने का समय नही निकाल पाऊगा,तब अजय भाई ने बताया की सुबह 4 बजे चलेगे ओर रात तक वापिस भी आ जाऐगे,वो भी बाईक से अर्थारत लगभग एक दिन में ही 600 किलोमीटर बाईक चलानी पडेगी या पिछे बैठना पडेगा,चलने का तो बहुत मन था लेकिन घर पर कई कामो की वजह से नही जा पाया,वैसे अजय भाई ने एक दिन में ही यह यात्रा सम्पन कर डाली,
दूसरा अवसर:- नव वर्ष 2015 की दोपहर में सन्दीप उर्फ जाट देवता जी का फोन आया,(सन्दीप जी का अपना एक हिन्दी ब्लॉग है,ओर घुम्मक्कडी के बहुत शौकिन है)सन्दीप भाई ने बताया की मै मन्डौली (मेरा घर) आ रहा हुं ओर साथ मे मनु प्रकाश त्यागी(यह भी एक ब्लॉगर है,ओर लगभग पूरा भारत घुमे हुए है)जी भी आ रहे है,मै अपने काम पर गाजियाबाद गया हुआ था पर मै लगभग 3:30पर घर पहुचं गया,सन्दीप जी को फोन मिलाया तो उन्होने बतलाया की आप मेरे घर आ जाओ,ओर मै15 मिनटो मे सन्दीप भाई के घर पहुचं गया,वहा पर मनु जी भी आ चुके थे,गर्मागरम दूध मिला पिने के लिए,वो तो मिलता ही क्योकी हमारे जाट देवता जी चाय पिते ही नही,
हां तो हम मनु,सन्दीप व मुझमे घुम्मक्कडी ही बाते होती रही,आगे कहां कहां जाने का कार्यक्रम आदी,हमने मिलकर 4 जनवरी को रेणुका जी जाने का कार्यक्रम बना लिया,पर वहां वह उस समय बहुत बारिश हो रही थी,इसलिए हम वहां जा ना सके....
रेणुका जी के लिए प्रस्थान:- 26 जनवरी के पास तीन चार छुट्टी पड रही थी,इसलिए स्कूल बंद थे, तब मेने सोचा की चलो परिवार के साथ ही रेणुका चला जाए,तो कार्यक्रम यह बना की हम 25 जनवरी की सुबह 5 बजे अपनी कार से
निकलेगे ओर कुरूक्षेत्र देखकर शाम तक रेणुका जी पहुचं जाएगेलेकिन 25 की सुबह जल्दी नही निकल पाए ओर सुबह 9 बजे के आसपास जाकर हम घर से निकले,दिल्ली मुकबरा चौक से होते हुए,सोनीपत व पानीपत पार करते हुए 11:30 बजे करनाल के पास रूके,यहां पर एक ढाबे पर खाना खाया ओर लगभग दोपहर के 12:30 बजे कुरूक्षेत्र पहुचें,
कुरूक्षेत्र का इतिहास बहुत पुराना है,यह वही भूमि है जहां पर पांडवो ओर कौंरवो के बीच वह ऐतिहासिक युद्ध लडा गया जिसे लोग आज महाभारत के नाम से जानते है,
यही वो भूमि है जहा भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता के उपदेश सुनाए.
कुरूक्षेत्र में कई जगह है जो दर्शनिय है जैसे- ब्रह्मसरोवर(जहां पर दुर्योधन छिप गया था),
सननिहित सरोवर(जहां पर लोग अपने पूर्वजो की आत्मा की शान्ति के लिए पिन्ड दान करते है)
ज्योतिसार-(जहां पर भगवान श्री कृष्ण ने गीता के उपदेश दिए थे)
कुरूक्षेत्र में ओर भी कई जगह है देखने के लिए,यहा पर मन्दिर व बहुत से आश्रम भी है,जहां आप जा सकते है
हम पहले से ही काफी लेट थे अपने तयशुदा कार्यक्रम पर,इसलिए हम सीधे ब्रहमसरोवर(ब्रहमकुण्ड) पहुचें,यह एक लम्बा चौडा सरोवर है,ओर यहा पर कई घाट बने है,कहते है की इस सरोवर मे ही ध्रतराष्ट पुत्र दुर्योधन जल मे छिप गया था ओर सरोवर के पास ही भीम से लडते हुए अपने प्राण त्यागे थे,
इस सरोवर पर जब सूर्य ग्रहण होता है तब यहा पर बहुत लोग आकर स्नान करते है है,इस सरोवर मे बहुत सारी महाशीर मछलीयाँ है,जिन्हे लोग आटे की गोलिया खिलाते रहते है,
यहां से हम सरोवर के नजदीक ही श्री कृष्णा संग्रहालय है वहा पर पहुचें,यहां पर तीस रूपये का टिकेट लगता है,जहां पर महाभारत कालीन बहुत सी वस्तुएं आप देख सकते है,पर यहां पर फोटो खिचना मना,यहा पर पहले ही काऊंटर पर कैमरा व फोन जमा करा लेते है,
यहां पर एक नकली वृक्ष बना है,जिसके नीचे एक टच वाला कम्पयुटर लगा है,जहां यक्ष आपसे सवाल पुछता है ओर आप जबाव देते है,जिस प्रकार युदिष्ठर ने दिए थे,एक बडे से हॉल मे भगवान श्री कृष्ण गीता का उपदेश दे रहे थे,बीच रास्ते मे द्रोणाचार्य द्वारा चक्रव्यू भी मिलता जिसे आपको पार करना पडता है,भीष्म पितामाह की एक झांकी जहां वो बाण की शय्या पर पडे है,एक तरफ कर्ण की झांकी भी है,ओर बालक अभिमन्यु की झांकी भी है
यहां पर बहुत कुछ है देखने के लिए,कभी इधर से निकले तो अवश्य यहां आए.दिल्ली से कुरूक्षेत्र की दूरी लगभग 165 किलोमीटर ही है,
टाईम देखा तो दोपहर के 2 बज रहे थे,इसलिए कुरूक्षेत्र को अलविदा कह कर हम रेणुका जी की तरफ निकल पडे,कुरूक्षेत्र से रेणुका जी की दूरी लगभग 124 किलोमिटर है,कुरूक्षेत्र से लगभग 2 km चलने पर शाहबाद नामक जगह आती है जहां से हम दाया मुड गए,फिर कालाअम्ब होते हुए नाहन पहुचें, रास्ता सिंगल लेन ही है पर ज्यादा ट्रैफिक नही था ओर रोड भी बढिया बना हुआ था,नाहन जो हिमाचल के सिरमौर जिले का मुख्यालय है,यही पर जिले के सभी प्रशासनिक कार्य होते है,सिरमौर पहले एक स्वतन्त्र रिहाशत थी पर नेपाल से आए गौरखो ने यहां पर अधिकार कर लिया पर बाद में अंग्रेजो से सन्धि कर के यह जगह उन्होने छोड दी,ओर बाद मे इसका विलय हिन्दुस्तान मे हो गया,
पर्यटन की नजर से यहा पर भी काफी कुछ देखने के लिए पर हम यहां पर भी नही रूके क्योकी रेणुका जी पर मै पहली बार ही जा रहा था,रास्ते से लेकर रहने तक का कोई आईडिया नही था,नई जगह थी इसलिए बीच में कही नही रूका,लेकिन रास्ते में एक जगह इतनी सुन्दरथी की मुझे यहां पर रूकना ही पडा,या यह कहे की इस जगह ने रूकने के लिए बेबस कर दिया,जगह तो पता नही पर रेणुका जी से लगभग 10km पहले एक जगह पर एक मन्दिर देखा जो झरने के बीचो बीच बना हुआ था,दोनो तरफ पानी बह रहा था,अभी बारिश नही हो रही थी पर बरसात के मौसम में यह कैसा प्रतित होता होगा सोचकर भी डर लगता है, इसकी सुन्दरता को कैमरे में कैद करने के बाद,यहा से चल पडा,रास्ते छोटे है,घुमावदार भी है,जैसा आम पहाडी रास्ता होता है,सडक के दाहिने तरफ खाई मे एक नदी साथ साथ चल रही थी,मेरे बेटे देवांग(5वर्ष) ने चिप्स की डिमांड रखी,पर हमे कोई दुकान नही दिखाई दी,रास्ता लगभग सुनसान ही था कभी कभी कोई गाडी आती दिख जाती थी,
समय शाम के 5बज रहे थे,तभी एक दुकान दिखाई दी ओर मेने गाडी वही उस दुकान पर लगा दी. दुकान को एक अम्मा चला रही थी,उनसे चाय,चिप्स लिए,ओर बातचीत भी की उन्होने ही बताया की यहां से रेणुका जी मात्र 5 km की दूरी पर ही है,ओर यह नदी जो सडक के किनारे चल रही है इसका नाम गिरी नदी है,हमने उनको चाय,चिप्स के पैसे दिए ओर चल पडे रेणुका जी की तरफ,दुकान वाली अम्मा ने हमसे कहां की बेटा अगर रहने की कोई समस्या हो तो यहीं आ जाना,हमने कहां की ठीक है अम्मा जी अगर कोई परेशानी हुई तो हम यही पर आ जाऐगे.
यहां से हम लगभग शाम के 5:30 बजे चले ओर  हम रेणुका जी 5:50 पर पहुचं गए........
अब कुछ इस यात्रा के फोटो देखे जाए.....
भीम घाट(ब्रह्मसरोवर)
ब्रह्मसरोवर
देवांग मछलीयों को आटे की गोलियां खिलाता हुआश्री कृष्ण संग्रहालय
कुरूक्षेत्र पैरानोमा
दुकान वाली अम्मा जिन्होने हमे चाय बना कर दी
गिरी नदी पिछे बहती हुई
रेणुका जी के रास्ते मे यह अद्भुत जगह देखने को मिली
शानदार जगह है.....

बुधवार, 11 फ़रवरी 2015

सलीमगढ़ किला व स्वतंत्रता संग्राम संग्रहालय

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मै ओर आयुष दोनो काफी हद तक लाल किला घुम चुके थे,फिर भी यहा पर मौजूद हर चीज को देखना चाहते थे ...
संग्रहालय-हम दोनो दिवान-ऐ- आम के ठीक सामने की एक पुरानी ईमारत मे स्थित एक संग्रहालय में पहुचें,यहा पर पुराने काल की कुछ झांकियां थी,पुराने हथियार व पोशाके थी,जब अंग्रेज हमारे देश में राज करने आए वो उस समय नई तकनीकी के हथियार लाए,जिसके बल पर उन्होने यहां राज किया वो हथियार भी यहां पर आप देख सकते है,एक बात आपको बता देता हुं,जब आप लाल किले में प्रवेश होने का टिकेट ले,जबही आप संग्रहालयो का भी टिकेट ले ले नही तो आप इन्हे नही देख पाएगे,ओर हां एक टिकेट से ही आप यहां मौजूद तीनो संग्रहालय घुम सकते है.
संग्रहालय से निकल कर हम छत्ता चौक पर पहुचें,वहा से हम सीधे हाथ की तरफ जाती सडक़ पर मुड गए,अगर आप लाल किले में प्रवेश कर रहे हे तो छत्ता चौक के बाएं यह सडक़ आपको मिलेगी,हम इस सडक पर मुड गए,यहा पर पर्यटको की भीड कुछ कम थी,शायद लोगो को इस तरफ कम पता हो,पर हमे क्या हमे तो इधर भी घुमना था,यह एक पुरानी बिर्टिश कालोनी है,इंही इमारत मे मौजूद है एक संग्रहालय जिसका नाम "स्वतंत्रता संग्राम स्मारक"है,
यहां पर हमने बहुत कुछ देखा जैसे अंग्रेजो का यहा पर कैसे आना हुआ ओर उन्होने यहां पर कैसे शासन स्थापित किया,सन् 1857 की क्रांति से जूडी इतिहास की जानकारी व फोटो आपको यहां देखने को मिलेगे,यदि आप सुभाष चंद्र बोस से जूडी चीजे देखना चाहते है तो यहा पर आपको बहुत सारी बाते व चीजे देखने को मिलेगी जैसे-उनकी व उस समय के नामी लोगो के साथ फोटो,उनकी कुर्सी व टोपी,पोशाके,हस्तलिखित पत्र व अन्य बहुत सी वस्तुएं,यह देखकर व पढकर,आपको अच्छा महसूस होगा,रानी लक्ष्मी बाई की झांकि व अन्य कवि जिन्होने आजादी दिलाने मे महत्वपूर्ण काम किये,चंद्रशेखर आजाद का वह चित्र जहां पर व शहीद हुए,आपको उस काल में क्या हुआ होगा सोचने को मजबुर कर देगा,शहीद भगत सिंह अन्य शहीदो के चित्र व उनकी निशानियां आप यहा देख सकते है,
यह सब देखकर हम दोनो उसी सडक पर सीधे चलते रहे,इस सडक के आखिर मे पानी की एक बावली है,(पुराने जमाने मे पानी का स्रौत जो बहुत बडी चौडी जगह होती थी),लेकिन हम उसी सडक से दाएं तरफ मुड गए,यह सडक जाती थी सलीमगढ़ के किले के लिए,हम चले ही थे की वहां मौजूद गार्ड ने हमे रोक लिया ओर बोला की इधर कहा जा रहे हो,हमने कहां की हम सलीमगढ़ का किला देखने के लिए जा रहे है,उसने कहां की वहां कुछ नही है,कुछ टुटे फुटे खंडर ही बचे है,उन्हे क्या देखोगे,मेने कहां की उन्हे ही तो देखना है,यह कह कर हम वहां से चल दिए,अब कुछ सलीमगढ़ के बारे मे..
सलीमगढ़ दुर्ग(किला)- सलीमगढ़ किले का निर्माण शेरशाहं सूरी के पुत्र इस्लामशाहं सूरी ने 1545-54ई० मे कराया,इस्लामशाहं को सलीमशाहं के नाम से भी जाना जाता था इसलिए इस किले के नाम सलीमगढ़ पडा,बाद मे अकबर ने इसे अपने अधिकार में ले लिया,ओर अपने बफादारो को सौप दिया,बाद मे शाहजहां ने लाल किला निर्माण के समय जहांगीर द्वारा निर्मित पुल का उपयोग सलीमगढ़ किले को लाल किले से जोडने में किया,(यह पुल आज भी मौजूद है,लाल किले के पीछे वाली सडक पर).
बाद में औरंगजेब ने इस किले का प्रयोग अपने काल मे शाही कारागार के रूप मे किया.सन् 1857 की क्रांति के बाद,अंग्रेजो ने लाल किले मे सेना की छावनी बनाई ओर सलीमगढ़ किले को ढहा कर रेलवे लाईन बिछाई,ओर किले की अन्य इमारतो को ढहा कर एक कारागार का निर्माण भी किया,जिसमे आजाद हिन्द फौज के सिपाहियो को कैद किया गया....
हम दोनो एक सुनसान सडक. पर चल रहे थे,हमारे अलावा ओर कोई वहां मौजुद नही था,हम जहांगीर द्वारा निर्मित पुल को पार करते हुए,सलीमगढ़ दुर्ग के गेट पर पहुचें,यहां से हमे रेलवे लाईन पर बना एक लोहे का पुल पार करना पडा,पुल उतरते ही हम सलीमगढ़ किला परीसर मे थे,यहा पर हमने केवल एक कारागार(jail) देखी ओर एक टुटी फुटी खंडर नुमा मस्जिद,इन सब चीजो को देखकर हम वापिस आ गए..
अब हम पहुचें बावली मे,मुझे पहले यह नही पता था की लाल किले मे भी बावली है,अब पता चल ही गया है तो क्यो ना इसे भी देख लिया जाए,हम कुछ ही मिनटो मे बावली पर पहुचं गए,वहां पर गार्ड मौजुद था,उसने हमे हिदायत दी की बावली मे ज्यादा नीचे की तरफ ना जाए,हमने वहा पर कुछ फोटो खिचे व कुछ देर आराम भी किया.अब बावलीयों के बारे मे...

बावली(Baoli)- बावलियां पुराने समय मे बनाई जाती थी,यह जमीन से तकरीबन तीन चार मंजिल नीचे बनी होती थी,गर्मीयो मे यहा बने कमरो मे आराम भी किया जाता था,पानी की कमी को तो यह पूरा करती ही थी,यह बावलीयां बहुत लम्बी चौडी व पत्थरो से बनी होती थी,
यह सब देखकर हम दोनो लाल किले से बाहर आकर कुछ पेट पूजा कर अपने घर की लौट चले..
अब कुछ फोटो देखे जाए...
दिवान-ऐ-आम के नजदीक संग्रहालयपानीपत के प्रथम युद्ध की झांकी
प्राचीन भारत की तलवारे
हाथ में पहने जाने वाला विशेष अस्त्र
मुगल सैनिक की युद्ध में पहने जाने वाली पोशाक

अंग्रैजो द्वारा लायी गई बन्दुके
बहादुरशाहं जफर व उनकी बेगम के प्राचिन फोटो
जलियां वाला बाग की झांकी
वे शहीद जिन्हे अब तक भी शहीदो का सम्मान नही मिला
चंद्रशेखर आजाद का फोटो
सलीमगढ़ किला व जंहागीर का पुल (इसके नीचे बनी सडक से कई बार निकले होगे आप)
अंग्रैजो की बनाई कारागार
बावली