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शनिवार, 26 मार्च 2016

Nag tibba trek (pantwari to nag devta temple)नाग टिब्बा-2

25,Jan,2016, monday

मेरी आंखे सुबहे जल्द ही खुल गई, प्यास लग रही थी इसलिए बाहर होटल वाले से कह कर ओर पानी मंगा लिया, कुछ ही देर बाद सचिन जांगडा व पंकज जी भी ऊठ गए, होटल वाले ने नहाने के लिए गर्म पानी कर दिया था, लेकिन नहाने का मन ना हुआ फिर भी जल्दी जल्दी नहा लिया। क्योकी अगले दो दिन नाहने को नहीं मिलेगा , बारी बारी से पंकज और जांगड़ा भी  फ्रैश हो गए. हम तीनो नीरज के रूम पर पहुचें तो देखा जनाब अभी तक सो रहे थे, हम यह कह कर वहां से आ गए की हम तीनो रात वाले ढाबे (परमार स्वीट्स ) पर नाश्ता करने जा रहे है। नीचे होटल (ढाबे) पर आकर चाय ओर पंराठे बोल दिए, यही से पता चला की नरेश सहगल व उनके साथी ट्रैक पर सुबह ही निकल गए है, चाय नाश्ता करने के बाद हमने होटल वाले से बीस पंराठे पैक कराने को कह दिया क्योकी ऊपर पूरे ट्रैक पर कोई दुकान नही है, जो समान ले जाना होता है, वह नीचे से ही ले जाना होता है। नाश्ता करने के बाद हम तीनो ऊपर होटल की तरफ चल पडे।
जब हम होटल पहुचें तो देखा की नीरज होटल वाले (सुमन सिंह 08449238730 ) से बातचीत कर रहे है, नीरज ने मुझसे पुछा की ऊपर के लिए खच्चर कर लेते है, क्योकी समान ज्यादा है, इसके लिए मैने तुरंत हां कर दी, क्योकी हमारे बैग को छोडकर भी ट्रैकिंग का बहुत समान था, बातों बातों में पता चला की होटल वाला भी ऊपर खच्चर लेकर जाता है, उससे बातचीत की तो उससे तय हुआ की वह प्रति दिन के सात सौ रूपये लेगा। दो दिन के हिसाब से 1400 हुए और एक दिन के तीन कमरो का हुआ 1300 रूपए। कुल मिला कर 2700 रुपए उसके बने। हम उसको देने लगे तोह उसने कहा की ट्रैक से वापसी पर ले लेगा। इतना कह कर वह खच्चर लेने चला गया, हम सब ने अपनी जरूरत का सारा समान अपने अपने बैगो मे रख लिया और बाकी सारा समान कार की डिग्गी में डाल दिया, ओर ट्रैकिंग का सारा समान जैसे स्लिपिंग बैग, टैंट आदि सब खच्चर पर बंधवा दिया, खच्चर वाला यह कहकर चला गया की वह हमको ऊपर सडक पर मिलेगा, जहा से ट्रैक्किंग चालू होती है, वह ऊपर चला गया ओर हम नीचे ढाबे पर आ गए। जब तक सहयात्रियों  ने नाश्ता किया तब तब मैने ओर नरेंद्र ने सारा राशन पैक करा लिया, चाय की पत्ती से लेकर चीनी तक। साथ में ढ़ाबे वाले से एक पतीली ओर ले ली, कुछ टॉफी भी ले ली गयी और आपस में बाट भी ली, एक बात यह भी है की पुरे ट्रैक पर जांगड़ा और नरेंदर की वाइफ की कॉमेडी चलती रही जिसका सभी ने पूरा लुफ्त उठाया। अब हम गाडी व बाईक लेकर ऊपर सडक की तरफ चल पडे, पूरा रोड लगभग कच्चा ही बना है, तकरीबन आधा घंटे के बाद हम ऊपर पहुचें, यहां पर नीरज ने ऊंचाई नापी तो लगभग 1600मीटर दर्शा रही थी, जबकी पंतवाडी की ऊंचाई समुद्र की सतह से 1300मीटर थी, यहां से हमे लगभग 8.5km की पैदल चढाई करनी थी, ओर 3000 मीटर तक पहुचना था। यानी की हमे 8.5km  की दूरी मे 1400मीटर ओर ऊपर जाना था। वैसे आज हमे केवल नाग देवता तक ही जाना था।

गाडी व बाईक रोड पर एक तरफ लगा कर व अपना अपना बैग पीठ टांग कर हम लोग दोपहर के लगभग 11बजे ऊपर की तरफ चल पडे। यहां से गोट विलेज नामक रीजोर्ट की दूरी 2km है, हम सडक से ऊपर जाती से पगडंडी पर हो लिए, गोट विलेज का काम तेज चल रहा था, नीचे से बहुत सा समान गधो ओर खच्चरो पर आ रहा था, जिसके कारण इस रास्ते पर बहुत धुल उड रही थी, फिर हमारे कदमो से से भी धुल उड रही थी, इसलिए मै सबसे थोडी दूरी पर  व पिछे चल रहा था, शुरू मे रास्ता ज्यादा चढाई का है, कुछ चलने के बाद थोडा सा सांस लेने को रूक जाते, पर चलते रहते। थोड़ा ही चले थे की जांगड़ा भाई कहने लगे की ओर नहीं चला जाता में तोह वापिस जा रहा हुँ लेकिन हम लोगो की वजह से गया नहीं और धीरे धीरे चलता रहा, तकरीबन दो किलोमीटर चलने के बाद एक पाईप मे टंकी लगी देखी तो सबने वही पर अपने अपने बैग पटक कर थोडी सांसो को आराम दिया, यहां पर सबने पानी पिया ओर अपनी अपनी बोतलो में भी भर लिया, यही पर से ही खच्चर वाले ने दो कैनो मे पानी भर कर खच्चर पर टांग दिया। नीरज ने बताया की यहां से आगे इतना साफ पानी ओर कही नही मिलने वाला है। यहाँ पर कुछ घर भी बने थे लकिन इसके बाद जंगल चालू हो जाता है, फिर कोई घर रास्ते में नहीं मिलेगा।

पानी भरकर थोड़ा सा ही चले ही थे की भंयकर चढाई का सामना करना पडा, साथ मे रास्ते पर छोटे छोटे पत्थर बिखरे पडे थे, इन  पर फिसलने का डर भी था, थोडी दूर जाकर एक छोटा सा मैदान आया, जहां से रास्ता थोडा सामान्य हो गया, मतलब चढाई कम हो गई, आराम से चलते हुए हम एक छोटे से बुग्याल(घास का मैदान) पर पहुचे। सभी को चलते चलते जोरो से भूख लगने लगी थी, इसलिए यहां पर रूक कर हमने नीचे से लाए पंराठे आचार संग खाए। इस बुग्याल के बाद देवता मंदिर तक सारा रास्ता जंगल का ही है। नीरज ने बताया की यहीं पास में जगंल के अन्दर एक पानी का स्रोत है, जहां पर पीने का पानी है, परांठे खाने के बाद मै, नीरज ओर पंकज जी पानी की तलाश में चल पडे। थोडा चलने के बाद एक जगह एक छोटे से गढ्ढे मे पानी दिखा, ध्यान से देखा तो पानी हल्का हल्का बह रहा था, यह पानी रूका हुआ नही था इसका मतलब हम इसे पी सकते थे, यहां से एक बोतल पानी की भर कर हम ऊपर बुग्याल की तरफ चल पडे। बुग्याल पर जाकर तुरंत ही वहां से आगे चल पडे, अब हम ऊंचे ऊंचे पेडो के बीच बने रास्ते से गुजर रहे थे। रास्ते में दीमक लगे पेड टुटे बिखरे दिखाई दिए, जिस पर पंजो जैसे निशान भी थे, लग रहा था जैसे किसी जानवर ने इस पेड को अपने दांतो व पंजो से तोडा हो, दीमक खाने के लिए। यह देखकर हम आगे बढ चले।
कुछ दूर चले थे की हम लोगो को नरेश व उनके मित्र वापस आते हुए मिले, समय देखा तो तकरीबन शाम के चार बज रहे थे, नरेश ने बताया की वह सुबह चलकर नाग देवता वह वहा से चलकर नाग टिब्बा पहुचे। नाग टिब्बा पर थोडा समय बिताकर अब सीधे उतर रहे है, ओर अंधेरा होने से पहले ही पंतवाडी पहुचं जाएगे।
नरेश जी से मिलकर हम ऊपर की तरफ चल पडे, अचानक मुझे कुछ याद आया ओर मेनै उन्हे रूकने के लिए बोला, मुझे याद आया की हम राशन तो ले आए पर आग जलाने के लिए माचिस तो साथ लाए ही नही, शायद इनके पास मिल जाए, जब उनसे यह बताया की हमारे पास माचिस नही है तब उनके एक मित्र ने मुझे माचिस दे दी। नरेश जी को एक बार ओर शुक्रिया कर उनसे विदा ली, वैसे नरेंद्र ने बाद में बताया की रास्ते में एक मजदूर से माचिस ले ली थी।
जंगल वाला रास्ता बहुत सुंदर था, वैसे हमे कोई जानवर नही दिखाई दिया बस किसी पक्षी की आवाज सुनाई देती रहती , वैसे जंगल इतना शांत था की हमे केवल अपने पैरो तले कुचले जाने वाले सुखो पत्तियो की आवाज सुनाई दे रही थी। मै, पंकज व जागंडा भाई सबसे पिछे चल रहे थे, एक जगह हम तीनो थोडी देर सांसो को सामान्य बनाने के लिए रूके, मतलब आराम के लिए रूके, अपनी अपनी बोतलो से पानी पीया, यह जगह जंगल के बीचो बीच गहन शांति वाली थी, यहां पर इतनी शांति थी की हमे अपनी सांसो की आवाज भी बहुत तेज सुनाई दे रही थी। जब हम रूकते तो ठण्ड लगने लगती जब चलते रहते तो ठण्ड नहीं लगती बल्की गर्मी लगती।
यहां से थोडी देर बाद हम चल पडे, हमारे साथियो की आवाज सुनाई नही पड रही थी, मै भी पंकज व जांगडा से आगे हो गया, तकरीबन आधा घंटे बाद मुझे एक कमरा सा दिखलाई पडा, ओर उसके पास एक बडा सा मैदान जो चारो ओर से जंगल से घिरा था, कमरे के पास तीन टैंट लगे थे, जो शायद हम जैसे ट्रैकर ही थे, यह कमरा जंगल विभाग वालो का था, जिसमे दो कमरे बने है जो गंदे थे क्योकी इसमे खच्चर व खच्चरो के मालिक रात गुजारते है। इन कमरो से कुछ दूर हमारे साथी रूके हुए थे ओर सारा समान एक जगह रखा था, वहां पहुचते ही नीरज ने कहा की चलते चलते शरीर गर्म रहता है पसीने भी आते है इसलिए अंदर के कपडे चेंज कर लो नही तो ठंड लग सकती है। सबने इधर उधर जाकर अपने कपडे चेंज कर लिये ओर दिन छिपने से पहले उजाले में ही अपने अपने  टेंट लगा लिए, अब आग जलाने के लिए लकडी लेने जाना था बस, तभी एक पेड दिखलाई दिया जो दीमक के खाने की वजह से खोखला हो चुका था, काफी मसक्कत करने के बाद वह पेड हमने तोड दिया पर ज्यादा भारी होने के कारण हम उसे ऊपर ना ला सके ओर वही उसको तोडने लगे, थोडा सा ही तोड पाए ओर वह पेड रपट कर नीचे जंगल मे गिर गया, हम बहुत हताश हो गए, क्योकी उसके लिए हमने बहुत महनत की थी, में और नीरज नीचे जाकर जंगल से ओर  लकड़ी ले आए, ओर आसपास से भी  हमने बहुत सारी लकडी इक्कठी कर ली। आग जला दी गई, नरेंदर व दोनों महिलायो को चाय बनाने के लिए बोल कर हम तीनो(मै, नीरज व पंकज) एक पहाडी पर बैठ गए, वहां से सूर्यास्त का बेहतरीन नजारा देखने को मिला, हम आपस मे बात कर रहे थे की मुझे नागदेवता मन्दिर के पास पेडो के बीच कुछ हलचल सी दिखाई दी, नीरज ने कैमरे से जूम कर के देखा तो हिमालयन रेड फॉक्स (लोमडी) थी वो भी दो, कुछ देर बाद वह दोनों लोमडी जंगल में चली गयी फिर जंगल से बंदरो की आवाज आने लगी।
हम तीनो बाद मे मन्दिर के पास गए, यह मंदिर नाग देवता को समर्पित है जो यहाँ के देवता है, मंदिर के पास ही एक पानी का कुण्ड है जिसमे पानी था. मंदिर के पास एक नया मंदिर और बना है. कुछ टीन सैड भी गिरे है जिनमे से कुछ टूटे फूटे है। अब कुछ अंधेरा होने लगा था इसलिए हम वहां से ही लौट आए।

जब टैंट के पास आए तो अंधेरा पूरे क्षेत्र मे फैल चुका था, चाय बनाने के लिए रखी जा चुकी थी, साथ मे रात के लिए खिचडी बननी थी उसके लिए सभी अपने अपने हिसाब से काम कर रहे थे, कोई प्याज तो कोई टमाटर काट रहा था, साथ में हंसी मजाक का दौर भी चल रहा था, जंगल मे मंगल हो रहा था, ऊपर देखा तो आसमान में तारे पूरी चमक के साथ झिलमिला रहे थे, ओर लग रहा था जैसे वो आज धरती के कुछ ज्यादा ही नजदीक
आ गए हो। तभी एक पहाडी कुत्ता हमारे पास आ गया, वह बेहद शांत लग रहा था, हमने उसे बचा परांठा व बिस्कुट दिए। फिर तो वह रात तक हमारे साथ ही रहा।
तकरीबन दो घंटे में हमारी खिचडी बन कर तैयार हुए, खिचडी के बनने मे लगे समय को देखकर बीरबल की खिचडी वाली कहानी याद आ गई, एक बार फिर चाय बना डाली, खिचडी खाने मे स्वादिष्ठ बनी थी, मैने तो दो बार खिचडी खाने के लिए ली। खिचड़ी खाने के बाद भी हम लोग आग के पास बैठे रहे. चारो तरफ घुप अँधेरा छाया हुआ था, में सोच रहा था की हम इतनी दूर केवल इस सुनसान काली रात व इस सन्नाटे को महसुस करने के आये है। यह रात आज कितनी भी लम्बी क्यों ना लगे पर बाद में यही रात हमारे जेहन बस जाएगी। इस ट्रैक पर किताबों की पढ़ी बातें वास्तविक रूप से अनुभव की जैसे एक इंसान को अपनी मंज़िल तक पहुँचने के लिए हर कठनाई का सामना खुद करना होता है,लोग आपके साथ तोह रहगे लकिन राह पर खुद ही चलना होगा। यहाँ हम एक अंजान जगह है हर कोई काम कर रहा है सब मिलजूल कर काम कर रहे है यही संगठन है और जहां संगठन है वहां हर काम आसानी से हो जाता है।
काफी देर बाद हम  सभी अपने अपने टेंटो में जाने लगे। शायद रात के दस बज रहे थे, ठंड भी लग रही थी, नीरज ने अपने बैग से एक मौसम नापने का यंत्र निकाला तो वह माइंस मे टैमप्रेचर दिखा रहा था, रात को उसे बाहर पत्थर पर ही रख दिया, और फिर सब अपने अपने टैंट में आकर लेट गए, ओर अपने अपने स्लिपिंग बैग में घुस गए,  ठंड के कारण मेरे पैर सुन्न हो रहे थे फिर मैने अपने बैग से एक गरम चादर निकाल कर अपने पैरो पर लपेट ली, उसके बाद तो थोडी देर बाद मुझे पता ही नही चला की मै कब सो गया।

यात्रा अभी जारी है....
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कुछ फोटो देखे जाएं इस यात्रा के......

 पंतवारी गाँव का मन्दिर 

गेट के अंदर जहां हम रात रुके थे वह होटल दिख रहा हे। 


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परमार होटल के पास जांगड़ा व पंकज जी। 

में (सचिन त्यागी ) व सचिन जांगड़ा 

ट्रैक्किंग चालू 

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 थोड़ा सांस ले लू भाई 

गोट विलेज बन रहा है पीछे लेबर काम कर रही है। 

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पानी की टंकी आ गयी जितना पानी भरना है भर लो। 

छोटा सा बुग्याल आ गया जहा हमने परांठे खाए थे। 

बुग्याल सर्दी की वजह से सूखे है। 

जंगल का रास्ता चालू 


नरेश सहगल व उनके मित्र मिले। 

नीरज जाट आराम से खड़े हुए सांसो को सामान्य बनाते हुऐ। 
वन विभाग के कमरे दीखते हुए। 

टेंट लग चूके है। 

सूर्यास्त का बेहतरीन नजारा। 


नागदेवता का मंदिर 

पानी का कुण्ड(देवता  मंदिर )

नाग देवता मंदिर 

हमारा कैंप रात में 

चाय 

हंसी मज़ाक के वह पल। 


खिचड़ी बन गयी। 
गुड नाईट 

बुधवार, 23 मार्च 2016

Nag tibba trek (delhi to pantwari village)नाग टिब्बा-1

24 jan 2016 ,sunday

सबसे पहले यह बताना जरूरी है की यह नाग टिब्बा क्या है। टिब्बा का मतलब होता है, ऊँची चोटी या जगह। यह एक छोटा ट्रैक है, जो देहरादून के बेहद नजदीक है, नागटिब्बा तक एक पैदल रास्ता देवलसारी से जाता है ओर एक रास्ता पंतवाडी से। हम लोग पंतवाडी से जाने वाले थे, ओर पंतवाडी से नाग टिब्बा तक 10km का पैदल ट्रैक है। नाग टिब्बा समुंद्र तल से लगभग 3022 मीटर ऊंचाई पर स्थित है, यह गढ़वाल क्षेत्र के निचली हिमालय पर्वतमाला की सबसे ऊंची चोटी है, नागटिब्बा को वहा के स्थानीय लोग झंडी कहते है। नाग टिब्बा से तकरीबन दो किलोमीटर पहले नाग देवता का एक मन्दिर भी है।

हम लोगो के वट्सऐप पर दो  घुमक्कड ग्रुप बने है, एक पर नीरज जाट ने नाग टिब्बा पर जाने का कार्यक्रम बनाया तो दूसरे पर बीनू कुकरेती व मनु त्यागी जी ने हर की दून जाने। मेरा मन दोनो जगह जाने का था, पर समय की उपलब्धता को देखकर नाग टिब्बा जाना तय हुआ, क्योकी यह लगभग मेरी पहली ट्रैकिंग थी, इससे पहले मै केवल चकराता स्थित टाईगर फॉल तक ट्रैकिंग करते गया था वो भी लगभग आज से तकरीबन पंद्रह साल पहले, जब टाईगर फॉल तक रास्ता नही बना था, लेकिन वह बीती बात हो गई, इसलिए नाग टिब्बा को ही मै अपनी पहली ट्रैकिंग मानता हुं। 

कार्यक्रम यह बना की हम 24 Jan  को सुबह दिल्ली से चलेगे ओर पानीपत से सचिन जांगडा को लेते हुए, पौंटा साहिब होते हुए, पंतवाडी रूकेगे। जहां से अगले दिन नाग टिब्बा की ट्रैकिंग चालू करेगे। हम नाग टिब्बा जाने वाले तकरीबन 11 सदस्य हो गए थे, पांच हम दिल्ली से जाने वाले थे, जिसमे मै, नीरज व उनकी पत्नी व उनके दो जानने वाले थे, एक हमारे फेसबुक दोस्त सचिन कुमार जांगडा थे, जो हमे पानीपत से मिलने वाले थे, एक सदस्य लखनऊ से आ रहे थे इनका नाम है पंकज मिश्रा जी जो OBC बैंक मे चीफ मैनेजर के पद पर कार्यरत है, यह हमे हरबर्ट पूर से मिलने वाले थे, ओर चार सदस्य अम्बाला से अपनी गाडी से आ रहे थे, इनमे मेरे एक ब्लॉगर मित्र नरेश सहगल भी थे, यह हमे पौंटा साहिब गुरूद्वारा मिलने वाले थे।

मै 24 जनवरी की सुबह 6:15  पर कार सहित नीरज जाट के घर (शास्त्री पार्क) पहुचं गया, ओर जल्द ही हमने अपने बैग व ट्रैकिग का सारा समान गाडी की डिग्गी मे रख दिया, अभी भी हल्का हल्का अंधेरा था, लगभग सुबह के सात बजे हम दिल्ली से निकल पडे, रास्ते में घना कोहरा मिला पर आराम आराम से गाडी चलाते हुए दिल्ली सोनीपत बार्डर पर आ गए, यहां पर नीरज ने जांगडा को फोन मिलाया तो उसने बताया की वह पानीपत टोल टैक्स पर मिलेगा लेकिन साढे दस बजे के बाद मिलेगा। इतने में हमारे एक अन्य मित्र जो सोनीपत  में रहते है, संजय कोशिक जी उनका फोन नीरज के फोन पर आ गया, बोले की रास्ते में घर होकर जाना, बस फिर क्या था चल पडे संजय कोशिक जी के घर चाय पीने के लिए। मैन रोड से थोडा चलने पर ही संजय जी व उनका बेटा हमारा इंतजार करते हुए मिल गए, संजय जी व परिवार के सदस्यो से मुलाकात हुई, यहां पर आकर बहुत अच्छा लगा, संजय जी ने चाय के बाद हमे आगे के सफर के लिए मुंगफली दी, जो आगे हमारे सफर पर बहुत काम आई।

संजय जी से मिलकर हम वापिस पानीपत की तरफ चल पडे। समय लगभग दस बज रहे थे, टोल टैक्स पार कर कार साईड में लगा दी, देखा तो सचिन जांगडा ठंड मे आग तापता मिला, हमने कहां की तुम तो लेट आने वाले थे, फिर जल्दी कैसे आ गए, अपने हंसी मजाक के अंदाज में जांगडा ने नीरज की तरफ इशारा करते हुए कहां की यह बुरा मान जाता इसलिए समय पर आ गया। यहां से सचिन जागंडा मेरे साथ कार मे हो लिया ओर नीरज को सचिन की बाईक चलानी पडी, एक दो जगह रूक रूक कर हम यमुनानगर पहुचें।
 दोपहर के तकरीबन एक बज रहा था, नीरज ने हमे फव्वारा चौक पर रूकने के लिए बोला, जब हम वहां पहुचें तो नीरज के साथ दो ओर अन्य व्यक्ति थे। जिनमे से एक थे दर्शन लाल बवेजा जी जो एक साइंस टीचर है, बवेजा जी नीरज के फेसबुक दोस्त है, उन्होने पास ही रेस्ट्रोरेंट में दोपहर के खाने का इंतजार किया हुआ था, वैसे हम सबने आलू के पराठे ही खाए। खाने के दौरान दर्शन जी ने बताया की यमुनानगर से तकरीबन सत्रह किलोमीटर बाद कालासर जंगल आरंभ होता है, वही मैन रोड पर ही कालेश्वर धाम नाम से एक पुराना शिव मन्दिर पडता है, जहां पर रविवार के दिन हिमालय की जडू- बूटी से निर्मित एक शिव अमृत नामक दवा भी पिलाई जाती है, जिससे किसी भी प्रकार का कैंसर ठीक हो जाता है,  उन्होने बताया की यहां पर स्वंयमभू शिवलिंग है, जब उन्होने हमे इस बारे मे बताया ओर वह स्थान रास्ते मे भी पड रहा है तो हमने वहां पर जाने का कार्यक्रम तय कर दिया।
दर्शन जी से मिलकर हम कालासर की तरफ या कहे की अपनी मंजिल की तरफ चल पडे, सचिन जांगडा ने नरेश सहगल जी को फोन मिलाया तो वह पौंटा साहिब थे, इसलिए हमने उन्हे बता दिया की हम पौंटा साहिब नही आ पाएगे आप सीधा पंतवाडी रूको, वही पर मिलते है आपको। यमुनानगर से कालासर महादेव तक सडक़ सिंगल लेन की है पर बनी सही है, इसलिए थोडी ही देर बाद हम लोग कालेश्वर महादेव मन्दिर पहुचं गए। यहां पर मन्दिर दर्शन किए, वह शिव अमृत बांट रहे एक सन्यासी किस्म  के बाबा जी से भी मिले, उन्ही के पास एक डा० साहब भी बैठे थे, जो लोगो की नब्ज देखकर बीमारी बता रहे थे, फीस कुछ नही ले रहे थे, मन्दिर में भंडारा भी चलता रहता है। पता चला की शिव अमृत नामक दवा कोई भी पी सकता है, सबने थोडी थोडी पी, भंयकर कडवी दवा थी ये, एक शीशी मेने भी रू०160 प्रतिलीटर की दर से खरीद ली, क्योकी यह दवा अन्य आम बीमारीयो में भी लाभकारी है।
मन्दिर से चलकर हम कालेसर जंगल से निकले,यहां पर हमे बहुत बढिया सडक भी मिली गाडी की रफ्तार अपने आप बढ गई, जैसे गाडी खुद कह रही हो की मुझे उडने दो पर मैने गाडी को काबू किया। मै ज्यादातर तेज गाडी नही चलाता हुं। यहां पर रोड के दोनो तरफ बंदर बैठे थे। मैने देखा है की कुछ लोग बंदरो को खाने के लिए कुछ ना कुछ देते है, इस कारण यह बंदर जगंल से बाहर आकर सडक के पास ही रहना चालू कर देते है, कभी कभी रोड पर इनके कारण रोड पर दुर्घटना भी घट जाती है, आगे चलकर हमने सड़क पर कुछ बंदरो के शव भी देखे जो शायद किसी गाडी से टकराकर मारे गए होगें। इसलिए आपसे निवेदन है की आप भी सड़क छाप बंदरो को खाना ना फैके। 
जांगडा ने मन्दिर से अपनी बाईक नीरज से ले ली ओर जगंल के इन खूबसूरत रास्तो पर बाईक चलाने का मजा लेने लगा, हम उसके पिछे पिछे ही चल रहे थे, हमने हरियाणा से हिमाचल मे प्रवेश किया,शायद यहां पर तीस रूपयो की पर्ची कटी। पौंटा साहेब गुरूद्वारा के सामने से निकल कर हम सीधा हर्बटपूर जाकर ही रूके, यहां पर एक चौक पर पंकज मिश्रा हमारा इंतजार करते हुए मिले, उन्होने मुझसे मिलते ही कहां की आप सचिन त्यागी है ना। शायद  उन्होने मेरी एक दो पोस्ट पहले से ही पढी हुई थी, उनका समान कार मे रख दिया, यहां से जांगडा व नीरज के रिश्तेदार नरेंद्र जी बाईक पर बैठ गए ओर हम बाकी पांचो कार में, थोडा चलने पर ही पहाडी मार्ग् चालू हो जाता है, यह देहरादून यमुनोत्री मार्ग है, आगे चलकर इसी रोड पर यमुना ब्रिज पडता है, जहां से थोडा आगे एक रास्ता कैम्पटीफॉल मसूरी के लिए निकल जाता है। यही थोडी देर यमुना ब्रिज पर रूके, यमुना नदी के बेहद करीब जाने का मन था पर जा ना सके, यमुना नदी यहां पर छोटी सी व साफ लग रही थी नही तो दिल्ली मे तो यह काली दिखने लगती है। ब्रिज के पास ही एक चाय की दुकान थी जहां शाम की चाय पी गई, यहीं पर हमने नरेश जी को फोन किया तो पता चला की वह पंतवाडी पहुचं गए है, हमने भी रूकने के लिए तीन कमरे बुक करने के लिए उन्ही से कह दिया, क्योकी फिर हमे वहां जाकर रूम नही ढुंढने पडेगे। थोडी देर बाद यमुना के पुल से चल पडे, यह रास्ता ठीक बना है, कही कही सडक़ निर्माण कार्य भी चल रहा था, यह सडक़ सीधे यमुनोत्री चली जाती है, अब हल्का हल्का अंधेरा हो चुका था, मुख्य सडक पर एक जगह नैनबाग नामक एक छोटा सा बाजार आया, जहां से पंतवाडी के लिए दांहिने हाथ को रास्ता अलग हो जाता है, नैनबाग में भी रूकने को छोटे छोटे होटल बने थे, नैनबाग से पंतवाडी तकरीबन 15kmकी दूरी पर है, कुछ दूर तक सडक ठीक थी लेकिन फिर खराब ही मिली, ओर ट्रैफिक तो था ही नही दो तीन गांव भी पडे इस रास्ते पर, हम  लोग पूरे अंधेरा में ही पंतवाडी पहुचें।
नरेश जी व उनके तीन मित्रो से मुलाकात हुई, उन्होने हमारे लिए एक होटल मे तीन कमरे पहले से ही बुक किये हुए थे, हमारा होटल व उनका होटल के बीच दूरी भी बहुत थी, क्योकी पंतवाडी में ज्यादातर लोगो ने छोटे ही होटल बनाए हुए है, क्योकी यहां पर केवल ट्रैकर ही आते है वो भी हर मौसम में नही, वैसै यहां पर एक गोट विलेज नामक बडा रिजोर्ट बन रहा है।
हम लोग अपना अपना समान अपने रूम पर रख आए, मैने गाडी भी होटल के पास एक बनी  गांव की पार्किग में लगा दी, जहां पर गांव वालो ने जमीन पर पत्थर की औखली बना रखी थी जिसका वह दाल दलने व ओर बहुत सी वस्तुओ को पीसने में प्रयोग पर लाते होंगे। अगले दिन गाडी को  देखकर कुछ गांव  लोगो ने मुझ से कहा की आप यहां तक कार कैसे चढा लाए। क्योकी यह रास्ता एकदम ऊंचाई पर व बेहद पतला ओर ऊपर से कुछ मोड वाला था।
खैर छोडो ये बाते! हम सब अपना अपना समान रख कर एक होटल( होटल परमार) मे बैठ गए, जहां पर नरेश जी ने बताया की वह कल सुबह ही ट्रैक पर निकल पडेगे ओर रात होने से पहले वापिस आ जाएगे, हमने भी अपना कार्यक्रम बता दिया की दोपहर को चलेगे, शाम को नाग देवता मन्दिर के पास अपने टेंट लगा देगे ओर रात वही रूककर सुबह नागटिब्बा जाएगे, ओर फिर घर वापिसी की राह पकडेगे। सबने एक साथ खाना खाया ओर सुबह के लिए क्या क्या पैक करना है यह सब बता कर सोने के लिए अपने अपने कमरो में आ गए।

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अब इस यात्रा के कुछ फोटो देखे जाए ...



युमनानगर से कालासर तक ऐसा रोड था। 
कालेश्वर महादेव मंदिर। 








मंदिर के अंदर का दर्शय 
यही मिलता है शिव अमृत। 
  

कालेश्वर महादेव शिवलिंग। 


माँ पार्वती 

हिमाचल में प्रवेश 

लो जी उत्तराखंड भी आ लिए हम। 

युमना ब्रिज 

सचिन त्यागी 

शाम की चाय (पंकज मिश्रा,  नीरज जाट,  सचिन त्यागी)

युमना नदी 

सोमवार, 1 फ़रवरी 2016

इंडिया गेट व पुराना किला, दिल्ली

11dec2015,Friday
एक दिन मेरे बेटे देवांग(6 वर्ष) ने जिद्द लगा दी, की वह आज घुमने जाएगा, या तो मॉल या फिर इंडिया गेट। हुआ यह की वह स्कूल की तरफ से पिकनिक जा रहा था, कुछ तबियत ठीक नही थी, इसलिए उसे भेजा नही ओर कह दिया की हम तुम्हें ले जाएंगे पिकनिक पर, इसलिए उसने एक दिन जिद्द पकड़ ली की आज ही जाना है।
इसलिए हम सुबह तकरीबन 9:30 पर घर से इंडिया गेट की ओर निकल पड़े। कुछ ही मिनटों मे हम इंडिया गेट पहुंच गए। वैसे इंडिया गेट पर शाम ओर रात को बड़ा मजा आता है। सबसे पहले में , देवांग को इंडिया गेट के पास चिल्ड्रन पार्क ले गया, यह पार्क आज भी पहले जैसा ही था, कुछ नही बदला, जब में छोटा था, तब कई बार स्कूल की तरफ से यहाँ पर आया था, पर देवांग को यहां पर काफी मजा आ रहा था, वह यहां पर लगे कई प्रकार के झूलो पर खेल रहा था, आज भी यहां पर बच्चो की बहुत भीड़ थी, शायद कई स्कूल यहां पर आए हुए थे।
यहां पर कुछ समय बिताने के बाद हम दिल्ली की ऐतिहासिक व सबसे लोकप्रिय बिल्डिंग इंडिया गेट पहुँचे, यह पेरिस की एक बिल्डिंग से मिलती जुलती है, इसका डिजाईन लुटिंयन नामक एक अंग्रेज ने बनाया था, इंडिया गेट उन सैनिकों की याद मे बना था, जो प्रथम विश्व युद्ध मे अंग्रेजी सेना की तरफ से लड़ते शहीद हुए थे। इंडिया गेट के पत्थरों पर उन 70000 सैनिकों का नाम लिखा गया है, बाद मे आजादी के बाद इंडिया गेट के बीचो बीच अमर जवान ज्योति उन शहीद जवानों की स्मृति मे जलाई गई, जो 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध मे शहीद हुए थे। इंडिया गेट पर आज भारत के जल, थल व वायु सेना के ध्वज इन शहीदों को सलामी दे रहे है, इंडिया गेट को राष्ट्रीय शहीद स्मारक भी कहा जाता है। यह लगभग 42 मीटर ऊंचा है, यह लाल व भूरे पत्थरों से बना है। हर वर्ष 26 जनवरी को यहां पर राष्ट्रपति जी व बड़ी बड़ी हस्तियाँ गणतंत्र दिवस मनाते है, सैनिक परेड मे शामिल होते है, रंग बिरंगी झांकिया निकलती है।
यहां पर हम लोग फोटो खिंचवा रहे थे, वहाँ तैनात एक सैनिक ने एक व्यक्ति को वहां पर लगी चेन से दूर होने को कहा, इस बात पर वह व्यक्ति बहुत तेज तेज चिल्लाकर बोलने लगा, वह उस सैनिक से बहस करने लगा, एक दो गालियां भी दी, पर सैनिक ने उसे कुछ नही कहां, बस अपना काम करता रहा, यह देखकर मेरे व शायद ओरो के मन मे यही आया की वह इंसान कुछ ज्यादा ही सैनिकों का अपमान कर रहा है, जबकी वह तो अपनी ड्यूटी कर रहे है, वैसे कुछ देर बाद सब सामान्य हो गया। कुछ देर यहां पर समय बिताने के बाद हम तीनों यहां से वापिस चल पड़े।
अब हम दिल्ली के मथुरा रोड व दिल्ली चिड़िया घर के पास बने एक ओर ऐतिहासिक किला देखने पहुँचे। जिसे लोग पुराना किला के नाम से जानते है, प्रवेश शुल्क पांच रू० का था, अंदर बने म्यूजियम देखने के लिए पांच रू० का अलग  टिकेट है। पुराने किले का इतिहास बहुत पुराना है, कहते है की पांडवो का इंद्रप्रस्थ यही था, वैसे म्यूजियम में यहां पर खुदाई से मिली बहुत सारी चीजें रखी है, बाद मे मुगल शासक हुंमायु व दिल्ली का एक ओर सम्राट शेरशाह सुरी ने भी इस किले मे निर्माण कराए। लेकिन हम अब इसे पुराने किले के नाम से ही जानते है।
किले में प्रवेश द्वार के बांये ओर तलाकी द्वार है, ओर दांये तरफ हुंमायु द्वार। यहां पर एक कुहना नाम की मस्जिद भी बनी है। जिसे 1541 में शेरशाह ने बनवाया था। मस्जिद के पास ही एक पानी की बावडी भी मौजूद है। पहले हर किले में ऐसी बावडीयां होती थी, कुछ बावडी तो काफी बड़ी होती थी, यहां पर एक शाही हमाम घर भी बना है, जो अब जर्जर हालत मे मौजूद है। हमाम घर के पास ही शेरशाह द्वारा बनवाया गया शेर मंडल जो अश्तकोनीय दो मंजिला भवन है। इसी भवन मे हुमायूँ का पुस्तकालय हुआ करता था. यहीं पर एक बार पुस्तकों के बोझ को उठाये हुए जब हुमायूँ सीढियों से उतर रहा था, तभी उनको मस्जिद से नवाज की पुकार सुनाई पड़ी। हुमायूँ की आदत थी कि नमाज़ की पुकार सुनते ही, जहाँ कहीं भी होता झुक जाया करता। झुकते समय उसके पैर लंबे चोगे में कहीं फँस गये और वह संतुलन खो कर गिर पड़ा। इस दुर्घटना से हुई शारीरिक क्षति से ही 1556 के पूर्वार्ध मे वह चल बसा।
पुराने किला मैं पहले भी कई बार आया हुं, पहले की तरह अब भी यहां पर प्रेमी जोडो का जमावडा लगा रहता है, कुछ लोग तो दिवारो पर अपना व अपनी प्रेमिका का नाम लिख देते है। जो बहुत गलत है, हम सभी को अपनी इन ऐतिहासिक इमारतों की कद्र करनी चाहिए। इन्हें साफ सुथरा रखने में मदद करनी चाहिए। कोई भी ऐसा कार्य ना करें जिससे इन्हें नुकसान हो।
यहां पर लाईट एंड साऊंड शो भी होता है, शाम को, जिसमें यहां का इतिहास बताया जाता है। ओर किले के बाहर, पानी की एक छोटी सी झील भी बनी है, जहां पर आप नोका विहार का आनंद ले सकते है।
हम लोग यहां घुम कर वापिस अपने घर लौट आए। आज का दिन दिल्ली घुमक्कडी के नाम रहा।
चिल्ड्रन  पार्क में बनी एक जंगल की कलाकृति। 
बच्चे झूले पर लाइन लगाये हुए। 
एक विदेशी बच्चा झूला झूलता हुआ। 
देवांग देशी मुंडा 
इंडिया गेट 
एक फोटो साइड से भी 
में और मेरा बेटा देवांग 
अमर जवान ज्योत 
पुराना किले का बाहरी दरवाजा 
 तलाकी दरवाजा 
हुमायूँ दरवाज़ा 
शेर मंडल जहा हुमायूँ का पुस्तकालय था। 
पानी की बावड़ी 
 पुराना ज़माने का पाइप जहा से हमाम में पानी जाता होगा। 
इसपर से होकर पानी जाता था। 
कुहना  मस्जिद 
मस्जिद के अंदर का फोटो 
साउंड एंड लाइट शो का टाइम टेबल 
देवांग त्यागी 
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शेर मंडल और पीछे कुहना मस्जिद दिखती हुई।