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बुधवार, 23 मार्च 2016

Nag tibba trek (delhi to pantwari village)नाग टिब्बा-1

24 jan 2016 ,sunday

सबसे पहले यह बताना जरूरी है की यह नाग टिब्बा क्या है। टिब्बा का मतलब होता है, ऊँची चोटी या जगह। यह एक छोटा ट्रैक है, जो देहरादून के बेहद नजदीक है, नागटिब्बा तक एक पैदल रास्ता देवलसारी से जाता है ओर एक रास्ता पंतवाडी से। हम लोग पंतवाडी से जाने वाले थे, ओर पंतवाडी से नाग टिब्बा तक 10km का पैदल ट्रैक है। नाग टिब्बा समुंद्र तल से लगभग 3022 मीटर ऊंचाई पर स्थित है, यह गढ़वाल क्षेत्र के निचली हिमालय पर्वतमाला की सबसे ऊंची चोटी है, नागटिब्बा को वहा के स्थानीय लोग झंडी कहते है। नाग टिब्बा से तकरीबन दो किलोमीटर पहले नाग देवता का एक मन्दिर भी है।

हम लोगो के वट्सऐप पर दो  घुमक्कड ग्रुप बने है, एक पर नीरज जाट ने नाग टिब्बा पर जाने का कार्यक्रम बनाया तो दूसरे पर बीनू कुकरेतीमनु त्यागी जी ने हर की दून जाने। मेरा मन दोनो जगह जाने का था, पर समय की उपलब्धता को देखकर नाग टिब्बा जाना तय हुआ, क्योकी यह लगभग मेरी पहली ट्रैकिंग थी, इससे पहले मै केवल चकराता स्थित टाईगर फॉल तक ट्रैकिंग करते गया था वो भी लगभग आज से तकरीबन पंद्रह साल पहले, जब टाईगर फॉल तक रास्ता नही बना था, लेकिन वह बीती बात हो गई, इसलिए नाग टिब्बा को ही मै अपनी पहली ट्रैकिंग मानता हुं। 

कार्यक्रम यह बना की हम 24 Jan  को सुबह दिल्ली से चलेगे ओर पानीपत से सचिन जांगडा को लेते हुए, पौंटा साहिब होते हुए, पंतवाडी रूकेगे। जहां से अगले दिन नाग टिब्बा की ट्रैकिंग चालू करेगे। हम नाग टिब्बा जाने वाले तकरीबन 11 सदस्य हो गए थे, पांच हम दिल्ली से जाने वाले थे, जिसमे मै, नीरज व उनकी पत्नी व उनके दो जानने वाले थे, एक हमारे फेसबुक दोस्त सचिन कुमार जांगडा थे, जो हमे पानीपत से मिलने वाले थे, एक सदस्य लखनऊ से आ रहे थे इनका नाम है पंकज मिश्रा जी जो OBC बैंक मे चीफ मैनेजर के पद पर कार्यरत है, यह हमे हरबर्ट पूर से मिलने वाले थे, ओर चार सदस्य अम्बाला से अपनी गाडी से आ रहे थे, इनमे मेरे एक ब्लॉगर मित्र नरेश सहगल भी थे, यह हमे पौंटा साहिब गुरूद्वारा मिलने वाले थे।

मै 24 जनवरी की सुबह 6:15  पर कार सहित नीरज जाट के घर (शास्त्री पार्क) पहुचं गया, ओर जल्द ही हमने अपने बैग व ट्रैकिग का सारा समान गाडी की डिग्गी मे रख दिया, अभी भी हल्का हल्का अंधेरा था, लगभग सुबह के सात बजे हम दिल्ली से निकल पडे, रास्ते में घना कोहरा मिला पर आराम आराम से गाडी चलाते हुए दिल्ली सोनीपत बार्डर पर आ गए, यहां पर नीरज ने जांगडा को फोन मिलाया तो उसने बताया की वह पानीपत टोल टैक्स पर मिलेगा लेकिन साढे दस बजे के बाद मिलेगा। इतने में हमारे एक अन्य मित्र जो सोनीपत  में रहते है, संजय कोशिक जी उनका फोन नीरज के फोन पर आ गया, बोले की रास्ते में घर होकर जाना, बस फिर क्या था चल पडे संजय कोशिक जी के घर चाय पीने के लिए। मैन रोड से थोडा चलने पर ही संजय जी व उनका बेटा हमारा इंतजार करते हुए मिल गए, संजय जी व परिवार के सदस्यो से मुलाकात हुई, यहां पर आकर बहुत अच्छा लगा, संजय जी ने चाय के बाद हमे आगे के सफर के लिए मुंगफली दी, जो आगे हमारे सफर पर बहुत काम आई।

संजय जी से मिलकर हम वापिस पानीपत की तरफ चल पडे। समय लगभग दस बज रहे थे, टोल टैक्स पार कर कार साईड में लगा दी, देखा तो सचिन जांगडा ठंड मे आग तापता मिला, हमने कहां की तुम तो लेट आने वाले थे, फिर जल्दी कैसे आ गए, अपने हंसी मजाक के अंदाज में जांगडा ने नीरज की तरफ इशारा करते हुए कहां की यह बुरा मान जाता इसलिए समय पर आ गया। यहां से सचिन जागंडा मेरे साथ कार मे हो लिया ओर नीरज को सचिन की बाईक चलानी पडी, एक दो जगह रूक रूक कर हम यमुनानगर पहुचें।
 दोपहर के तकरीबन एक बज रहा था, नीरज ने हमे फव्वारा चौक पर रूकने के लिए बोला, जब हम वहां पहुचें तो नीरज के साथ दो ओर अन्य व्यक्ति थे। जिनमे से एक थे दर्शन लाल बवेजा जी जो एक साइंस टीचर है, बवेजा जी नीरज के फेसबुक दोस्त है, उन्होने पास ही रेस्ट्रोरेंट में दोपहर के खाने का इंतजार किया हुआ था, वैसे हम सबने आलू के पराठे ही खाए। खाने के दौरान दर्शन जी ने बताया की यमुनानगर से तकरीबन सत्रह किलोमीटर बाद कालासर जंगल आरंभ होता है, वही मैन रोड पर ही कालेश्वर धाम नाम से एक पुराना शिव मन्दिर पडता है, जहां पर रविवार के दिन हिमालय की जडू- बूटी से निर्मित एक शिव अमृत नामक दवा भी पिलाई जाती है, जिससे किसी भी प्रकार का कैंसर ठीक हो जाता है,  उन्होने बताया की यहां पर स्वंयमभू शिवलिंग है, जब उन्होने हमे इस बारे मे बताया ओर वह स्थान रास्ते मे भी पड रहा है तो हमने वहां पर जाने का कार्यक्रम तय कर दिया।
दर्शन जी से मिलकर हम कालासर की तरफ या कहे की अपनी मंजिल की तरफ चल पडे, सचिन जांगडा ने नरेश सहगल जी को फोन मिलाया तो वह पौंटा साहिब थे, इसलिए हमने उन्हे बता दिया की हम पौंटा साहिब नही आ पाएगे आप सीधा पंतवाडी रूको, वही पर मिलते है आपको। यमुनानगर से कालासर महादेव तक सडक़ सिंगल लेन की है पर बनी सही है, इसलिए थोडी ही देर बाद हम लोग कालेश्वर महादेव मन्दिर पहुचं गए। यहां पर मन्दिर दर्शन किए, वह शिव अमृत बांट रहे एक सन्यासी किस्म  के बाबा जी से भी मिले, उन्ही के पास एक डा० साहब भी बैठे थे, जो लोगो की नब्ज देखकर बीमारी बता रहे थे, फीस कुछ नही ले रहे थे, मन्दिर में भंडारा भी चलता रहता है। पता चला की शिव अमृत नामक दवा कोई भी पी सकता है, सबने थोडी थोडी पी, भंयकर कडवी दवा थी ये, एक शीशी मेने भी रू०160 प्रतिलीटर की दर से खरीद ली, क्योकी यह दवा अन्य आम बीमारीयो में भी लाभकारी है।
मन्दिर से चलकर हम कालेसर जंगल से निकले,यहां पर हमे बहुत बढिया सडक भी मिली गाडी की रफ्तार अपने आप बढ गई, जैसे गाडी खुद कह रही हो की मुझे उडने दो पर मैने गाडी को काबू किया। मै ज्यादातर तेज गाडी नही चलाता हुं। यहां पर रोड के दोनो तरफ बंदर बैठे थे। मैने देखा है की कुछ लोग बंदरो को खाने के लिए कुछ ना कुछ देते है, इस कारण यह बंदर जगंल से बाहर आकर सडक के पास ही रहना चालू कर देते है, कभी कभी रोड पर इनके कारण रोड पर दुर्घटना भी घट जाती है, आगे चलकर हमने सड़क पर कुछ बंदरो के शव भी देखे जो शायद किसी गाडी से टकराकर मारे गए होगें। इसलिए आपसे निवेदन है की आप भी सड़क छाप बंदरो को खाना ना फैके। 
जांगडा ने मन्दिर से अपनी बाईक नीरज से ले ली ओर जगंल के इन खूबसूरत रास्तो पर बाईक चलाने का मजा लेने लगा, हम उसके पिछे पिछे ही चल रहे थे, हमने हरियाणा से हिमाचल मे प्रवेश किया,शायद यहां पर तीस रूपयो की पर्ची कटी। पौंटा साहेब गुरूद्वारा के सामने से निकल कर हम सीधा हर्बटपूर जाकर ही रूके, यहां पर एक चौक पर पंकज मिश्रा हमारा इंतजार करते हुए मिले, उन्होने मुझसे मिलते ही कहां की आप सचिन त्यागी है ना। शायद  उन्होने मेरी एक दो पोस्ट पहले से ही पढी हुई थी, उनका समान कार मे रख दिया, यहां से जांगडा व नीरज के रिश्तेदार नरेंद्र जी बाईक पर बैठ गए ओर हम बाकी पांचो कार में, थोडा चलने पर ही पहाडी मार्ग् चालू हो जाता है, यह देहरादून यमुनोत्री मार्ग है, आगे चलकर इसी रोड पर यमुना ब्रिज पडता है, जहां से थोडा आगे एक रास्ता कैम्पटीफॉल मसूरी के लिए निकल जाता है। यही थोडी देर यमुना ब्रिज पर रूके, यमुना नदी के बेहद करीब जाने का मन था पर जा ना सके, यमुना नदी यहां पर छोटी सी व साफ लग रही थी नही तो दिल्ली मे तो यह काली दिखने लगती है। ब्रिज के पास ही एक चाय की दुकान थी जहां शाम की चाय पी गई, यहीं पर हमने नरेश जी को फोन किया तो पता चला की वह पंतवाडी पहुचं गए है, हमने भी रूकने के लिए तीन कमरे बुक करने के लिए उन्ही से कह दिया, क्योकी फिर हमे वहां जाकर रूम नही ढुंढने पडेगे। थोडी देर बाद यमुना के पुल से चल पडे, यह रास्ता ठीक बना है, कही कही सडक़ निर्माण कार्य भी चल रहा था, यह सडक़ सीधे यमुनोत्री चली जाती है, अब हल्का हल्का अंधेरा हो चुका था, मुख्य सडक पर एक जगह नैनबाग नामक एक छोटा सा बाजार आया, जहां से पंतवाडी के लिए दांहिने हाथ को रास्ता अलग हो जाता है, नैनबाग में भी रूकने को छोटे छोटे होटल बने थे, नैनबाग से पंतवाडी तकरीबन 15kmकी दूरी पर है, कुछ दूर तक सडक ठीक थी लेकिन फिर खराब ही मिली, ओर ट्रैफिक तो था ही नही दो तीन गांव भी पडे इस रास्ते पर, हम  लोग पूरे अंधेरा में ही पंतवाडी पहुचें।
नरेश जी व उनके तीन मित्रो से मुलाकात हुई, उन्होने हमारे लिए एक होटल मे तीन कमरे पहले से ही बुक किये हुए थे, हमारा होटल व उनका होटल के बीच दूरी भी बहुत थी, क्योकी पंतवाडी में ज्यादातर लोगो ने छोटे ही होटल बनाए हुए है, क्योकी यहां पर केवल ट्रैकर ही आते है वो भी हर मौसम में नही, वैसै यहां पर एक गोट विलेज नामक बडा रिजोर्ट बन रहा है।
हम लोग अपना अपना समान अपने रूम पर रख आए, मैने गाडी भी होटल के पास एक बनी  गांव की पार्किग में लगा दी, जहां पर गांव वालो ने जमीन पर पत्थर की औखली बना रखी थी जिसका वह दाल दलने व ओर बहुत सी वस्तुओ को पीसने में प्रयोग पर लाते होंगे। अगले दिन गाडी को  देखकर कुछ गांव  लोगो ने मुझ से कहा की आप यहां तक कार कैसे चढा लाए। क्योकी यह रास्ता एकदम ऊंचाई पर व बेहद पतला ओर ऊपर से कुछ मोड वाला था।
खैर छोडो ये बाते! हम सब अपना अपना समान रख कर एक होटल( होटल परमार) मे बैठ गए, जहां पर नरेश जी ने बताया की वह कल सुबह ही ट्रैक पर निकल पडेगे ओर रात होने से पहले वापिस आ जाएगे, हमने भी अपना कार्यक्रम बता दिया की दोपहर को चलेगे, शाम को नाग देवता मन्दिर के पास अपने टेंट लगा देगे ओर रात वही रूककर सुबह नागटिब्बा जाएगे, ओर फिर घर वापिसी की राह पकडेगे। सबने एक साथ खाना खाया ओर सुबह के लिए क्या क्या पैक करना है यह सब बता कर सोने के लिए अपने अपने कमरो में आ गए।

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अब इस यात्रा के कुछ फोटो देखे जाए ...



युमनानगर से कालासर तक ऐसा रोड था। 
कालेश्वर महादेव मंदिर। 








मंदिर के अंदर का दर्शय 
यही मिलता है शिव अमृत। 
  

कालेश्वर महादेव शिवलिंग। 


माँ पार्वती 

हिमाचल में प्रवेश 

लो जी उत्तराखंड भी आ लिए हम। 

युमना ब्रिज 

सचिन त्यागी 

शाम की चाय (पंकज मिश्रा,  नीरज जाट,  सचिन त्यागी)

युमना नदी 

सोमवार, 1 फ़रवरी 2016

इंडिया गेट व पुराना किला, दिल्ली

11dec2015,Friday
एक दिन मेरे बेटे देवांग(6 वर्ष) ने जिद्द लगा दी, की वह आज घुमने जाएगा, या तो मॉल या फिर इंडिया गेट। हुआ यह की वह स्कूल की तरफ से पिकनिक जा रहा था, कुछ तबियत ठीक नही थी, इसलिए उसे भेजा नही ओर कह दिया की हम तुम्हें ले जाएंगे पिकनिक पर, इसलिए उसने एक दिन जिद्द पकड़ ली की आज ही जाना है।
इसलिए हम सुबह तकरीबन 9:30 पर घर से इंडिया गेट की ओर निकल पड़े। कुछ ही मिनटों मे हम इंडिया गेट पहुंच गए। वैसे इंडिया गेट पर शाम ओर रात को बड़ा मजा आता है। सबसे पहले में , देवांग को इंडिया गेट के पास चिल्ड्रन पार्क ले गया, यह पार्क आज भी पहले जैसा ही था, कुछ नही बदला, जब में छोटा था, तब कई बार स्कूल की तरफ से यहाँ पर आया था, पर देवांग को यहां पर काफी मजा आ रहा था, वह यहां पर लगे कई प्रकार के झूलो पर खेल रहा था, आज भी यहां पर बच्चो की बहुत भीड़ थी, शायद कई स्कूल यहां पर आए हुए थे।
यहां पर कुछ समय बिताने के बाद हम दिल्ली की ऐतिहासिक व सबसे लोकप्रिय बिल्डिंग इंडिया गेट पहुँचे, यह पेरिस की एक बिल्डिंग से मिलती जुलती है, इसका डिजाईन लुटिंयन नामक एक अंग्रेज ने बनाया था, इंडिया गेट उन सैनिकों की याद मे बना था, जो प्रथम विश्व युद्ध मे अंग्रेजी सेना की तरफ से लड़ते शहीद हुए थे। इंडिया गेट के पत्थरों पर उन 70000 सैनिकों का नाम लिखा गया है, बाद मे आजादी के बाद इंडिया गेट के बीचो बीच अमर जवान ज्योति उन शहीद जवानों की स्मृति मे जलाई गई, जो 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध मे शहीद हुए थे। इंडिया गेट पर आज भारत के जल, थल व वायु सेना के ध्वज इन शहीदों को सलामी दे रहे है, इंडिया गेट को राष्ट्रीय शहीद स्मारक भी कहा जाता है। यह लगभग 42 मीटर ऊंचा है, यह लाल व भूरे पत्थरों से बना है। हर वर्ष 26 जनवरी को यहां पर राष्ट्रपति जी व बड़ी बड़ी हस्तियाँ गणतंत्र दिवस मनाते है, सैनिक परेड मे शामिल होते है, रंग बिरंगी झांकिया निकलती है।
यहां पर हम लोग फोटो खिंचवा रहे थे, वहाँ तैनात एक सैनिक ने एक व्यक्ति को वहां पर लगी चेन से दूर होने को कहा, इस बात पर वह व्यक्ति बहुत तेज तेज चिल्लाकर बोलने लगा, वह उस सैनिक से बहस करने लगा, एक दो गालियां भी दी, पर सैनिक ने उसे कुछ नही कहां, बस अपना काम करता रहा, यह देखकर मेरे व शायद ओरो के मन मे यही आया की वह इंसान कुछ ज्यादा ही सैनिकों का अपमान कर रहा है, जबकी वह तो अपनी ड्यूटी कर रहे है, वैसे कुछ देर बाद सब सामान्य हो गया। कुछ देर यहां पर समय बिताने के बाद हम तीनों यहां से वापिस चल पड़े।
अब हम दिल्ली के मथुरा रोड व दिल्ली चिड़िया घर के पास बने एक ओर ऐतिहासिक किला देखने पहुँचे। जिसे लोग पुराना किला के नाम से जानते है, प्रवेश शुल्क पांच रू० का था, अंदर बने म्यूजियम देखने के लिए पांच रू० का अलग  टिकेट है। पुराने किले का इतिहास बहुत पुराना है, कहते है की पांडवो का इंद्रप्रस्थ यही था, वैसे म्यूजियम में यहां पर खुदाई से मिली बहुत सारी चीजें रखी है, बाद मे मुगल शासक हुंमायु व दिल्ली का एक ओर सम्राट शेरशाह सुरी ने भी इस किले मे निर्माण कराए। लेकिन हम अब इसे पुराने किले के नाम से ही जानते है।
किले में प्रवेश द्वार के बांये ओर तलाकी द्वार है, ओर दांये तरफ हुंमायु द्वार। यहां पर एक कुहना नाम की मस्जिद भी बनी है। जिसे 1541 में शेरशाह ने बनवाया था। मस्जिद के पास ही एक पानी की बावडी भी मौजूद है। पहले हर किले में ऐसी बावडीयां होती थी, कुछ बावडी तो काफी बड़ी होती थी, यहां पर एक शाही हमाम घर भी बना है, जो अब जर्जर हालत मे मौजूद है। हमाम घर के पास ही शेरशाह द्वारा बनवाया गया शेर मंडल जो अश्तकोनीय दो मंजिला भवन है। इसी भवन मे हुमायूँ का पुस्तकालय हुआ करता था. यहीं पर एक बार पुस्तकों के बोझ को उठाये हुए जब हुमायूँ सीढियों से उतर रहा था, तभी उनको मस्जिद से नवाज की पुकार सुनाई पड़ी। हुमायूँ की आदत थी कि नमाज़ की पुकार सुनते ही, जहाँ कहीं भी होता झुक जाया करता। झुकते समय उसके पैर लंबे चोगे में कहीं फँस गये और वह संतुलन खो कर गिर पड़ा। इस दुर्घटना से हुई शारीरिक क्षति से ही 1556 के पूर्वार्ध मे वह चल बसा।
पुराने किला मैं पहले भी कई बार आया हुं, पहले की तरह अब भी यहां पर प्रेमी जोडो का जमावडा लगा रहता है, कुछ लोग तो दिवारो पर अपना व अपनी प्रेमिका का नाम लिख देते है। जो बहुत गलत है, हम सभी को अपनी इन ऐतिहासिक इमारतों की कद्र करनी चाहिए। इन्हें साफ सुथरा रखने में मदद करनी चाहिए। कोई भी ऐसा कार्य ना करें जिससे इन्हें नुकसान हो।
यहां पर लाईट एंड साऊंड शो भी होता है, शाम को, जिसमें यहां का इतिहास बताया जाता है। ओर किले के बाहर, पानी की एक छोटी सी झील भी बनी है, जहां पर आप नोका विहार का आनंद ले सकते है।
हम लोग यहां घुम कर वापिस अपने घर लौट आए। आज का दिन दिल्ली घुमक्कडी के नाम रहा।
चिल्ड्रन  पार्क में बनी एक जंगल की कलाकृति। 
बच्चे झूले पर लाइन लगाये हुए। 
एक विदेशी बच्चा झूला झूलता हुआ। 
देवांग देशी मुंडा 
इंडिया गेट 
एक फोटो साइड से भी 
में और मेरा बेटा देवांग 
अमर जवान ज्योत 
पुराना किले का बाहरी दरवाजा 
 तलाकी दरवाजा 
हुमायूँ दरवाज़ा 
शेर मंडल जहा हुमायूँ का पुस्तकालय था। 
पानी की बावड़ी 
 पुराना ज़माने का पाइप जहा से हमाम में पानी जाता होगा। 
इसपर से होकर पानी जाता था। 
कुहना  मस्जिद 
मस्जिद के अंदर का फोटो 
साउंड एंड लाइट शो का टाइम टेबल 
देवांग त्यागी 
कैप्शन जोड़ें
शेर मंडल और पीछे कुहना मस्जिद दिखती हुई। 

शनिवार, 26 दिसंबर 2015

एक छोटी सी यात्रा(नैना देवी व गर्जिया देवी मन्दिर)

इस यात्रा को शुरूआत से पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।
13,September,2015
हम सुबह 6बजे ही ऊठ गए, क्योकी आज हमने अलमोडा होते हुए, कौसानी जाना था या फिर बिनसर। लेकिन चाय के समय यह तय हुआ की हम आज ही दिल्ली वापिस जाएंगे। कल रात से ही ललित का दिल घर जाने को करने लगा, ओर वकील साहब ने तो सीधे ही घर जाने को कह दिया। पहले तो मुझे बड़ा दुख हुआ की हमारा टूर अपने मुकाम को हासिल ना कर पाया। लेकिन मैंने भी यह समझकर सब्र कर लिया, की कल मेरी वजह से भी तो यह लोग नैनीताल तक आए। लेकिन अब इतना तय हो चुका था की आज हम वापिस घर जाएंगे। ओर घर जाएंगे तो कुछ देख कर ही जाएंगे, इसलिए मैंने नैनीताल से कालाडुंगी वाला रास्ते से जाना तय किया, जिससे इन लोगों को गर्जियादेवी(गिरिजा देवी)के दर्शन करा सकूँ।
हम सुबह नहा व अन्य जरूरी कार्यों को निपटा कर होटल से निकल पड़े, आज नैनीताल में सुबह से ही पुलिस व स्थानीय लोग काफी संख्या में इकठ्ठा हुए थे, जिसका कारण यह था की यहां पर मैराथन दौड़ का आयोजन किया हुआ था। इस मैराथन दौड़ मे नैनीताल के काफी स्कूल भाग ले रहे थे। हम भी माल रोड पर दर्शक बन कर इस दौड़ का लुफ्त उठा रहे थे।
फिर हम दौड़ के प्रतियोगी को देखते देखते पार्किंग में पहुँचे, जहाँ हमारी कार खड़ी थी, पार्किंग के पास ही माता नैनादेवी का मन्दिर है, जो माता के 51 शक्ति पीठो में से एक है, यहां पर माता सती के मृत शरीर की बांयी आँख (नयन) गिरी थी। जिस कारण यहां पर झील का निर्माण भी हुआ। जो आज नैनीझील के नाम से विख्यात है, झील के किनारे ही यह सुंदर मन्दिर बना है, यहां पर गणेशजी, माता काली, हनुमान  व अन्य बहुत से मन्दिर बने है।
चूँकि मैं ओर प्रवीण जी कल ही यहां पर दर्शन कर आए थे, लेकिन ललित कल दर्शन नही कर पाया था, इसलिए मैं ओर ललित मन्दिर मे दर्शन करने चले गए, प्रवीण जी ने मन्दिर जाने से मना कर दी, ओर कहने लगे की मैं गाड़ी पार्किंग मे से निकाल रहा हुं, तब तक तुम मन्दिर दर्शन कर आओ। हमने मन्दिर के बाहर बनी दुकान से प्रसाद लिया ओर नैना देवी मन्दिर चले गए। बहुत अच्छे से दर्शन हुए। दर्शन करने के बाद हम गाड़ी के पास पहुँचे ओर वहां से चल पड़े।
हम लोग बारापत्थर तिराहा से खुरपा ताल की तरफ चल पड़े, क्योकी सुबह से कुछ खाया भी नही था, इसलिए आगे चलकर चारगांव नामक जगह आई, यहां पर एक होटल वाले से चाय बनवाने के लिए बोल दिया, साथ मे कुछ खाने को भी ले लिया, यहां से चलकर हम सडीयाताल से पहले एक छोटे से झरने पर भी रूके। पहाडो पर ऐसी जगह देखते ही, अपने आप रूकने को  मन कर जाता है, यहां पर कुछ समय रूककर हम सीधे खुरपाताल ही रूके, वैसे हम नीचे झील तक नही गए, हम ऊपर सड़क पर ही रूक गए, यहां पर कुछ लोग पत्थर ऊठा ऊठा कर झील की तरफ फैंक रहे थे, पर पत्थर झील तक नही पहुँच पा रहा था, जबकी झील सड़क से बहुत नजदीक दिखाई पड़ रही थी, उन्हीं लोगों में से एक ने बताया की झील इतनी नजदीक होने के बावजूद भी कोई वहां तक पत्थर नही फैंक सकता, क्योकी यह झील उसे अपने तक नही आने देती, मैंने भी एक पत्थर ऊठाया ओर झील की तरफ उछाल दिया, पत्थर की गति को देखकर वहां पर बैठे सभी कहने लगे की यह तो जरूर जाएगा, लेकिन पत्थर एकदम नीचे पेडो मे चला गया। जहाँ तक मुझे लगा की झील पास ही दिखती है पर वास्तव मे वह पास नही दूर है। इसलिए पत्थर वहां तक नही गया। खुरपाताल के नजदीक ही सड़क पर माता मनसा देवी का एक एक छोटा सा मन्दिर भी बना है,
नैनीताल से रामनगर तक का रास्ता बहुत सुंदर बना है, ज्यादा भीडभाड भी नही रहती है इस रास्ते पर, प्राकृतिक सुंदरता सड़क के दोनों ओर बनी रहती है, बार बार मन करता रहता है की यहां रूको वहां रूको, हवा इतनी शुद्ध की शरीर में अपने आप नई ऊर्जा का अनुभव होता है,
इसी रोड पर चलते हुए, जिम कार्बेट के अंतगर्त आने वाला कालाडुंगी जंगल भी पड़ता है, जहां दोनों ओर घने जंगल मिलते है, लम्बे लम्बे पेड़ , पक्षियों की आवाज व दिमक की बनाई गई बाम्बियां भी बहुत दिखती है, यहां पर भी हम थोड़ी देर रूक कर आगे चले, आगे नया गांव नाम की जगह पड़ती है, जिसे शायद छोटी हल्द्धवानी भी कहते है, यहां पर जिम कार्बेट संग्रहालय भी है, ओर थोड़ी ही दूर पर कार्बेट फॉल नाम का झरना भी है, पर फिलहाल यह बंद था, यह नवम्बर से खुल कर जूलाई मे बंद होता है। यहां से एक रास्ता रामपुर व कांशीपूर को चला जाता है, ओर एक रास्ता रामनगर, जिम कार्बेट पार्क की तरफ चला जाता है, इसी रास्ते पर कार्बेट फॉल भी पड़ता है। हम भी इसी रास्ते पर हो लिये, आगे कोसी नदी पर बना एक डैम पड़ा, जहां से एक रास्ता रामनगर चला जाता ओर दूसरा सीतावनी चला जाता है, हम रामनगर वाले रास्ते पर चल दिए, कुछ ही मिनटों मे रामनगर पहुँच गए, रामनगर से गर्जिया तक बहुत से होटल बने है, इस रोड पर बहुत से हाथी  वाले भी बैठे थे जो हाथी पर बैठ कर जंगल सफारी कराते है, जो तकरीबन आपको तीन चार घंटे जंगल की सैर कराते है, एक हाथी के तकरीबन 3000रू० लेते है, ओर अधिकतम चार आदमी इतने पैसों मे हाथी पर बैठ कर जंगल सफारी का आनंद ले सकते है।
हम रामनगर से सीधे तकरीबन 12 किलोमीटर चल कर दाहिने हाथ पर गर्जिया (गिरिजादेवी) मन्दिर को जो रास्ता जाता है, उस चल पड़े। ढिकाला मार्ग से ही आपको एक बड़ा गेट बना हुआ दिख जाएगा। गर्जिया नामक जगह  गिरिजा माता के नाम से भी प्रसिद्ध हैं। यह मन्दिर कोसी(कौशिकी) नदी के मध्य एक छोटे से टीले (पहाड़ )पर बना है, कहते है की यह टीला पानी मे बहता बहता हुआ यहां तक आया था, गिरिजादेवी गिरीराज हिमालय की पुत्री थी, माता पार्वती को गिरिजादेवी के रूप से भी जाना जाता है।मन्दिर तक जाने के लिए कोसी पर पुल बना है, मन्दिर तक तकरीबन 90 सीढ़ियों से होकर जाना पड़ता है, इस मन्दिर पर ऊपर तक जाने व वापसी आने का रास्ता मात्र चार या पाँच फुट ही चौड़ा है, ऊपर बस गिरिजादेवी का एक छोटा सा मन्दिर ही है, इस मन्दिर की यहां पर बहुत बड़ी मान्यता है, दूर दूर से लोग यहां पर माता के दर पर माथा टेकने के लिए आते है, यहां पर कुछ भक्तों ने बताया की यहां पर मांगे जानी वाली सारी मनोकामनाएं पूरी होती है, इसलिए तो यहां पर माता के दर्शन के लिए हमेशा भक्तों की लाईन लगी रहती है।
जिस पहाड़ पर माता का मन्दिर है, उसी पहाड़ के नीचे भैरो का मन्दिर भी है। यह एक छोटी सी गुफा में स्थित है। ओर एक शिव मन्दिर भी बना है।
हम तीनों पास ही एक दुकान से प्रसाद लेकर मन्दिर की लाईन में लग गए। लाईन लम्बी थी पर इतनी बड़ी नही थी, मैं पहले भी एक बार यहां पर आ चुका हुं, तब माता के दर्शन नही हो पाए थे। इसलिए मैं दर्शन का यह मौका नही चुकना चाहता था। हम तीनों लाईन मे लगे रहे, तकरीबन एक घंटे बाद हमने माता गिरिजादेवी के दर्शन किये। ऊपर से कोसी का सुंदर दृश्य दिखाई पड़ रहा था, लेकिन जगह की कमी की वजह से हमे जल्द ही नीचे उतरना पड़ा। नीचे आकर हम तीनों कोसी के किनारे पहुँचे, कोसी का जल बहुत स्वच्छ व साफ दिख रहा था, पानी को देखकर तुरंत ही हम तीनों का इसमें नहाने का मन बन गया ओर बिना देरी करे हम कोसी के शीतल जल मे जमकर नहाए। यहां पर हमने एक गाय को नदी पार करते देखा।
नहाने के पश्चात हम गाड़ी तक पहुँचे, ओर गाड़ी लेकर रामनगर आ गए, यहां पर हमने एक मिठाई की दुकान से उत्तराखंड की प्रसिद्ध बाल मिठाई खरीदी। मुझे यह बाल मिठाई खाने में  बहुत अच्छी लगती है, फिर हम काशीपुर होते हुए, मुरादाबाद पहुँचे, रास्ते मे खाना खाकर रात को तकरीबन दस बजे दिल्ली आ गए।
यात्रा समाप्त.......
अब कुछ फोटो देखे जाएँ, इस यात्रा के........
मैराथन दौड़ 
ललित और सचिन 
नैनीताल में गुरुदवारा साहिब 
नयनादेवी मन्दिर का बाहरी दवार। 
नैनादेवी के दर्शन कर लो आप भी 
बहुत मछलियाँ थी यहाँ पर। 
नैनीझील 
नैनीझील 
चारगांव 
चारगांव में एक दुकान जहा हमने नाश्ता किया था। 
रास्ते में एक छोटा सा झरना भी मिला। 
मै (सचिन त्यागी)
सिंचाई के लिए बनायीं गयी एक छोटी सी झील। 
पता नहीं यह क्या था। 
खुर्पाताल 
खुर्पाताल में माता मनसा देवी मंदिर। 
यह कोई फल था नाम नहीं पता। 
सुन्दर रास्ते 
रास्ते में ऐसी सुन्दर जगह की रुकने को अपने आप मन कर जाएं। 
कैप्शन जोड़ें
इस लकड़ी में छोटे छोटे कई सारे पौधे उगे हुए थे। 
कालाढूंगी से पहले सड़क किनारे  सुनसान जंगल 
वकील साहब चल दिए फोटो खीचने जंगल  अंदर। 
दीमक की बांबी 
रास्ते में एक नदी पड़ी जहा पर बहुत सारे लँगूर दिखाई दिए। 
एक तिराहा व  दिशा बताता शाइन बोर्ड। 
कॉर्बेट फॉल ( नयागांव) 
रामपुर से गर्जिया जाते हुए एक लोहे का पुल। 
एक ऐलिफेन्ट सफारी पॉइंट।, जहा  आप कुछ मनी देकर जंगल सफारी का आनंद ले सकते है। 
गर्जिया देवी तक जाता रास्ता। 
कोसी नदी (गर्जिया )
गिरिजा देवी मन्दिर 
मै सचिन त्यागी  गर्जिया देवी मंदिर पर। 
मंदिर पर दर्शन के लिए  लाइन लगी हुई हैं व मंदिर के निचे शिव और भैरो मन्दिर। 
मंदिर तक खड़ी सीढ़िया और छोटा सा रास्ता। 
ऊपर माता गिरिजादेवी के दर्शन। 
मंदिर से लिया गया कोसी नदी का एक फोटो। 
कोसी में स्नान 
एक गऊ माता कोसी में 
नदी पार करती गऊ माता।