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शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

उत्तराखंड के एक गाँव बरसुडी की यात्रा (मेडिकल कैम्प व वापसी)

अब तक आपने पढा की हम कुछ दोस्त अपने अपने शहरो से बरसुडी गांव आए। हमने यहां पर बच्चो के लिए बरसुडी के स्कूल में एजूकेशन कैम्प लगाया ।
अब आगे...
14,aug,2017
सुबह आराम से सात बजे उठा । क्योकि आज कैम्प बरसुडी में ही लगाना था। उठते ही मैं पंचायत भवन पहुंचा। यहां पर मुरादाबाद से आए दोस्त योगेश शर्मा जी भी मौजूद थे। कुछ देर हम साथ बैठे रहे । कल व आज की चर्चा चली। फिर मैं वापिस हरीश जी के घर पहुंचा। उन्होने चाय बना दी थी। चाय के साथ उनसे बात होती रही। आज वह नीचे शहर की तरफ जा रहे थे। कल 15 अगस्त है इसलिए स्कूल मे बच्चो को दी जाने वाली मिठाई लेने शहर जा रहे थे। जब मैं स्कूल में पढता था तब हमे भी लड्डू मिला करते थे। वह समय याद आ जाता है कभी कभी। हरीश जी चले गए। हम भी नहा- धौकर पंचायत भवन पहुंच गए। आज यहां पर मेडिकल कैम्प लगाया जाएगा। मेडिकल कैम्प के संचालक के लिए डॉ प्रदीप त्यागी जी व डॉ अजय त्यागी जी को जिम्मेदारी दी गई। यह दोनो ही मुख्य डॉक्टर रहेंगे जो मरीजों की जांच व जरूरी सलाह देंगे। लेकिन गांव के कुछ लोग हिन्दी नही समझते है वह सिर्फ गढ़वाली ही जानते है ऐसे मरीजो के लिए श्री मति शशि जी जो उत्तराखंड की ही रहने वाली है और एक अध्यापिका भी है वह ऐसे मरीजो और डॉक्टर के बीच संवाद कराएगी। दवाई बांटने का जिम्मा मुझ पर व नरेंद्र चौहान जी पर था। लगभग सुबह के 9 बजे हमने बैनर, टेबल पर दवाई लगा कर सारी व्यवस्था कर दी। लेकिन कुछ दवाई जो कल ही आ जानी थी वह किसी कारणवश नही आ पाई। वह दवाई गुमखाल में रखी थी इसलिए पानीपत के सचिन कुमार जांगडा व राजस्थान से आये एक दोस्त रजत शर्मा जी बाईक पर उन दवाइयो को लेने चले गए। 
बरसुडी की सुबहा 


बरसुडी की सुबहा और केले के खेत 

टमाटर 

मेडिकल कैंप का बैनर 

कैंप में आते लोग 

डॉक्टर्स और शशि जी अपना अपना कार्य करते हुए। 

डॉ अजय जी मरीज से वार्ता कलाप करते हुए। 

मेडिसिन 

डॉ. प्रदीप जी मरीजों का इलाज करते हुए। 

बच्चे हो या बूढ़े सभी मेडिकल कैंप में आये। 

हम दोस्तों की एक साथ सेल्फी। 

अमन मल्लिक जी और मैं सचिन 

शशि नेगी जी और मैं सचिन एक सेल्फी में 

मैं और बीनू के चाचा जी( भीम दत्त कुकरेती जी )

गांव के बुजुर्ग कैंप में आते हुए 

बरसुडी आने जाने वाले रास्ते पर लैंड स्लाइड हो गया था हमारे घुमक्कड़ साथियो ने पत्थर हटा कर बाइक के लिए रास्ता बनाया था। उसी पल का एक फोटो। 

हलवाई नें नाश्ते में भरवा कचौडी व चाय बनाई। जिसका स्वाद हम घुमक्कड दोस्त व गांव वासियों ने भी लिया। नाश्ते के बाद सभी को खाने के लिए बेसन के लड्डू भी दिए गए। मरीजो में ज्यादातर संख्या बुजुर्गों की ही थी। हमारे दोनो डॉक्टर  बहुत अच्छी तरह से मरीजों की समस्या को सुन रहे थे व उन्हे जरूरी बातो के अलावा दवाई भी दे रहे थे। कुछ मरीजों को दवाई नहीं मिली थी उनको दवाई घर जाकर देने को भी कहा। मेडिकल कैंप में शामिल होने बहुत से लोग आ रहे थे। जिसको देखकर हम सभी खुश थे। बरसुडी गांव में कोई डॉक्टर या किसी भी प्रकार डिस्पैंसरी नहीं है इसलिए बीनू भाई ने मेडिकल कैंप लगाने की सलाह दी। जिसे आज हम सफल होता देख रहे थे।

आज हमारे बहुत से घुमक्कड़ साथी अपने अपने घर लौट रहे थे। कुछ सुबह ही चले गए थे। कुछ जाने की तैयारी कर रहे थे। बाकी कुछ साथी मेडिकल कैम्प को पूरा करने के बाद कल जाएगे। मै भी तकरीबन 11 बजे बरसुडी से चल पडा। कैम्प अभी जारी रहेगा लगभग तीन बजे तक । मेरे साथ झारखंड से आए एक दोस्त अमन मलिक जी भी चल रहे थे। जिनको मुझे दिल्ली छोडना था। हमसे कुछ आगे मुजफ्फरनगर से आए जावेद जी व राजस्थान से आए कोठारी साहब चल रहे थे। हमारे साथ रामानन्द जी भी चल रहे थे जो अपनी जॉब पर द्वारीखाल जा रहे थे। जब मै वापिस आने से पहले उनसे मिलने उनके घर पर गया तब उन्होने बोला की वह भी द्वारीखाल जा रहे है आप चलो, मैं भी आता हूं। रामानंद जी हमे द्वारीखाल दूसरे रास्ते से ले जा रहे थे जो थोड़ा ऊपर और पेड़ो के बीच से गुजरता है। जिस रास्ते से हम परसो आये थे, वह रास्ता कुछ नीचे साथ साथ चल रहा था। वैसे ऊपर वाले रास्ते पर धूप नही लग रही थी, साथ में शीतल हवा भी लग रही थी। यह रास्ता नीचे वाले रास्ते से बहुत छोटा था मतलब केवल पैदल चलने के लिए ही था। लेकिन बहुत सुंदर था। यहाँ से दूर तक का द्रशय भी दिख रहा था। हम बात करते हुए आगे पीछे चल रहे थे। अब हमें हल्की हल्की चढाई ही मिल रही थी। रास्ते में कुछ मधुमक्खीयो ने मुझे अपना डंक मार दिया। अमन मलिक जी जिनको हम प्यार से दादा कहते है। उन्होंने तुरंत हाथ मे पहने लोहे के छल्ले से उस जगह को रगड दिया।लकिन मुझे अब भी बहुत दर्द हो रहा था लेकिन बाद घर तक पहुंचने पर दर्द सही हो गया था।
अब हम वापिस चल पड़े 

ऊपर चोटी पर भैरव गढ़ी मंदिर है। 

रास्ते के सुन्दर नज़ारे 

रास्ता जो सकून देता है मन को 

रास्ते में एक बच्चा मिला जो अपनी भेड़ बकरियों को चराने लाया हुए था। 

हम ऊपर वाले रास्ते पर थे नीचे भी एक रास्ता है 

ये रास्ते और सुन्दर वादियां 

चीड़ का पेड़ 

जब दादा ने मेरी मदद की मधुमखियो से तो मैंने दादा को चीड़ का यह फूल दिया। 

रामानंद ने ये कसैला फल खिला दिया था मुझे। 

दादा और बरसुडी गांव 

अब हम द्वारीखाल पहुंचे उसी दुकान पर चाय पीने के बाद हम चल पडे। द्वारीखाल से कोटद्वार,  कोट्द्वार से खतौली होते हुए हम दिल्ली पहुंच गए। अमन जी को मैने मैट्रो स्टेशन पर छोड दिया और मैं लगभग रात के 8:30 पर घर पहुंच गया।

यात्रा समाप्त.....

18 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. धन्यवाद संदीप पँवार ( जाट देवता), जी भाई जंगल में मंगल हो गया बरसुडी आकर... ।

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  2. बढ़िया लेख । यादें ताज़ा करवा दी ।

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    1. धन्यवाद नरेश जी। जहन में यादें ऐसी ही होती है जो कभी भी ताजा हो जाए

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  3. बढ़िया लेख, आपके साथ एक बार फिर बरसुड़ी हो आए।

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    1. शुक्रिया ललित जी। आपके साथ रहकर अच्छा लगा।

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  4. बहुत सुंदर सचिन भाई, आपके द्वारा लिखे इस यात्रा वृतान्त के साथ ही इस वर्ष घुमक्कड़ दोस्तों का यह प्रयास अमर रहेगा। आभार बरसूडी को अपने ब्लॉग पर स्थान देने के लिए।

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  5. बहुत बढ़िया और सराहनीय कदम बरसूडि में

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  6. शानदार नेक कार्य घुम्मक्कड़ी
    दुसरो के लिए रास्ता
    पहाड़ आपका अहसानमंद

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  7. बरसुडी बहुत खूबसूरत गाँव लगा और उतना ही अच्छा लगा आप सबका सम्मिलत प्रयास ! पत्थर सच में हटा दिया गया था ? कुछ लोग ऐसे ही फोटो खिचाते हुए लगे मुझे :) दादा से मुलाकात करना , बेहतरीन पल रहा होगा सचिन भाई आपके लिए !!

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    1. धन्यवाद योगी भाई।
      जी बरसुडी सुंदर गांव है। सचमुच हमारे दोस्तो ने ही यह पत्थर हटाया जिससे मोटरसाइकिल आराम से आ जा सके। दादा से मिलकर बहुत अच्छा लगा वह पल जिंदगी में हमेशा याद रहेंगे ।

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  8. मैंने तो नाम ही आज आपके आलेख से जाना बरसुडी गाँव का खूबसूरत गाँव लगा ....सभी चित्र पसंद आये ...टमाटर के पेड़ वाला ज्यादा पसंद आया

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    1. कोटद्वार से थोडा आगे द्वारीखाल जगह आती है बस उधर से ही एक पैदल रास्ता बरसूडी के लिए जाता है। हमारे एक ब्लॉगर मित्र है बीनू कुकरेती जी, उन्ही का गाँव है यह। यहां आकर हम कुछ दोस्तो नें कैम्प का लगवाया था।
      संजय जी आपका बहुत धन्यवाद,, संवाद बनाए रखे।

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