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सोमवार, 27 अप्रैल 2020

मेरी यमुनोत्री यात्रा

पिछली पोस्ट में आपने पढ़ा कि मैं अपनी फैमिली के संग यमुनोत्री यात्रा के लिए दिल्ली से चलकर जानकीचट्टी पहुँच गया क्योंकि जानकीचट्टी से ही यमनोत्री मंदिर के लिए पैदल यात्रा आरंभ होती है। अब आगे पढ़े ...
 
यमुनोत्री धाम 

जानकीचट्टी से यमुनोत्री धाम की यात्रा

29 मई 2019

मैंने घोड़े वाले को कल ही बोल दिया था कि आज सुबह 4:30 बजे तक आ जाना क्योंकि हम यात्रा जल्दी ही स्टार्ट करेंगे इसलिए हम सुबह जल्दी ही उठ कर व फ्रेश होकर 4:30 तक तैयार हो चुके थे। मैं होटल से बाहर आ गया और घोड़े वाले को फ़ोन मिलाया। लेकिन उसने फ़ोन ही रिसीव नही किया। होटल से बाहर निकलने पर ही पता चला कि बाहर काफी ठंडी हवा चल रही थी और काफी सर्दी भी हो रही थी। इसलिए मैं तुरंत ही होटल के अंदर चला गया मैंने फिर घोड़े वाले को फोन किया और उसने फ़ोन उठा भी लिया। और उसने बताया कि उस के पास घोड़े कम है इसलिए वह सात बजे तक ही आ पाएगा।  इसलिए मैंने उसको आने के लिए मना कर दिया। फिर हम होटल के बाहर एक चाय की दुकान पर पहुँचे और गर्मा गर्म चाय और साथ में बिस्किट खाने लगे। चाय की दुकान पर ही एक घोड़े वाला चाय पी रहा था। उसने कहा कि मंदिर चलोगे क्या? मैंने बोला बताओ क्या लोगे? उसने कहा कि 1400 रुपए दे देना। मैंने कहा कि तुम ज्यादा मांग रहे हो और मेरी किसी अन्य से बात एक हजार रुपए में हो रखी है। फिर वह लास्ट 1100 रुपए पर आ गया। मैंने कहा ठीक है तुम घोड़े ले आओ। वह 5 बजे घोड़े लेकर हमारे पास आ गया और हम घोड़े पर सवार होकर 5:15 पर यमनोत्रीधाम के लिए निकल चले। 

अब पूरा उजाला हो चुका था और काफी लोग यात्रा प्रारंभ भी कर चुके थे। घोड़े वाले ने बताया की घोड़े से यह यात्रा 4 से 5 घंटे में हो जाती है और पैदल यात्रा में एक से दो घंटे अधिक का समय लग जाता है। उसने यह भी कहा कि सुबह सुबह ही जाना अच्छा होता है। क्योंकि जब भीड़ भी कम मिलती है और दर्शन भी बिना किसी असुविधा के आराम से हो जाते है। हम ऐसे ही बातें करते हुए जा रहे थे। मैंने एक बैग भी ले लिया था जिसमे एक गर्म चादर और रेनकोट व कुछ खाने-पीने का सामान रख लिया था । यदि आप भी अगर यमनोत्री आएं तो ध्यान रखियेगा की पहाड़ो पर बारिश कभी भी हो जाती है यह आमतौर पर दोपहर बाद ही होती है इसलिए रेनकोट या छाता अपने पास हमेशा होना चाहिए।
यात्रा शुरू हो गयी 
हरे भरे वृक्षों को देखते चलो 

हम अभी लगभग आधा किलोमीटर ही चले होंगे कि हमें एक जगह रुकना पड़ा यहां पर घोड़े वालों को 120 रुपये प्रति सवारी की पर्ची कटवानी होती है। वह पर्ची कटवाने के बाद हम आगे चल पड़े। मंदिर तक पूरा रास्ता पक्का बना हुआ है, लेकिन यह कंही कंही काफी चढ़ाई वाला रास्ता भी है। बीच-बीच में सीढियों पर भी चलना होता है।इन सीढियों पर चढ़ते वक्त मैं यही सोच रहा था कि वापिसी में घोड़ा इनपर से कैसे उतरेगा कहीं वो हमें गिरा ना दे। रास्ते पर एक दो जगह पहाड़ की तरफ कुछ पत्थर आगे बाहर की तरफ निकले हुए थे जिनसे पैदल चलने वाले यात्रियों को तो कोई दिक्कत नहीं होती लेकिन जो घोड़े पर चलते हैं वह कभी-कभी इनसे टकरा भी जानते हैं इसलिए घोड़े वाले ने हमे पहले से ही सतर्क कर दिया था इसलिए हम थोड़ा झुक कर बैठे हुए थे। यमुना नदी हमारे दाएं हाथ की तरफ बहती हुई चल रही थी अब वह काफी नीचे बहती दिख रही थी। पानी के तेज प्रवाह की वजह से काफी तेज शोर भी आ रहा था। यमुनोत्री धाम तक यह रास्ता बड़ा ही रोमांचित करने वाला है। रास्ते से गगनचुंबी बर्फ से ढँके पर्वत दिखते रहते है इन्हें देखना बड़ा ही मनभावन व आनंदित करने वाला है। और आसपास के जंगल भी यात्रियों को अपनी तरफ सम्मोहित करते है। यह घाटी बहुत खूबसूरत है।

रास्ते में जंगल देखने को मिलता रहता है .
रास्ता व दूर से दिखती हुई बर्फ की चोटियाँ

तभी मेरे घोड़े वाला जोर से चिल्लाते हुए बोला नदी के दूसरी तरफ पहाड़ी पर जंगल में देखो भालू दिख रहा है। मैंने देखा तो मुझे नहीं दिखाई दिया लेकिन फिर ध्यान से देखने पर मुझे भालू दिखाई पड़ा लेकिन वह क्षणभर के लिए ही दिखाई दिया और घने जंगल मे चला गया। मैंने घोड़े वाले से पूछा क्या जंगली जानवर यहां पर आ जाते हैं? तो उसने कहा कि भाई जी.. यात्रा के दौरान तो रास्ते पर कभी देखे नहीं है लेकिन ऊपर जंगल में तो जानवर है ही और आज जैसे अभी आपने देखा उतने ही दूर रहते है। 
बुरांस के फूल 

हमने एक पुल को पार किया अब सीढ़िया एक दम खड़ी जाती हुई दिख रही थी। इन पर चढ़ने के बाद एक मंदिर आया जो भैरव बाबा का मंदिर था। हमने इनको प्रणाम किया और आगे बढ़ गए। थोड़ा आगे कुछ दुकानें बनी हुई थी यहां पर घोड़े वाले ने हमें उतार दिया और बोला कि घोड़ा इधर कुछ रेस्ट करेगा और आप भी चाय नाश्ता करना चाहो तो कर सकते हैं। हम एक दुकान पर बैठ गए यहां गरमा गरम समोसे बन रहे थे हमने चाय और समोसे का नाश्ता किया। नाश्ता करने के बाद हम सीधा यमुनोत्री मंदिर से कुछ पहले उतर गए अब यहां से आगे पैदल ही जाना है आगे कुछ दुकानें भी लगी हुई थी। ज्यादातर दुकानें प्रसाद की ही थी इन्ही में से एक दुकान से हमने प्रसाद लिया। प्रसाद में हमें चावल की पोटली भी मिली जिस पोटली में कुछ चावल बंधे हुए थे। जिसे हमें सूर्य कुंड में रखना था और चावल के उबलने के बाद प्रसाद रूप में वापस ले जाना था। हमने एक लोहे का पुल पार किया और यमुनोत्री मंदिर के निकट गौरीकुंड पर पहुँचे। सर्वप्रथम यात्रीगण गौरीकुण्ड में स्नान करते है और फिर युमना मंदिर जाते है। गौरीकुण्ड का पानी काफी गर्म होता है। यहां दो कुंड बने है एक महिलाओं के लिए तो दूसरा पुरुषों के लिए। पानी को छू कर देखा तो पानी काफी गर्म था। इस पानी मे सल्फर की मात्रा ज्यादा होती है इसलिए ज्यादा देर पानी में नहाना भी नहीं चाहिए। मैंने भी तीन-चार डुबकी मारी और बाहर आ गया । 
कुछ दुकाने और सबसे पीछे यमुनोत्री धाम 
एक पुल पार करना है बस 
और पहुँच गये यमुनोत्री धाम 
सबसे पहले यात्री गौरीकुंडके गर्म पानी में स्नान करते है और यात्रा की थकान को समाप्त करते है फिर मंदिर जाते है .

अब माँ यमनोत्री के दर्शन करने के लिए थोड़ा सा ऊपर कुछ सीढियों को चढ़ते ही मुख्य मंदिर पर पहुंच गया।यहां पर बहुत सारे पंडित पंडित बैठे हुए थे। उन्ही में से एक मेरे पास आये और बोले कि मैं आपकी पूजा करवा देता हूं। हमने पूछा कि आप की दक्षिणा क्या होगी तब उन्होंने कहा कि जो इक्छा हो वही दे देना। फिर उन्होंने हमे सर्वप्रथम दिव्य शिला का पूजन कराया. हमने देखा की शिला से एक गर्म पानी की धार उबाले मारती हुई व आवाज करती हुई निकल रही थी। कहा जाता है कि यह माता युमना ही है जो दिव्य शिला से निकल रही है  दिव्य शिला के पास ही सूर्यकुंड है बोला जाता है कि भगवान सूर्य के तेज के कारण ही इस कुंड का जल इतना गर्म है। हमने भी चावल की एक पोटली प्रसाद के रूप में इस कुंड में डाल दी और कुछ ही देर में यह चावल पक भी गए। यहाँ पर सभी यात्री ऐसे ही पोटली में चावल को पका रहे थे। सूर्यकुण्ड के नजदीक ही यमुना जी का मंदिर है। मंदिर के अंदर माँ यमुना की मूर्ति काले रंग के पत्थर से बनी है। मंदिर में प्रसाद चढ़ाने व माँ यमुना के दर्शन करने के पश्चात हम मंदिर से बाहर आ गए और पूजा कराने वाले पंडित जी को भी दक्षिणा दे दी. अब हम मंदिर के पास यमुना नदी के नजदीक गए और एक बोतल में यमुना का जल भी भरा जिसे हम अपने साथ अपने घर लेकर जायंगे यमुना का जल बहुत साफ़ व ठंडा था इतना ठंडा की लग रहा था की मेरा हाथ सुन्न ना पड़ जाये  हमने कुछ समय और मंदिर के आस पास व्यतीत किया और फिर वापिस लौट चले। वापिसी में हमे रास्ते में काफी भीड़ मिली और एक दो जगह तो कुछ देर रुकना भी पड़ा फिर भी हम सुबह के लगभग 10 बजे तक वापिस जानकीचट्टी स्तिथ आ गए और होटल पहुँच कर अपनी कार में बैठ कर आगे गंगोत्री धाम यात्रा पर निकल गए। हम बरकोट से धरासू बैंड पहुंचे और फिर आगे उत्तरकाशी रुक गए 

दिव्यशिला


सूर्य देव की प्रतिमा
सूर्य कुण्ड जहां हमने चावल पकाए थे .
मैं परिवार सहित यमुनोत्री धाम पर 
पास में ही एक ग्लेशियर

यमुनोत्री के बारे में
उत्तराखंड के उत्तरकाशी ज़िले में यमुनोत्री धाम स्तिथ है। और यह उत्तराखंड के चार धामो में से एक है। यह मंदिर सूर्य पुत्री यमुना जी को समर्पित है। यमुनोत्री समुंद तल से करीब 3235 मीटर की ऊंचाई पर स्तिथ है और यह बन्दरपूँछ पर्वत पर स्तिथ हिमखंड(ग्लेशियरों) से निकलती है। यह कलिंद पर्वत से निकली है और भगवान सूर्य का एक नाम कलिंद भी है और यमुना जी सूर्य देव की पुत्री भी है इसलिए यमुना जी को कालन्दी भी कहा गया है । यमुना जी यमराज व शनिदेव की बहन भी है।
यमुनोत्री मंदिर के कपाट अक्षय तृतीया के पावन पर्व पर खोले जाते है तथा कार्तिक के महिने में यम द्वितीय (दीपावली) के दिन बंद कर दिए जाते है। फिर शीत काल मे यमुना जी की पूजा खरसाली गांव में होती है। यमुनोत्री मंदिर का निर्माण टिहरी के राजा महाराजा प्रतापशाह ने सन 1884 में करवाया था। यमुनोत्री धाम से जुड़ी कुछ कथाएं भी सुनी जाती है।

यमुनोत्री की कथा
1- एक कथा के अनुसार यहां पर एक मुनि आसित निवास किया करते थे उनको ही दर्शन देने के लिए युमना जी नदी के रूप में धरती पर आयी थी।
2- दूसरी कथा के अनुसार सूर्य देव की पत्नी छाया को यमराज व यमुना संतान रूप में पैदा हुए। यमुना जी नदी के रूप में पृथ्वी पर उतरी और यमराज जी को यमलोक मिला। एक बार यमुना जी ने भाई यमराज से एक वर मांगा की जो व्यक्ति यमुना में स्नान कर लेगा उसे यमराज अकाल मृत्यु नही देंगे। कहते है यह वरदान माँ यमुना ने अपने भाई यम से भाई दूज के दिन माँगा था। ऐसा मानना की जो यमुना में स्नान कर लेता है उसको अकाल मृत्यु नहीं आती है इसलिए यात्री यमुना में स्नान भी करते है और यमुना जी के साथ साथ यमराज की भी पूजा अर्चना करते है।

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शनिवार, 25 अप्रैल 2020

मेरी यमुनोत्री यात्रा (दिल्ली से जानकीचट्टी)

दिल्ली से जानकी चट्टी


गंगोत्री और यमुनोत्री जाने की चाह काफी दिनों से थी और कई बार जाने का प्लान बना भी लेकिन कभी प्लान कैंसिल हो जाता तो कभी कही अन्य जगह चला जाता। अप्रैल 2019 में मैंने नई कार खरीदी और सोचा कि चलो इसको ही लेकर कहीं सैर पर चला जाया जाए लेकिन जाया जाए तो कहां? फिर मन में ख्याल आया कि क्यों ना गंगोत्री-यमुनोत्री यात्रा पर ही चला जाए वैसे भी मैं वहां गया नहीं हूं और काफी सालों से जाने की सोच भी रहा हूं। मैंने सोचा क्यों ना परिवार के साथ ही इस यात्रा को किया जाए। मेरे बेटे देवांग की स्कूल की ग्रीष्मकालीन छुट्टियां हो जाने के बाद जाने का निर्णय किया गया। वैसे तो मई-जून में चार धाम यात्रा की भी शुरुआत हो जाती है और उत्तराखंड के सभी धामो पर पूरे इंडिया से दर्शन के लिए यात्री आते हैं और काफी भीड़ भी हो जाती है। वैसे गंगोत्री व यमुनोत्री व अन्य धाम पर आने का सबसे अच्छा मौसम सितंबर अक्टूबर से लेकर दिवाली तक का होता है। क्योंकि तब बारिश भी कम होती है और भीड़ भी कम मिलती है। लेकिन ज्यादातर लोग फैमिली संग घूमने जाते है इसलिए वो बच्चों की गर्मियों की छुट्टियों में ही पहाड़ी प्रदेशों की तरफ निकलते है। और एक बात जब मैं छोटा था और किसी से गंगोत्री आदि जगहों के किस्से सुना करता था उसके बाद गंगोत्री और यमुनोत्री जाने का ख्याल जब भी मन में आता था तो कुछ दृश्य मेरे मन मस्तिक में आने लगते थे जैसे कि वहां का वातावरण कितना स्वच्छ होगा, बर्फ के पहाड़ काफी नज़दीक दिख रहे होंगे, आसपास घने जंगल होंगे, चारो तरफ शांति होगी और नदी में शीतल जल बह रहा होगा। 

28 मई 2019
जल्द ही वह दिन आ गया जिस दिन हमे अपनी यात्रा पर निकलना था। सुबह जल्दी उठकर हम तकरीबन सुबह 4:30 पर अपने घर से गंगोत्री-यमुनोत्री यात्रा के लिए निकल पड़े। अपने कार्यक्रम के अनुसार हमे पहले यमुनोत्री जाना था और फिर गंगोत्री। कार में बैठते ही गूगल मैप किया तो मैप ने हमें बताया कि जानकीचट्टी पहुँचने के लिए लगभग 10 घंटे का समय लगेगा जो कि दिल्ली से 405 किलोमीटर दूरी पर स्थित है। गाड़ी का फ्यूल टैंक मैंने रात को ही फुल करा लिया था और सभी सामान भी रात को ही कार में रख दिये थे जिससे सुबह ज्यादा समय खराब ना हो और हम जल्दी से निकल चले। अभी सड़क खाली ही थी कुछ ट्रक तो कुछ गाड़ी ही रोड पर दिख रही थी। मुरादनगर पार करने के बाद गंग नहर के साथ वाले रास्ते से चल पड़े। अभी चारो तरफ अंधेरा ही था और इसी अंधेरे को चीरते हुए हम आगे बढ़ रहे थे। खतौली के आसपास पहुँचे तो हल्की हल्की रोशनी चारो तरफ फैल चुकी थी। खेत खलियान देख कर मन आनंदित हो गया था। मुजफ्फरनगर होते हुए हम देवबंद पहुँचे। पहले देवबंद से सहारनपुर रोड काफी खराब हुआ करता था लेकिन यह रास्ता अभी कुछ साल पहले से बहुत बेहतरीन बन चुका है इसलिए हम इसी रास्ते पर आगे का सफर तय करेंगे। हम देवबंद से आगे गागलहेडी होते हुए छुटमलपुर पहुंचे। छुटमलपुर से यह रास्ता बिहारीगढ़ होते हुए देहरादून के लिए चला जाता है। लेकिन हमें हरबर्टपुर जाना था इसलिए हम छुटमलपुर से बांये तरफ जाती सड़क पर मुड गए। इसी रास्ते पर आगे बेहट नाम का कस्बा आता है यही से एक रास्ता माता शाकुंभरी देवी के लिए अलग हो जाता है। लेकिन हम आगे हरबर्टपुर की तरफ चल पड़े। यह रास्ता छोटे-छोटे गांव से होते हुए जा रहा था। दोनों तरफ खेत तो कभी जंगल ही दिखाई पड़ रहे थे। ऐसे रास्तो पर गाड़ी चलाना बहुत आनंद देने वाला होता है। कुछ घंटे सफ़र करने के बाद हम एक मोड़ पर पहुँचे जिधर से हरबर्टपुर की दूरी मात्र 7 किलोमीटर ही रह गयी थी और इधर से एक रास्ता पौंटा साहिब की तरफ भी रहा था। वैसे यह पौंटा रोड भी मेरा देखा हुआ है क्योंकि जब मैं रेणुका जी से ऋषिकेश गया था तब इसी रास्ते से आया था। खैर हम हरबर्टपुर की तरफ मुड़ गए। हरबर्टपुर उत्तराखंड का एक छोटा व अच्छा शहर है और आसपास के गांव आदि से काफी लोग यहां पर अपनी जरूरत का सामान आदि की शॉपिंग करने के लिए आते हैं। यहां पर कुछ समय रुक कर हमने फल भी खरीदे। हरबर्टपुर से कुछ किलोमीटर आगे डाकपत्थर नामक जगह पड़ती है यहां से एक रास्ता कलसी होते हुए उत्तराखंड के प्रसिद्ध हिल स्टेशन चकराता के लिए चला जाता है। लेकिन हमें यमुनोत्री मार्ग पर ही चलना था इसलिए हम सीधा ही चलते रहे। मैंने गाड़ी का मीटर देखा तो पता चला की हम दिल्ली से अब तक 265 किलोमीटर चल चुके थे जो हम ने लगभग 5 घंटे में ही तय कर लिया था और अब हमें जानकीचट्टी तक के लिए तकरीबन 140 किलोमीटर और चलना था लेकिन आगे के यह 140 किलोमीटर पूरे पहाड़ी रास्ते पर ही तय करने होंगे और जिसमें हमें लगभग 5 घंटे का समय लगना था।
अब भूख जोरो से लग चली थी इसलिए एक भोजनालय देख कर हम रुक गए और भोजन किया गया। राजमा चावल व चपाती आर्डर कर दी गयी। खाना खाने के बाद पेट को खुराक मिल गयी थी और आगे बढ़ने के लिए ऊर्जा भी। अब आगे पहाड़ी रास्ता शुरू हो चुके थे। कार इन बलखाते ठेढ़े मेढ़े रास्तो पर मंद मंद चल रही थी, यह पहाड़ी रास्ते काफी सुंदर होने के साथ खतरनाक भी होते है इसलिए हमें ध्यान से वाहन चलाना चाहिए। हमें ट्रैफिक शून्य के बराबर ही मिल रहा था। इसी रास्ते पर हम एक मोड़ पर पहुंचे जहां से एक रास्ता केम्पटी फॉल व मसूरी के लिए चला जाता है। जो लोग देहरादून की तरफ यमनोत्री के लिए आते है, वह मसूरी होते हुए इस रास्ते से ही आते है। और कुछ लोग जो हरिद्वार ऋषिकेश से यमनोत्री गंगोत्री जाते है वह टिहरी, चंबा व धराशु बैंड होते हुए जाते है। कुछ किलोमीटर चलने पर ही यमुना नदी पर बना एक पुल पड़ा जिसको युमना ब्रिज बोला जाता है। इधर कुछ चाय पानी की दुकान भी बनी हुई है। हम कुछ देर यमुना ब्रिज पर रुके यहां से यमुना नदी का दृश्य देखना बड़ा अच्छा लगता है। आप लोग भी जब भी इस रास्ते से आये तो इधर जरूर रुकना। इधर से कुछ लोग यमुना नदी के तट पर नीचे भी जा रहे थे। जहाँ वह बड़े बड़े पत्थरों पर बैठ कर फ़ोटो भी खिंचवा रहे थे। लेकिन हम नीचे नही गए और आगे की तरफ बढ़ चले कुछ किलोमीटर चलने के बाद नैनबाग नामक एक जगह आती है। मैं इस सड़क पर आखिरी बार यहां तक ही आया था, जब मैं अपने एक दोस्त मुसाफिर नीरज कुमार के साथ नाग टिब्बा यात्रा पर आया था। तब मैं यहां नैनबाग से पंथवाड़ी गांव वाले रास्ते पर गया था। पंथवाड़ी से ही हमने नाग टिब्बा ट्रैक किया था। आज मुझे एक बार वही ट्रैकिंग फिर से याद आ गयी थी। हम नैनबाग से आगे पड़े आगे रोड पर काम भी होता दिख रहा था। अब हम एक इतनी ऊंचाई पर चल रहे थे जिधर से यमुना नदी हमे बहुत नीचे बहती दिख रही थी। पहाड़ी रास्ते पर काफी मोड़ होते हैं जिस कारण गाड़ी उतनी गति नहीं पकड़ पाती है और आराम से चलानी होती है। अब रास्ते में छोटे-छोटे गांव भी दिख रहे थे जिसमें कुछ लोग हमें खेती करते हुए भी दिख रहे थे। कुछ पालतू जानवर भी सड़क पर दिख जा रहे थे। अब मौसम कुछ सुहाना व हवा ठंडी हो चली थी। दोपहर के लगभग 1:00 बजे के आसपास हम उस स्थान पर पहुंचे जहां से एक रास्ता लाखामंडल के लिए अलग हो जाता है यहां से लाखामंडल 5 किलोमीटर दूरी मात्र पर ही रह जाता है हम लाखामंडल नहीं गए क्योंकि हमें आज जानकीचट्टी तक जाना था। जिसका रास्ता अभी भी 3 घंटे का बाकी रह गया था और उधर पहुँचने पर रात में रुकने के लिए होटल भी ढूंढ़ना था। लाखामंडल जगह को महाभारत से जोड़ा जाता है कहा जाता है कि पांडवों को यहीं पर लाख के बने महल में मारने की कोशिस की गई थी। कहते है वो लाक्षागृह यहाँ पर ही था। लकिन कुछ लोग बरनावा (मेरठ के नजदीक ) को ही असली लाक्षाग्रह मानते है क्योंकि उधर आज भी गुफा मौजूद है . 
                  इधर ही रुक कर खाना खाया था 
    यमुना ब्रिज

                   सड़क से दिखती यमुना नदी

रास्तो को देखते हुए और बातें करते हुए हम बरकोट पहुँच गए.बरकोट एक बड़ा क़स्बा है और काफी होटल आदि की यहां सुविधा है बरकोट से बर्फ के पहाड़ भी दिखने चालू हो जाते है। बरकोट में चार धाम यात्रा पंजीकरण केंद्र भी है। जो सड़क पर ही था जिस पर काफी भीड़ भी थी। हम तो ऐसे ही आगे बढ़ गए बस एक नाके पर कार का नंबर व कितनी सवारी है यह जरूर जांचा व लिखा गया। बरकोट से एक रास्ता धरासू बैंड होते हुए उत्तरकाशी व आगे गंगोत्री के लिए भी चला जाता है और दूसरा रास्ता यमनोत्री के लिए जिस पर हम चल रहे थे अभी जानकी चट्टी तकरीबन 46 किलोमीटर दूर रह गयी थी। अब युमना नदी हमारे बांये हाथ की तरफ बह रही थी। बरकोट से कुछ दूर चलने पर स्यानाचट्टी नामक जगह आती है इधर कुछ होटल बने हुए थे। अब हमें चार धाम रोड परियोजना के तहत काम होता दिख रहा था जिसके कारण जानकी चट्टी तक ही सारा रास्ता खराब मिलना तय था। हम आराम आराम से गाड़ी चलाते हुए आगे बढ़ रहे थे। स्यानाचट्टी से कुछ दूरी पर रानाचट्टी और उससे कुछ आगे दूरी चलने पर हनुमान चट्टी नामक जगह आती है इन सभी जगहों पर भी लोगों के रुकने के लिए होटल लॉज व धर्मशालाएं उपलब्ध हैं। हमने एक दो जगह रुकने के लिए पूछा भी लेकिन ज्यादातर सभी होटल्स फुल थे। हनुमान चट्टी से कुछ किलोमीटर आगे चलकर फूलचट्टी नामक जगह आती है। पहले यहीं से यमुनोत्री धाम की पैदल यात्रा हुआ करती थी लेकिन अब सड़क आगे जानकीचट्टी तक बन चुकी है इसलिए श्रद्धालु लोग सीधा जानकीचट्टी ही पहुंचते हैं। हम तकरीबन 3:15 पर जानकीचट्टी पहुंच चुके थे। जानकीचट्टी में काफी चहलकदमी दिख रही थी। काफी सारे होटल, धर्मशाला, दुकाने आदि दिख रही थी। सर्वप्रथम हमने एक दो जगह होटल देखें और फिर जहां से यमनोत्री के लिए पैदल यात्रा स्टार्ट होती है उसी के पास हमें एक होटल ले लिया, होटल का नाम चौहान होटल था। होटल वाले ने 2500 मांगे और 2000 रुपये फाइनल बोल दिए। हमने उसी होटल में रूम ले लिया क्योंकि होटल में पार्किंग की सुविधा भी थी। फिर मैंने गाड़ी को होटल की पार्किंग में लगाया फिर अपना सारा सामान रूम में ले जाकर रख दिया। होटल में भी भोजन मिलता है लेकिन हमने पास में ही बने एक भोजनालय में जाकर खाना खाया। उधर सभी का लगभग थाली का एक ही रेट होता है हमे 100 रुपये प्रति थाली मिली जिसमे तीन सब्जी और चावल व रोटी होती है। खाना खाने के उपरांत हम थोड़ा पैदल इधर उधर घूमते रहे। जानकी चट्टी के निकट घनसाली गांव स्तिथ है घनसाली में एक मंदिर है जिसमे माँ यमुना शीतकालीन निवास करती है और गांव के ही पंडित उनकी पूजा करते है। जानकी चट्टी से दिखते हुए गगनचुंबी व बर्फ से ढँके पर्वत बहुत सुंदर दिख रहे थे। कुछ ही देर बाद यहां पर बारिश चालू हो गई वैसे यह बारिश ज्यादा देर नहीं चली। फिर भी मुझे बारिश और सामने बर्फ के पहाड़ व ऊँचाई की वजह से यहां पर काफी ठंड लगने लगी थी मुझे तुरंत ही अपनी जैकेट निकालनी पड़ी और अपने बेटे को भी जैकेट पहना दी। आप भी यमनोत्री किसी भी मौसम में आये रेनकोट व गर्म कपड़े अवश्य लेकर आये।
             यमुना पर बना एक अन्य ब्रिज 
बरकोट से थोडा आगे एक जगह यमुना के किनारे थोड़ी समय के लिए रुंके

जानकी चट्टी पहुँच गए .
 जानकी चट्टी से दिखती हिमालय पर्वत की कुछ की चोटियाँ


जानकीचट्टी से ही यमुनोत्री धाम के लिए पैदल यात्रा करनी होती है जो कि 6 किलोमीटर की होती है कुछ लोग जो पैदल ना जाना चाहें उनके लिए घोड़े/खच्चर व कुछ लोगो के लिए पालकी, छोटे बच्चों के लिए पिट्ठू की सुविधा भी यहां पर उपलब्ध होती है। यहां पर हमें कुछ दर्शन करके आते हुए यात्री मिले उन्होंने बताया की बहुत भीड़ थी ऊपर काफी समय भी लगा दर्शन करने में। उन्होने सलाह भी दी कि आप सुबह जितना जल्दी हो सके उतनी जल्दी यात्रा प्रारंभ कर देना जिससे आप जल्द व आराम से दर्शन कर सके। उन्होंने बताया कि उनको चढ़ाई भी ज्यादा लगी इसलिए आप घोड़ो पर ही जाए तो बेहतर होगा। उन्होंने बताया कि यात्रियों की तादात ज्यादा होने के कारण रास्ते में जाम भी लग जाता है। मेरा मन तो पैदल ही यात्रा करने का था लेकिन बेटे और श्रीमती के कहने पर घोड़े पर चलने को स्वीकार कर ही लिया। फिर एक घोड़े/खच्चर वाले से बात हुई उसने 1100 रुपये प्रति व्यक्ति का बोल दिया मंदिर तक आने जाने के। हमने उसको होटल का नाम व रूम नम्बर बता दिया व उसका नम्बर भी ले लिया और साथ मे बोल भी दिया कि वह सुबह 4:30 तक जरूर आ जाये। उससे बात कर हम होटल की तरफ चले गए



                   खरसाली गाँव का एक मंदिर 
                           एक अन्य मंदिर


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गुरुवार, 2 अप्रैल 2020

औली की सैर

औली यात्रा भाग 04

पहला भाग 01 पढ़े
04 नवंबर 2019
कल हम बद्रीनाथ में ही रुक गए थे और हमने snowfall होता हुआ भी देखा था। आज सुबह आराम से उठे। उठते ही रूम की खिड़की खोली तो मौसम साफ था धूप निकल रही थी। होटल के दिखता नीलकंठ पर्वत चमक रहा था साथ मे कुछ और पर्वत जो कल हरे भरे दिख रहे थे आज वो भी सफ़ेद हो चुके थे। मैं नहा धोकर होटल में बने रेस्टोरेंट में नाश्ता करने पहुँच गया कुछ देर बाद सभी लोग आ चुके थे। सभी ने नाश्ता किया और होटल का हिसाब चुकता कर आगे के सफर पर बढ़ गए। बद्रीनाथ जी से 12 km चलकर जोशीमठ के रास्ते के बीच एक हनुमान जी का मंदिर पड़ता है जिसको हनुमान चट्टी जगह बोला जाता है यहां पर हमने रुक कर प्रसाद चढ़ाया और चल पड़े जोशीमठ की तरफ कुछ समय बाद हम जोशीमठ पहुँच चुके थे। हमे औली जाना था जो जोशीमठ से तकरीबन 12 या 13 किलोमीटर दूर पड़ता है




सुबहे उठा तो नीलकंठ पर्वत चमक रहा था। 

होटल से दिखता बद्रीनाथ व बर्फ से ढंकी पहाड़ियाँ 

होटल जिसमे हम कल रुकें थे। 

बद्रीनाथ से चल दिए। 

हनुमान मंदिर, हनुमान चट्टी 

विष्णु प्रयाग 

औली से कुछ पहले 
औली पहुंच गए 
औली शीतकालीन खेलों के लिए विश्व प्रसिद्ध जगह में से एक है जहां पर स्किंग व अन्य खेल होते है। हम लगभग रुकते रुकते 40 मिनिट में औली पहुँच गए। इधर से बहुत सारे बर्फ से ढके पर्वत दिख रहे थे और जो ऐसे पर्वत थे जो हमे कार्तिकेय स्वामी से नही दिख रहे थे। इन पर्वतों में हाथी घोड़ी पर्वत, नंदा देवी पर्वत, द्रोणागिरी, कॉमेट, नीलकंठ पर्वत आदि मुख्य थे और अन्य पर्वत भी साफ दिखाई दे रहे थे जिनका मुझे नाम भी नही पता था। यह जगह बहुत ही शानदार व सुंदर जगह है। यहां पर दो प्रकार के उड़न खटोला (केबल कार) भी चलते है। जिसमें आप सवार होकर औली पहुँच सकते है। पहला केबल कार जिससे आप सीधे जोशीमठ से ही आना जाना कर सकते है उसके लिए आपको 1200 रुपये प्रति व्यक्ति देना होगा। दूसरी केबल चेयर जो औली से ही मिलती है इसमें आना जाना 500 रुपये प्रति लोगों का लगता है। यह तकरीबन एक किलोमीटर लंबी यात्रा होती है।
हम लोग औली पहुँच कर एक पार्किंग में गाड़ी खड़ी करके आगे चल दिये। आगे हमे एक मैदान में पहुँचना था इस के लिए दो विकल्प है एक पैदल का रास्ता दूसरा केबल चेयर का हमने दूसरा विकल्प चुना और केबल चेयर पर बैठ गए। चार कुर्सी के साथ जुड़ी होती है जो एक तार पर चलते रहती है। कुछ ही समय बाद यह चल पड़ी। एक और बात इसमे बैठने से पहले ही अपने सभी कीमती सामान आदि को संभाल के पकड़ लेना चाहिए क्योंकि अगर आपका समान गिर गया तो वह आपको नही मिल पाएगा क्योंकि यह ऊपर नीचे, दाँय बांये से एक दम खुली हुई है कोई प्रॉटेशन नही होती है। हम औली के उस मैदान में पहुँचे जो विश्व प्रसिद्ध है। अभी कुछ दिन बाद इधर बहुत बर्फ पड़ जाएगी लेकिन अभी इधर कोई बर्फ नही थी। बाकी औली में इस मैदान के अलावा और कुछ नहीं है, यह एक ढलान नुमा मैदान है इसलिए स्कींग इधर होती है। हम औली में स्किंग सीख भी सकते है। यहां पर एक होटल gmvn का है और क्लिफ टॉप नाम का रिसोर्ट बना हुआ है। लेकिन इधर प्राकृतिक सुंदरता बहुत है इधर से हिमालय के सुंदर नज़ारे बेहद नजदीकी से देख सकते हैं। कुछ दूरी पर देवदार के पेड़ों का जंगल भी दिख रहा था। हम थोड़ा चल कर जंगल के पास पहुँच गए। उधर कुछ दुकाने भी बनी हुई थी ऐसी ही एक दुकान से हमने मैगी बनवा ली। इस जंगल के बीच एक बुग्याल भी है। बुग्याल मतलब एक घास का मैदान होता है। जो 3km आगे जंगल को पार करने के बाद आता है। सभी उसको गुरसो बुग्याल बोल रहे थे। ललित उधर जाना चाहता था लेकिन पता नही क्यो पर मेरा मन बुग्याल जाने को नही हो रहा था। लेकिन फिर मैंने गुरसो बुग्याल जाने का मन बना लिया। ललित चार घोड़े तय कर के ले आया, घोड़े वाले हमे 700 रुपये प्रति व्यक्ति के हिसाब से गुरसों बुग्याल तक घुमा कर लेकर आयंगे। यदि हम पैदल भी जाना चाहते तब भी आराम से जा सकते थे क्योंकि यह 3 किलोमीटर का रास्ता बिल्कुल भी कठिन नही था और आराम से एक घंटे से पहले ही बुग्याल तक पहुँचा जा सकता था। लेकिन हमारे पास समय कम होने के कारण हमने घोड़े पर ही जाने का निर्णय किया और हम कुछ ही समय बाद गुरसो बुग्याल पहुंच गए। घोड़े वालो ने हमे नीचे उतार दिया।
औली पहुँच पहले गाड़ी पार्किंग में लगाई। 

चारो दोस्त केबल चेयर पर बैठ कर औली के उस मैदान में पहुँचे जो विश्व विख्यात है अपनी सुंदरता के लिए। 

अंकित ,अमित ,ललित और मैं सचिन 

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ललित 
घोड़ो पर सवार हम चले गुरसों बुग्याल। 
गुरसों बुग्याल 
यह एक बड़ा बुग्याल था जैसे रानीखेत में गोल्फ कोर्स मैदान दिखलाई देता है यह उससे भी बड़ा है इधर से नंदा देवी पर्वत को देखना और भी सुंदर लग रहा था। मैं तो कुछ देर सिर्फ और सिर्फ हिमालय के पर्वतों की तरफ ही सम्मोहित हो गया था। कुछ ही दिन बाद यहां पर काफी बर्फ पड़ जाएगी है तब इधर आना मुश्किल हो जाएगा। एक व्यक्ति जो यहा गाइड का काम करता है उसने हमें बताया कि इस बुग्याल से आगे एक छोटा सा पानी का कुंड भी है जिसको लोग देखने जाते है। बुग्याल से कुछ अंग्रेज ट्रैवलर आगे भी जा रहे थे। जिनके पोर्टर से मुझे पता चला कि वह आगे कहीं ट्रैक के लिए जा रहे हैं वैसे इस बुग्याल से नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान 40किलोमीटर दूर है। शायद यह ग्रुप उधर ही जा रहा होगा। हमने बुग्याल में तकरीबन एक घंटा बिताया और वापस घोड़ों पर बैठकर औली आ गए। जिससे हमने मैग्गी खाई थी उसको मैगी के पैसे देकर वापिस केबल चेयर की तरफ बढ़ गए और फिर केबल चेयर (केबल कार ) से वापिसी करते हुए gmvn की बनी पार्किंग में पहुंच गए। जहां से हम अपनी गाड़ी में बैठकर शाम तक बिरही (चमोली) पहुँच गए। रात को यहां पर रुकने के बाद अगले दिन 5 nov को हम सुबह अपने घर दिल्ली के लिए निकल चले और हरिद्वार से होते हुए रात को तकरीबन 8:30 बजे दिल्ली पहुंच गए।
गुरसों बुग्याल और पीछे नंदा देवी पर्वत। 

नंदा देवी पर्वत 

शायद हाथी घोड़ी पर्वत है 

द्रोणागिरी पर्वत 


हाँ यही है नंदा देवी पर्वत 





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